Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
फागुन और बसंत- दशरथ कुमार सोलंकी

हवा, पानी, धूप की उन्मुक्ति में अवरोध प्रकृति की मुक्त-गति को ठेस पहुँचाते हैं। वह अपने मुख से कहती नहीं, उसकी मूक पर साक्षात् प्रतिक्रिया को हम अनदेखा करते हैं। हमारी प्रगति की परिभाषाएँ उन भाषाओं से अनभिज्ञ हैं, जो मानव के लिए शांति की राह प्रशस्त करती हैं। यह सभ्यता की ख़ामोश त्रासदी है।

डॉ० कृष्णा कुमारी का ललित निबंध 'बात तो बात की है'

बातों को लेकर कई-कई बातें भी प्रचलित हैं, मुहावरे भी। कहते हैं बात निकलेगी तो दूर तक जाएगी। इसलिए कुछ लोग तो बातों से ही चाँद-तारे तोड़ लाते हैं, हक़ीक़त में भले ही कुछ करते-धरते नहीं बने। भला यह भी कोई बात है! इसी प्रकार कुछ लोग बात के धनी होते हैं, तो कुछ बातों के शहंशाह, कुछ केवल बातें ही करते हैं।

प्रेम और सौंदर्य- राजेन्द्र वर्मा

हमारा प्रयोजन बाहरी रूप-रंग बनाए रखने से नहीं है, जिसकी दुर्दशा हमने भरपूर कह सुनाया, वरन सौंदर्य से हमारा प्रयोजन आंतरिक चरित्र अथवा शील पालन से है और मनोहर का शब्द मनुष्य के चेहरे के वास्ते न करके शील अथवा स्वभाव के लिए हम प्रयोग करते हैं, क्योंकि शारीरिक सौंदर्य पहले तो सबको प्राप्त नहीं है और न यत्न किए जाने से सबको मिल सकता है तब हम क्यों दूसरे प्रकार के सौंदर्य के लिए यत्न न करें! जो थोड़े प्रयत्न में मिल सकता है और न इसके बढ़ने की कुछ अवधि है। जहाँ तक बढ़ाते जाइए, कभी आप यह नहीं कह सकते कि हमारे अधिक अच्छे होने की और गुंजाइश नहीं है। इस शील-पालन के सौंदर्य के विषय में अद्भुत बात देखी जाती है कि जो शील-पालन के सौंदर्य से पूर्ण हैं, वे अपने को कुरूप ही मानते हैं; अर्थात जो अच्छे हैं, वे सदा यही मानते हैं कि मेरे में लाखों दोष और ऐब भरे हैं।

भारतीय संस्कृति का आस्थापरक स्वरूप- डॉ० मिथिलेश दीक्षित

आस्था का मार्ग निर्भयता, दृढ़ता, साहस और निष्ठा का मार्ग है, जिसमें व्यवधान भी आ सकते हैं, कठिनाइयाँ भी आ सकती हैं, संघर्ष भी करने पड़ सकते हैं परन्तु अन्त में सत्य ही विजयी होगा, इसके लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। सामान्य जन में धैर्य की कमी होती है।