Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
फ़िक्र की गहराई, जज़्बात की मुख़्तलिफ़ पहलुओं से तरजुमानी और बयान की लज़्ज़त- मो० इशरत सग़ीर

गोविंद गुलशन जी का तअल्लुक़ उस्ताद शाइर कृष्ण बिहारी 'नूर' के शे'री घराने से बराहे-रास्त था। ऐसे में उनके यहाँ ग़ज़ल का हुस्न रवायत के तमाम तक़ाज़ों पर पूरा उतरता है। गोविंद गुलशन जी ख़ुद उस्तादी के ओहदे पर फाइज़ हो चुके थे। यही सबब है कि उनके शागिर्दो ने उनकी ग़ज़लों को यकजा कर 'कल न कल तो तेरे' उन्वान के तहत इरा पब्लिकेशन, कानपुर से शाया किया है।

गोविंद गुलशन साहब पुराने को सहेजते हुए नया रचते हैं- के० पी० अनमोल

सादा जुबान में बिना किसी चमत्कारपूर्ण शब्दावली के, बिना उक्तिवैचित्र्य के, बिना किसी शोर-शराबे के बहुत सलीक़े के साथ हमें यहाँ गहरी व्यंजनात्मकता के साथ शायरी मिलती है। पुस्तक की कथा-वस्तु का दायरा भी बहुत व्यापक है, जहाँ उर्दू शायरी के परंपरागत बिम्ब, प्रतीक और विषय भी हैं तो नए ज़माने का बदलाव और नए समय की सच्चाई भी।

पैमाने नये आये : अवाम की आवाज़ से निकली हुई ग़ज़ल- डॉ० ज़ियाउर रहमान जाफ़री

अशोक कुमार नीरद की ग़ज़लें ज़मीन से जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि हिंदी ग़ज़ल के बेशतर आलोचकों के भी वह प्रिय शायर हैं। कमलेश भट्ट 'कमल' को जहाँ उनकी ग़ज़लों का तेवर पसंद आता है, वहीं हरेराम समीप और अनिल गौड़ को उनके द्वारा ग़ज़ल में किए गये प्रयोग अच्छे लगते हैं।

क्षणिका विधा पर गंभीर वैचारिक दृष्टि का परिणाम है 'समकालीन क्षणिकाकार'- हरकीरत हीर

अनुक्रमणिका से ज्ञात होता है कि इस संग्रह में वरिष्ठ, समकालीन और युवा- तीनों पीढ़ियों के क्षणिकाकारों को समान सम्मान के साथ स्थान दिया गया है। यह चयन-दृष्टि संग्रह को व्यापक और प्रतिनिधिक बनाती है।