Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
रचनात्मक विस्तार का एक महत्वपूर्ण पड़ाव : राहतों के नाम पर बेचैनियाँ- डॉ० अविनाश भारती

संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें शामिल प्रत्येक ग़ज़ल अपने अलग भाव-संसार और अनुभव के साथ सामने आती है। कहीं सामाजिक विडम्बनाओं पर तीखा व्यंग्य है, कहीं राजनीतिक व्यवस्था के खोखलेपन पर चोट है, कहीं रिश्तों की नमी और टूटन है तो कहीं स्त्री-जीवन की गहरी पीड़ा और संघर्ष है।

क्या खोया- क्या पाया का आकलन : टेसू लेके ही टरे- डॉ० मधु संधु

इन कहानियों में प्रवासी मन की पीड़ा, सांस्कृतिक चित्र, सम्बन्धों के घेरे, नियति के घात, बहुमुखी चुनौतियाँ, अतीत की भावुक स्मृतियाँ और अपने देश की याद अधिकांशत: यहाँ-वहाँ बिखरी हैं।

स्मृतियों, रिश्तों और बदलते समय का अंतर्द्वंद्व : वे लोग- आशा पाण्डेय

इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूरी कहानी नायिका के आत्मकथ्य के रूप में सामने आती है। उपन्यास का मूल स्वर गाँव और शहर के बीच फैले जीवन-संघर्ष को पकड़ता है, जहाँ केवल भौगोलिक दूरी नहीं, बल्कि संवेदनाओं की दूरियाँ भी जन्म लेती हैं।

शब्दों का ही नहीं, सघन व सशक्त अनुभूतियों का आईना- कुलदीप सिंह भाटी

कवि की कविताओं में देश-प्रेम है, तो प्रकृति के प्रति प्रेम भी। कवि कहता है कि जिस प्रकार एक बीज में एक पेड़ समाहित होता है, उसी प्रकार एक-एक नागरिक में उसका देश। यदि बीज, पेड़ से विद्रोह नहीं करता तो फिर देश के लोग अपने ही देश से क्यों दग़ाबाज़ी करते हैं? यहाँ 'दग़ाबाज़ी' भष्टाचार, नौकरशाही, कर्तव्यों की अवहेलना, पुरातात्विक धरोहरों के प्रति हमारी उदासीनता, प्रदूषण आदि चिन्ताओं तक व्यापित है।