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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

गोविंद गुलशन साहब पुराने को सहेजते हुए नया रचते हैं- के० पी० अनमोल

गोविंद गुलशन साहब पुराने को सहेजते हुए नया रचते हैं- के० पी० अनमोल

सादा जुबान में बिना किसी चमत्कारपूर्ण शब्दावली के, बिना उक्तिवैचित्र्य के, बिना किसी शोर-शराबे के बहुत सलीक़े के साथ हमें यहाँ गहरी व्यंजनात्मकता के साथ शायरी मिलती है। पुस्तक की कथा-वस्तु का दायरा भी बहुत व्यापक है, जहाँ उर्दू शायरी के परंपरागत बिम्ब, प्रतीक और विषय भी हैं तो नए ज़माने का बदलाव और नए समय की सच्चाई भी।

गोविंद गुलशन साहब हमारे समय के बेह्तरीन ग़ज़लकारों में हैं। ग़ज़ल को उसकी तमाम ख़ूबसूरती के साथ बरतते हुए उसमें अपनी तरह का कुछ जोड़ना इनके लेखन की ख़ासियत है। 'हवा के टुकड़े' ग़ज़ल संग्रह की एक सौ ग़ज़लों से गुज़रने के बाद यह पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि गोविंद गुलशन ग़ज़ल विधा को अपने समय के साथ आगे बढ़ाने में सहायक होते हैं।

कानपुर के इरा पब्लिशर्स से वर्ष 2022 में इस ग़ज़ल संग्रह का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ है। किसी तरह की भूमिका के बगैर केवल दो पृष्ठों की अपनी बात के साथ कुल 100 ग़ज़लें रख दी गयी हैं। और पाठक पर छोड़ दिया गया है कि वह इन ग़ज़लों तक अपनी तरह से पहुँचकर देखे। मेरा पाठक-मन इन ग़ज़लों से गुज़रते हुए इनके लेखन के कई बिंदुओं से परिचित होता है। सादा जुबान में बिना किसी चमत्कारपूर्ण शब्दावली के, बिना उक्तिवैचित्र्य के, बिना किसी शोर-शराबे के बहुत सलीक़े के साथ हमें यहाँ गहरी व्यंजनात्मकता के साथ शायरी मिलती है। पुस्तक की कथा-वस्तु का दायरा भी बहुत व्यापक है, जहाँ उर्दू शायरी के परंपरागत बिम्ब, प्रतीक और विषय भी हैं तो नए ज़माने का बदलाव और नए समय की सच्चाई भी। कहन भी ऐसी, जो एक उम्र की साधना के बाद हासिल होती है।

दुनिया और साहित्य में लम्बे समय तक रहने के बाद हमारी एक समझ विकसित हो जाती है। हम ज़माने को अपनी तरह से देख-परख चुके होते हैं। और तब लेखन में वह समझ जब उतरती है तो शेरों के रूप में नायाब हीरे सृजित होते हैं। ये 'हीरे' शायरी पसंद करने वालों के लिए कई तरह से बेशक़ीमत होते हैं। एक इस रूप में भी कि ऐसे शेर, रहनुमाई भी करते दिखते हैं। जीवन के गहरे अर्थ लिए हुए ऐसी शायरी अपने भीतर व्यंजना की गूँज लिए रहती है। वैसे भी शायरी का मुख्य गुण व्यंजना ही तो है। शब्दों के माध्यम से जो अभिव्यक्त होता है, उस अभिव्यक्ति के चारों ओर जो एक गूँज बनती है, वह जो एकदम प्रकट न होकर कुछ देर में खुलता है, वह जब समझ में आता है तो लेखन का महत्व भी अलग होता है और आनंद भी। इन शेरों के भीतर की गूँज पकड़ने का प्रयास कीजिए-

ख़ूबसूरत  दिल  न हो तो टूट जाता है भरम
चल नहीं पाता हँसी चेहरों का जादू देर तक

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क़रीब जाने से चलता है शख्सियत का पता
ज़मीं  से  चाँद  ज़रा-सा   दिखाई  देता  है
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गुज़र-बसर के लिए कुछ न कुछ ज़रूरी है
बगैर काम  किए  काम  चल  नहीं सकता
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हक़ीक़त है ये सिर्फ़ जुमला नहीं है
मुसीबत  में कोई किसी का नहीं है
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लाएगी कभी रंग पसीने की कमाई
तक़दीर बदलने में ज़रा देर लगेगी

गोविंद गुलशन साहब अपनी दृष्टि का दायरा विस्तृत रखते हैं। अन्य शायरों की तरह ये एक बँधे-बँधाए ढर्रे पे नहीं रहते। इनके पास विषयों की व्यापकता भी है तो कहन के अंदाज़ की मौलिकता भी। इनकी ग़ज़लगोई में अपने समय की तस्वीर की झलक भी दिखाई देती है तो उसकी चिंताएँ भी अभिव्यक्त होती हैं। ये अपने दौर के बदलाव को भी दर्ज करते हैं तो उसके स्वभाव से भी पाठक को अवगत करवाते हैं। कुछ शेर देखिए-

दीये मिट्टी के शीशे का बदन पाकर हैं ख़ुश लेकिन
उजाले  की  वो ख़ुशबू  अब कहाँ अपने मकानों में
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वक़्त ने लिख दी है चेहरों पर इबारत मौत की
खौफ़ और  मायूसियों  के ये निशां पहले न थे
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हमारे  शहर में खुद्दार कम नहीं लेकिन
ज़मीर  बेचने  वालों  का  बोलबाला  है
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बँधे हैं जिनके जिस्मों पर पलीते बस तबाही के
वो  पुतले  क्यूँ  बनाए  जा रहे हैं कारख़ानों में
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अजी ये ख़ामुशी टूटे तो कैसे
ज़ुबानों पर यहाँ ताले बहुत हैं
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दिलों में खौफ़ रहता है, जुबानें बंद रहती हैं
यहाँ जब हादसा होता है, साँसें बंद रहती हैं
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अमीरे-शह्र  को  पैग़ाम  कोई  पहुँचा   दे
ग़रीब  लोग  भी आँखों में  00000000000000000ख़्वाब पालते हैं

ग़ज़ल की पारंपरिकता भी गोविंद गुलशन साहब के लेखन में अपनी पूरी ठसक के साथ मौजूद है। फिर वह चाहे ख़याल, फ़िक्र, कहन में हों या शब्दावली, बिम्ब, प्रतीक आदि में। पारंपरिकता की दृष्टि से देखें तो इनकी ग़ज़लें क्लासिक स्तर की हैं। बावजूद इनके पास जड़ता नहीं है और यही इनके लेखन का सर्वाधिक सबल पक्ष है। वे लेखन के हर एंगल में कुछ न कुछ अपनी तरफ का, कुछ न कुछ अलहदा करने का प्रयास करते हैं और यही ख़ूबी इनके लेखन को अपडेट रखती है। गोविंद गुलशन साहब पुराने को सहेजते हुए नया रचते हैं।

दर्शन और प्रेम के विभिन्न रूप क्यूँकि उर्दू शायरी की जान हैं, इसलिए शायद ही कोई ऐसा ग़ज़लकार हो जिसके लेखन में ये समाहित न हों। इनकी ग़ज़लों में दर्शन की बात हम ऊपर कर ही आये हैं, प्रेम के रंग के शेर भी देख लेते हैं। ये दो शेर केवल एक नमूना भर हैं, पूरी किताब में नर्म-नाज़ुक ख़यालों की बेह्तरीन शायरी मिलती है-

ज़िक्र  जब होता है उसका तो ख़यालों में मेरे
फूल-से खिलते हैं, ख़ुशबू-सी बिखर  जाती है
_____

तुम गले मिलते हो मुझसे तो बिछड़ने के बाद
देर  तक  ताज़गी   बाँहों  में  बनी  रहती  है

हर एक लेखक का बात कहने का अपना एक ढंग होता है, जो उसे अपने समय के दूसरे लेखकों से अलग करता है और वही उसकी पहचान की सनद बनता है। लेखन का यह अपना ढंग एकाध दिन में हाथ नहीं आता बल्कि इसके लिए दशकों तक तपस्या करनी पड़ती है। अपने इसी स्टाइल को खोजने के लिए एक रचनाकार जीवनभर हाथ-पैर मारता है, और जब यह हासिल हो जाता है तो लेखकों की हज़ारों-लाखों की भीड़ में उसका अपना चेहरा बनता है, उसका सिग्नेचर बनता है। गोविंद गुलशन साहब के लेखन को गंभीरता से देखने पर उसमें उनका चेहरा, उनका सिग्नेचर साफ़ दिखाई पड़ता है। वे अपनी बात अपनी तरह से कहते हैं-

ख़ूब काम आती है आपकी हुनरमंदी
आपका अँधेरों में तीर ख़ूब चलता है
_____

मैं कह रहा हूँ हवा है तो जल रहे हैं चराग़
वो  कह  रहे हैं चराग़ों से जल रही है हवा

कहना न होगा कि 'हवा के टुकड़े' ग़ज़ल संग्रह हमारे दौर की शायरी को समझने के क्रम में एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। उर्दू ग़ज़ल के चाहने वाले तो इसे पढ़कर झूमेंगे ही, लेखन और ग़ज़ल को समझने की कोशिश करने वाले अध्येता भी इस किताब से बहुत काम की चीज़ें पाएँगे। इरा पब्लिशर्स को एक बहुत अच्छे संग्रह के प्रकाशन के लिए ढेरों बधाइयाँ। गोविंद गुलशन साहब अपनी इन ग़ज़लों के ज़रिए हमेशा हमारे बीच रहेंगे।

 

समीक्ष्य पुस्तक- हवा के टुकड़े
विधा- ग़ज़ल (उर्दू)
रचनाकार- गोविंद गुलशन
प्रकाशन- इरा पब्लिशर्स, कानपुर (उ.प्र.)
संस्करण- द्वितीय, 2022

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रचनाकार परिचय

के० पी० अनमोल

ईमेल : kpanmol.rke15@gmail.com

निवास : रुड़की (उत्तराखण्ड)

जन्मतिथि- 19 सितम्बर
जन्मस्थान- साँचोर (राजस्थान)
शिक्षा- एम० ए० एवं यू०जी०सी० नेट (हिन्दी), डिप्लोमा इन वेब डिजाइनिंग
लेखन विधाएँ- ग़ज़ल, दोहा, गीत, कविता, समीक्षा एवं आलेख।
प्रकाशन- ग़ज़ल संग्रह 'इक उम्र मुकम्मल' (2013), 'कुछ निशान काग़ज़ पर' (2019), 'जी भर बतियाने के बाद' (2022) एवं 'जैसे बहुत क़रीब' (2023) प्रकाशित।
ज्ञानप्रकाश विवेक (हिन्दी ग़ज़ल की नई चेतना), अनिरुद्ध सिन्हा (हिन्दी ग़ज़ल के युवा चेहरे), हरेराम समीप (हिन्दी ग़ज़लकार: एक अध्ययन (भाग-3), हिन्दी ग़ज़ल की पहचान एवं हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा), डॉ० भावना (कसौटियों पर कृतियाँ), डॉ० नितिन सेठी एवं राकेश कुमार आदि द्वारा ग़ज़ल-लेखन पर आलोचनात्मक लेख। अनेक शोध आलेखों में शेर उद्धृत।
ग़ज़ल पंच शतक, ग़ज़ल त्रयोदश, यह समय कुछ खल रहा है, इक्कीसवीं सदी की ग़ज़लें, 21वीं सदी के 21वें साल की बेह्तरीन ग़ज़लें, हिन्दी ग़ज़ल के इम्कान, 2020 की प्रतिनिधि ग़ज़लें, ग़ज़ल के फ़लक पर, नूर-ए-ग़ज़ल, दोहे के सौ रंग, ओ पिता, प्रेम तुम रहना, पश्चिमी राजस्थान की काव्यधारा आदि महत्वपूर्ण समवेत संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
कविता कोश, अनहद कोलकाता, समकालीन परिदृश्य, अनुभूति, आँच, हस्ताक्षर आदि ऑनलाइन साहित्यिक उपक्रमों पर रचनाएँ प्रकाशित।
चाँद अब हरा हो गया है (प्रेम कविता संग्रह) तथा इक उम्र मुकम्मल (ग़ज़ल संग्रह) एंड्राइड एप के रूप में गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध।
संपादन-
1. ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका के मार्च 2015 से फरवरी 2021 तक 68 अंकों का संपादन।
2. 'साहित्य रागिनी' वेब पत्रिका के 17 अंकों का संपादन।
3. त्रैमासिक पत्रिका ‘शब्द-सरिता’ (अलीगढ, उ.प्र.) के 3 अंकों का संपादन।
4. 'शैलसूत्र' त्रैमासिक पत्रिका के ग़ज़ल विशेषांक का संपादन।
5. ‘101 महिला ग़ज़लकार’, ‘समकालीन ग़ज़लकारों की बेह्तरीन ग़ज़लें’, 'ज़हीर क़ुरैशी की उर्दू ग़ज़लें', 'मीठी-सी तल्ख़ियाँ' (भाग-2 व 3), 'ख़्वाबों के रंग’ आदि पुस्तकों का संपादन।
6. 'समकालीन हिंदुस्तानी ग़ज़ल' एवं 'दोहों का दीवान' एंड्राइड एप का संपादन।
प्रसारण- दूरदर्शन राजस्थान तथा आकाशवाणी जोधपुर एवं बाड़मेर पर ग़ज़लों का प्रसारण।
मोबाइल- 8006623499