Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की नौवीं कड़ी

देवयानी….. देवयानी! देवयांक! ओह! अपनी ग़लती से मैंने अपनी पूरी दुनिया उजाड़ ली। मैं भी! कौन से ज़माने में पहुँच गया। देवयांक अब छोटा बच्चा कहाँ, उसके ख़ुद मेरी छुटकी-सी लाड़ली-सी बिटिया चिया है। मेरी चिया! सबसे दूर हो गया मैं।" देव के आँखों से आँसू की अविरल धारा बहने लगी।

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की बाईसवीं कड़ी

जानती हो शिखा, जब प्रीति गयी थी, मेरे पास प्रणय था। मेरे अकेलेपन का साथी। उस समय जो भी महसूस करते, एक-दूसरे से साझा करते। वह काफ़ी दिनों तक मेरे साथ रहा। पर तुम्हारा सोचकर मेरा जी घबराता था, क्योंकि मुझे सार्थक के व्यवहार के बारे में सब पता था।

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की आठवीं कड़ी

कुछ एहसास रूई के मानिंद नर्म और मुलायम होते हैं देव! कुछ एहसास रूह से परे मन को मुट्ठी में बाँध, आकाश में हल्के-हल्के उड़ते रहते हैं। एहसास! हाँ तुम्हारा मेरे क़रीब होने का एहसास, मन की धरती को प्रेम- प्यार में भिगोकर रखता है। तुम मेरे आस-पास हो। तुम्हारे होने के नर्म अहसास के घेरे ने मुझे चारों ओर से घेर रखा है।

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की इक्कीसवीं कड़ी

शिखा की बात सुनकर दोनों देवर भावुक हो उठे। जब दोनों ने बहू के बारे में पुनः पूछा तो शिखा ने चुप्पी साध ली, क्योंकि इस बात का उसके पास कोई जवाब नहीं था। आजकल कोई भी कितना क़रीबी ही क्यों न हो, बहुत प्रश्न नहीं पूछता। सच तो यह भी है कि कोई ज़्यादा जवाब नहीं देना चाहता। आज आत्मीयता भी औपचारिकताओं को ओढ़कर आती है।