Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
डाॅ० नीना छिब्बर की क्षणिकाऍं

ख़त लिखना, ख़त में मन खोलकर रख देना, ख़त के इंतज़ार में घड़ियाँ गिनना और ख़त को जान से ज़्यादा संभालकर रखना; इन सब बातों का भी एक ज़माना था। केवल संवाद के लिए नहीं, हालचाल देने-लेने के लिए नहीं बल्कि और भी कितने ही कारण थे ख़तों के लिए पागलपन के। जिन्होंने वह ज़माना जिया है, वे जानते हैं ख़तों की क़ीमत। आज के डिजिटल दौर में ख़त की अहमियत और उसकी ज़रूरत समझातीं हैं नीना छिब्बर जी की ये क्षणिकाएँ।

प्यारचंद शर्मा 'साथी' की क्षणिकाएँ

कम शब्दों में बहुत गहरी बात करतीं प्यारचंद शर्मा 'साथी' की क्षणिकाएँ, क्षणिका विधा को बहुत मज़बूती के साथ हमारे सामने रखती हैं। सीधी-सरल भाषा तथा शैली की ये छोटी-सी रचनाएँ भरपूर व्यंजकता के साथ संसार की वास्तविकता को प्रस्तुत करती हैं। प्रेम, प्रकृति, हौसले तथा जीवन के नाना रूपकों के माध्यम से रचनाकार गहन दार्शनिक बातें बहुत सहजता से कह जाते हैं। मार्मिकता इन क्षणिकाओं का मज़बूत पक्ष है, जो बिलकुल अंत में जाकर पंच की तरह प्रकटता है।

- के० पी० अनमोल

डॉ० परमेश्वर गोयल की क्षणिकाएँ

वरिष्ठ क्षणिकाकार डॉ० परमेश्वर गोयल उर्फ़ काका बिहारी जी की क्षणिकाओं का मुख्य विषय राजनीतिक एवं सामाजिक विद्रूपताओं का निर्भीक अंकन है। एक कवि का वास्तविक उत्तरदायित्व निभाते हुए वे विसंगतियों पर करारी चोट करते हैं और स्पष्ट शब्दों में बग़ैर लाग-लपेट के झूठ का पर्दाफ़ाश करते हैं। उनकी क्षणिकाओं में आम आदमी के आक्रोश का गहन स्वर है, तो पीड़ा और संवेदना की समर्थपूर्ण अभिव्यक्ति भी। उनके क्षणिका-काव्य में निहित व्यापक भावबोध और बिम्ब मनुष्य को मानवीय मूल्यों के प्रति अडिग रहने के लिए प्रेरित करते हैं।

उनके अब तक ग्यारह क्षणिका-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ० गोयल की क्षणिकाएँ समाज की वर्तमान स्थिति पर एक तीखी टिप्पणी है, जो समाज की विभिन्न समस्याओं को उजागर करती हैं। इन क्षणिकाओं में समाज की अव्यवस्था, अंधकार और पतन की स्थिति को दर्शाया गया है, जहाँ लोग अपनी संस्कृति और मूल्यों को त्यागकर विदेशी संस्कृति को अपनाने में लगे हैं। डॉ० गोयल की क्षणिकाओं में एक संदेश भी है, जो हमें अपनी संस्कृति और मूल्यों को बचाने के लिए प्रेरित करता है। हमें अपनी संस्कृति को त्यागने के बजाय, उसे अपनाना चाहिए और समाज को एक बेहतर दिशा में ले जाना चाहिए। इन क्षणिकाओं का पैना यथार्थ-बोध न्यूनतम शब्दों में अधिकतम अर्थ-घनत्व समाहित किये हुए है। वे शाश्वत मानवीय मूल्यों के क्षणिकाकार हैं, जिनके केन्द्र-बिन्दु में मनुष्यता की पुनर्स्थापना है। वे राजनीति, समाज तथा धर्म में व्याप्त कुरूपता और आडम्बर पर ठोस प्रहार करते हैं।

- डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर

सुशील कुमार सरना की क्षणिकाएँ

सौ बार मरता है
मरने से पहले
जन्मदाता,
वृद्धाश्रम में
अकेला!