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क्षणिका विधा पर गंभीर वैचारिक दृष्टि का परिणाम है 'समकालीन क्षणिकाकार'- हरकीरत हीर

क्षणिका विधा पर गंभीर वैचारिक दृष्टि का परिणाम है 'समकालीन क्षणिकाकार'- हरकीरत हीर

अनुक्रमणिका से ज्ञात होता है कि इस संग्रह में वरिष्ठ, समकालीन और युवा- तीनों पीढ़ियों के क्षणिकाकारों को समान सम्मान के साथ स्थान दिया गया है। यह चयन-दृष्टि संग्रह को व्यापक और प्रतिनिधिक बनाती है।

डॉ० शैलेष गुप्त 'वीर' द्वारा संपादित क्षणिका-संग्रह समकालीन क्षणिकाकार केवल क्षणिकाओं का संकलन नहीं, बल्कि क्षणिका विधा पर गंभीर वैचारिक दृष्टि का परिणाम है। संपादकीय और भूमिका से स्पष्ट होता है कि यह संग्रह भाव-बोध और व्यंजना- दोनों के संतुलन पर आधारित है। डॉ० वीर ने क्षणिका को मात्र लघु कविता नहीं, बल्कि न्यूनतम शब्दों में अधिकतम अर्थ रचने वाली सशक्त विधा के रूप में स्थापित किया है।

संपादकीय में मुक्त छंद के अंतर्गत क्षणिका की भूमिका, उसकी वैचारिक क्षमता और पाठक पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभाव को जिस स्पष्टता और उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया गया है, वह इस विधा की समझ को और गहरा करता है। विशेष रूप से शब्द-संयम, शीर्षक-विवाद और चंद शब्दों की सीमा जैसे बिंदुओं पर किया गया विमर्श संग्रह को आलोचनात्मक आधार प्रदान करता है।

अनुक्रमणिका से ज्ञात होता है कि इस संग्रह में वरिष्ठ, समकालीन और युवा- तीनों पीढ़ियों के क्षणिकाकारों को समान सम्मान के साथ स्थान दिया गया है। यह चयन-दृष्टि संग्रह को व्यापक और प्रतिनिधिक बनाती है। विविध भावभूमियों, सामाजिक संकेतों और आत्मानुभूति से उपजी क्षणिकाएँ पाठक को ठहरकर सोचने को विवश करती हैं।

इस महत्वपूर्ण संग्रह में अनेक क्षणिकाएँ प्रभावित करती हैं। उदाहरणार्थ कुछ प्रस्तुत हैं-

तितलियों का
फूलों से/भौंरों से
सम्बन्ध हमेशा रहा,
पूछने पर-
उपवन का माली
चुप रहा!
- चक्रधर शुक्ल
__________

फूलों में जो आग है
झोली में लेना है उसको,
अन्तस में पनपते
हिम-शिखर को रोकना है
मुझे आँगन में
फूलों का पौधा
रोपना है!
- डॉ. उमेश महादोषी
__________

जब चाहे तब
उसे हमेशा
मालिक ही सताता है,
मज़दूरी करता आदमी
मज़दूर दिवस नहीं,
मज़बूर दिवस
मनाता है!
- रमेश कुमार भद्रावले
__________

अम्बर के प्रणय-निवेदन पर
लजा गयी धरती,
मुख से निकला
एक शब्द- "अहा!"
और तब से स्वीकृति का
एक पर्याय
अहा भी
हो गया!
- डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
__________

उजाले की सरहद पर
पर्दे टाँग देते हैं,
वे नहीं जानते
जिद्दी अँधेरे
फिर भी
झाँक लेते हैं!
- इन्दिरा किसलय
__________

तुम दूर हो
पर यहाँ की हवा भी
जान जाती है
तुमने कुछ कहा है,
देखो, अब गुलदान में लगे
नक़ली फूल भी
जान गये हैं
हँसना और महकना!
- पूनम शुक्ला

संकलन में रचनाकारों की उपस्थिति केवल सहभागिता नहीं, बल्कि क्षणिका जैसी सूक्ष्म विधा में रचनात्मक उत्तरदायित्व का स्वीकार है। निस्संदेह यह संग्रह क्षणिका विधा के पाठकों, रचनाकारों और शोधार्थियों के लिए एक सार्थक, विचारोत्तेजक और संग्रहणीय कृति सिद्ध होगा। डॉ० 'वीर' को इस सुचिंतित और श्रमसाध्य संपादन के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ।

 


समीक्ष्य कृति- समकालीन क्षणिकाकार
सम्पादक- डॉ० शैलेष गुप्त 'वीर'
प्रकाशक- इरा पब्लिशर्स, कानपुर
मूल्य- ₹240
पृष्ठ- 132
प्रथम संस्करण- 2025

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रचनाकार परिचय

हरकीरत हीर

ईमेल : harkirathaqeer@gmail.com

निवास : गुवाहाटी (असम)

मूल नाम- हरकीरत कौर कलसी
जन्मतिथि- 31 अगस्त, 1970
जन्मस्थान- असम
शिक्षा- एम० ए० (हिन्दी), डी० सी० एच०
संप्रति- महिला उत्पीड़न गैर सरकारी संस्था का सञ्चालन
लेखन विधाएँ- हिन्दी तथा पंजाबी में कविता, लेख, कहानियाँ तथा पंजाबी व असमिया से अनुवाद
प्रकाशन- 'इक-दर्द', 'दर्द की महक', 'खामोश चीखां', 'खामोश चीखें', 'अवगुंठन की ओट से सात बहने', 'माँ की पुकार', 'दीवारों के पीछे की औरत', 'चुन्नियों में लिपटा दर्द' आदि पुस्तकें प्रकाशित।
संपर्क- 18, ईस्ट लेन, सुन्दरपुर, हाउस न. 5, गुवाहाटी (असम)- 781005
मोबाइल- 8638761826