Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
व्यंग्य विधा की पुस्तक-सिर मुँडाते ओले पड़े- डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

हिंदी में व्यंग्य की किताब उस अनुपात में नहीं आ रही है, जिस अनुपात में गद्य और पद्य की अन्य विधाओं का प्रकाशन हो रहा है। अभी भी व्यंग्य का नाम आते ही हमारा ध्यान हरिशंकर परसाई, काका हाथरसी और हुल्लर मुरादाबादी जैसे कुछ लोगों तक सिमट कर रह जाता है.समकालीन साहित्य में संतोष दिवाकर एक अच्छे व्यंग्य लेखक हैं। एक समय में उनकी व्यंग्य क्षणिकायें काफ़ी सुनी जाती थी। भारतीय स्टेट बैंक में नौकरी करते हुए भी उन्होंने अपने साहित्य को जिंदा रखा है, यही कारण है कि उनके व्यंग्य की एक नई किताब सर मुंडाते ओले पड़े छप कर आई है। इस पुस्तक में उनके व्यंग्य विधा के पचहत्तर निबंध हैं। सबसे बड़ी बात कि इस निबंध के विषय हमारे आसपास के हैं, लेकिन संतोष दिवाकर अपनी प्रतिभा से इस अभिधावली को व्यंजनात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके व्यंग्य की वो धार है, जिससे कोई नहीं बच पाया है।

ग़ज़लगोई को समझने के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए : आसमां तू ही बता- के० पी० अनमोल

संग्रह की ग़ज़लों के विषय विविधता भरे हैं। लहजे को परंपरागत ही रखते हुए मक़सूद साहब परंपरागत घेरे के बाहर से भी अपने कथ्य चुनते हैं, साथ ही अपनी कहन को विशेष रखने का प्रयास करते हैं और यहाँ वे गज़लगोई में सफल हो उठते हैं।

नए प्रयोग और सशक्त कहन का नायाब नमूना : मकड़जाल- रामकुमार भाम्भू

संग्रह में सात लम्बी कहानियाँ हैं, जिनमें से अधिकतर किसी न किसी पत्रिका में छपी है और शेष छपने के लिए स्वीकृत हैं। नई विषय-वस्तु और कहन का अंदाज़ लम्बी कहानियों को पठनीय बना देता है।

जीवन की हकीकत की शायरी: पागल-पागल कहते लोग- के० पी० अनमोल

पागल-पागल कहते लोग आसान भाषा और सरल कहन की अच्छी शायरी का पठनीय संग्रह है। आधारशिला प्रकाशन की अनुभवी टीम ने इसे साफ़-सुथरे और सुंदर ढंग से प्रकाशित किया है।