Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
वसंत जमशेदपुरी के दोहे

हिन्दी की छान्दस कविता में ऋतू तथा त्योहारों के वर्णन की अपनी परंपरा रही है। दोहा विधा का भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वसन्त की आहट के साथ ही जहाँ मौसम ने करवट ले ली है और सबकुछ फिर से जीवंत होने लगा है, ऐसे में इस ऋतू और उससे जुड़ी अनुभूतियों को वसंत जमशेदपुरी जी ने अपने दोहों के माध्यम से शब्दबद्ध किया है। इनके ये दोहे हमारे सामने इस ऋतू के अलग-अलग चित्र प्रस्तुत करते हैं।

- के० पी० अनमोल

सुरेश चन्द्र 'सर्वहारा' के दोहे

बिना प्रेम के ज़िंदगी, है बिल्कुल बकवास।
सुंदर पर बिन काम की, जैसे गाजरघास।।

डॉ० शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

पहनेंगे अब कोट सब, खायेंगे अखरोट।
चीलों के इस दाँव पर, बरस रहे हैं वोट।।

राजपाल सिंह गुलिया के दोहे

बड़ा बहुत संसार में, भूख नाम का रोग।
मिटा सका जिसको यहाँ, कहो कौनसा योग।।