Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
डॉ० कृष्णा कुमारी का ललित निबंध 'बात तो बात की है'

बातों को लेकर कई-कई बातें भी प्रचलित हैं, मुहावरे भी। कहते हैं बात निकलेगी तो दूर तक जाएगी। इसलिए कुछ लोग तो बातों से ही चाँद-तारे तोड़ लाते हैं, हक़ीक़त में भले ही कुछ करते-धरते नहीं बने। भला यह भी कोई बात है! इसी प्रकार कुछ लोग बात के धनी होते हैं, तो कुछ बातों के शहंशाह, कुछ केवल बातें ही करते हैं।

प्रेम और सौंदर्य- राजेन्द्र वर्मा

हमारा प्रयोजन बाहरी रूप-रंग बनाए रखने से नहीं है, जिसकी दुर्दशा हमने भरपूर कह सुनाया, वरन सौंदर्य से हमारा प्रयोजन आंतरिक चरित्र अथवा शील पालन से है और मनोहर का शब्द मनुष्य के चेहरे के वास्ते न करके शील अथवा स्वभाव के लिए हम प्रयोग करते हैं, क्योंकि शारीरिक सौंदर्य पहले तो सबको प्राप्त नहीं है और न यत्न किए जाने से सबको मिल सकता है तब हम क्यों दूसरे प्रकार के सौंदर्य के लिए यत्न न करें! जो थोड़े प्रयत्न में मिल सकता है और न इसके बढ़ने की कुछ अवधि है। जहाँ तक बढ़ाते जाइए, कभी आप यह नहीं कह सकते कि हमारे अधिक अच्छे होने की और गुंजाइश नहीं है। इस शील-पालन के सौंदर्य के विषय में अद्भुत बात देखी जाती है कि जो शील-पालन के सौंदर्य से पूर्ण हैं, वे अपने को कुरूप ही मानते हैं; अर्थात जो अच्छे हैं, वे सदा यही मानते हैं कि मेरे में लाखों दोष और ऐब भरे हैं।

भारतीय संस्कृति का आस्थापरक स्वरूप- डॉ० मिथिलेश दीक्षित

आस्था का मार्ग निर्भयता, दृढ़ता, साहस और निष्ठा का मार्ग है, जिसमें व्यवधान भी आ सकते हैं, कठिनाइयाँ भी आ सकती हैं, संघर्ष भी करने पड़ सकते हैं परन्तु अन्त में सत्य ही विजयी होगा, इसके लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। सामान्य जन में धैर्य की कमी होती है।

दूर्वा-संस्कृति का आख्यान- डॉ० शिव कुमार दीक्षित

सदाशिव के जटा सम्भार से हहराकर उतर आयी सितफेन गंगधार के स्पर्श से दूर्वा भूमण्डल पर हरित होकर ऐसी फैल जाती है मानों वह उन वनस्पतियों को चिढ़ा रही हो जिनके शिखर पुष्प देवांगनाओं के धम्मिल पाश में रत्नाभूषण बन गए हैं।