Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
अंजू केशव के दोहे

प्रतिरोध का भाव लिए हुए अंजू केशव के ये दोहे अपने समय की अनेक विसंगतियों को उजागर करते हैं। इन कुछ दोहों में ही विभिन्न समकालीन विमर्श पूरी मुखरता के साथ दर्ज हो रहे हैं। रचनाकार इन दोहों के माध्यम से हमारे समय की विकृत तथा संकीर्ण सोच पर करारी चोट करती हैं।

- संपादक

शकुंतला अग्रवाल 'शकुन' के छप्पय छंद

ईर्ष्या घातक रोग, चाटता दीमक बनके।
कैसे बने सुयोग, सभी चलते हैं तन के।

वसंत जमशेदपुरी के दोहे

हिन्दी की छान्दस कविता में ऋतू तथा त्योहारों के वर्णन की अपनी परंपरा रही है। दोहा विधा का भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वसन्त की आहट के साथ ही जहाँ मौसम ने करवट ले ली है और सबकुछ फिर से जीवंत होने लगा है, ऐसे में इस ऋतू और उससे जुड़ी अनुभूतियों को वसंत जमशेदपुरी जी ने अपने दोहों के माध्यम से शब्दबद्ध किया है। इनके ये दोहे हमारे सामने इस ऋतू के अलग-अलग चित्र प्रस्तुत करते हैं।

- के० पी० अनमोल

सुरेश चन्द्र 'सर्वहारा' के दोहे

बिना प्रेम के ज़िंदगी, है बिल्कुल बकवास।
सुंदर पर बिन काम की, जैसे गाजरघास।।