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पैमाने नये आये : अवाम की आवाज़ से निकली हुई ग़ज़ल- डॉ० ज़ियाउर रहमान जाफ़री

पैमाने नये आये : अवाम की आवाज़ से निकली हुई ग़ज़ल- डॉ० ज़ियाउर रहमान जाफ़री

अशोक कुमार नीरद की ग़ज़लें ज़मीन से जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि हिंदी ग़ज़ल के बेशतर आलोचकों के भी वह प्रिय शायर हैं। कमलेश भट्ट 'कमल' को जहाँ उनकी ग़ज़लों का तेवर पसंद आता है, वहीं हरेराम समीप और अनिल गौड़ को उनके द्वारा ग़ज़ल में किए गये प्रयोग अच्छे लगते हैं।

हिंदी ग़ज़ल परंपरा में कई रचनाकार ऐसे हैं, जो मूलतः दूसरी विधाओं में रहकर हिंदी ग़ज़ल में आए हैं। उसमें भी वो रचनाकार अधिक हैं, जिनका ताल्लुक हिंदी गीत अथवा नवगीत से रहा है। स्वयं दुष्यंत भी हिंदी कविता से ग़ज़ल की तरफ़ नमूदार हुए थे। उन्होंने इसकी वजह भी बताई, और वह वजह थी, अपनी बोझिलता के कारण छंद मुक्त कविता का पाठकों से दूर हो जाना।

असल में नवगीत से ग़ज़ल की तरफ़ आने के कुछ अपने कारण भी हैं। ग़ज़ल और नवगीत अलग-अलग विधा होने के बावजूद दोनों एक-दूसरे से कुछ न कुछ नज़दीक हैं। दोनों ही छान्दसिक विधा हैं, और दोनों का अपना तुक विधान है। अंतर मूल रूप से लहजे का है। ग़ज़ल में जहाँ पुरुषत्व बोलता है, वहीं नवगीत की विधा में कोमलता प्रमुख रही है।

अशोक कुमार 'नीरद' भी ऐसे ही रचनाकार हैं, जो ग़ज़ल में आने से पहले नवगीत में स्थापित हो चुके थे। नीरद दुष्यंत के समकालीन हैं। जिस समय दुष्यंत ग़ज़ल लिख रहे थे, अशोक कुमार नीरद उस समय गीत रचना में अपने को लगातार स्थापित कर रहे थे।

मुशायरों में ग़ज़लों की लोकप्रियता ने उन्हें ग़ज़ल की तरफ़ आकृष्ट किया, इसका मतलब यह नहीं है कि वह ग़ज़ल के नए शायर हैं। अशोक कुमार 'नीरद' पिछले पचास वर्ष से अधिक समय से ग़ज़लें कहते-लिखते और सुनते आ रहे हैं। यह अलग बात है कि उनकी ग़ज़लों का पहला संग्रह 2008 में 'जुगनू को सूरज का भ्रम है' नाम से प्रकाशित हुआ, लेकिन फिर यह सिलसिला लगातार चल पड़ा। 'दीवारों के जाल', 'अंकुर बोलते हैं', 'पैमाने नये आये' जैसे ग़ज़ल संग्रह उनके लगातार प्रकाशित होते गये। यहाँ तक कि मुंबई विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भी उनकी ग़ज़लें प्रमुखता से रखी गयीं।

अशोक कुमार नीरद की ग़ज़लें ज़मीन से जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि हिंदी ग़ज़ल के बेशतर आलोचकों के भी वह प्रिय शायर हैं। कमलेश भट्ट 'कमल' को जहाँ उनकी ग़ज़लों का तेवर पसंद आता है, वहीं हरेराम समीप और अनिल गौड़ को उनके द्वारा ग़ज़ल में किए गये प्रयोग अच्छे लगते हैं।

पैमाने नये आये अशोक कुमार 'नीरद' के सौ से अधिक ग़ज़लों का संग्रह है, जिससे गुज़रते हुए उनकी ग़ज़लों के कथ्य की कसावट और बहर की पुख्तगी का पता चलता है। नीरद जब कहते हैं-

सबकी आँखों का नूर कंचन है
दोषियों में शुमार दर्पण है

तो वह उस सारी व्यवस्था को कटघरे में लाकर खड़े कर देते हैं, जहाँ मज़लूम को ज़ालिम क़रार देने की रवायत चल पड़ी है।

उनके ज़्यादातर शेर किसान, मज़दूर और उस वंचित वर्ग के साथ हैं, जिनकी मासूमियत ने उन्हें फ़रेब में डाल रखा है। ऐसा भी नहीं है कि वह सिर्फ समस्या खड़ी करते हैं, बल्कि अक्सर उसका हल भी सुझाते हैं, और यही व्यवस्था उन्हें समकालीन ग़ज़लकार से अलग करती है। किसान पर हिंदी ग़ज़ल में बहुत लिखा गया। उससे सहानुभूति दिखाई गई, पर जब नीरद किसान को अपनी ग़ज़लों में लाते हैं, तो सबसे पहले इस मार्ग की कठिनाइयों के प्रति आगाह करते हैं-

खेती करेगा ख़ाक मोहब्बत की बावरे
इसमें चुकाना पड़ता है ख़ुद को लगान में

यह शेर अपनी व्यंजनावली में उन सिरफिरे लोगों के लिए भी है, जिन्होंने मुहब्बत को आसान समझ रखा है। कबीर ने कभी आगाह किया था कि यह वह रास्ता हैं, जिसमें अपने घर को ख़ुद आग लगानी पड़ती है।

शायर का ध्यान गिरते हुए नैतिक पतन पर भी है। एक समय था, जब मनुष्य की पहचान उसके चरित्र से होती थी। आज यह जगह दौलत ने ले ली है। अशोक कुमार 'नीरद' का एक सीधा-सा शेर इस सच्चाई को खोलकर रख देता है-

दौलत बढ़ी है ख़ूब पर इज़्ज़त नहीं रही
इस दौड़ में ज़मीर की क़ीमत नहीं रही

वे अपनी ग़ज़लों में सचेत करते हैं, और इस सच्चाई से अवगत कराते हैं कि वक्त बदलने में वक्त नहीं लगता-

हिक़ारत से जिन्हें तुम देखते हो
उन्हीं क़तरों से तो सागर बने हैं

और फिर यह भी कि-

इशारों पे मेरे चलती थी कल तक
वही दुनिया मुझे ठुकरा चुकी है

अशोक कुमार 'नीरद' की ग़ज़लें कई शैली से होकर गुज़रती हैं। भाषा के नज़रिए से जहाँ उन्होंने हिंदी-संस्कृत का मोह अधिक रखा है, वे ग़ज़लें कमज़ोर पड़ी हैं, लेकिन जहाँ वे बोलचाल की आम ज़बान अपनाते हैं, जो हिंदी ग़ज़ल की फ़ितरत भी है, वे शेर अच्छे बन पड़े हैं। कई जगह पर बहर की बंदिश ने भी कथ्य को प्रभावित किया है। समकालीन हिंदी ग़ज़ल कई बार रूपवादी रुझानों के कारण यथार्थ और अभिव्यक्ति से दूर हो जाती है।

कहना न होगा कि अशोक कुमार 'नीरद' के पास ग़ज़ल का हुनर है। आसपास की घटनाओं को भी रखने के तौर-तरीके हैं, और उसे ख़ूबसूरती से समेटने की शैली और मोडेलिटी है। यही कारण है कि हिंदी ग़ज़ल की नित्य बढ़ती हुई भीड़ में भी उनका चेहरा नुमाया नज़र आता है।

 

 

समीक्ष्य पुस्तक- पैमाने नये आये
विधा- ग़ज़ल (हिंदी)
रचनाकार- अशोक कुमार 'नीरद'
प्रकाशन- लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
संस्करण- प्रथम, 2025
मूल्य- 375/-

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रचनाकार परिचय

ज़ियाउर रहमान जाफ़री

ईमेल :

निवास : नवादा (बिहार )

नाम- डॉ.ज़ियाउर रहमान जाफरी
जन्मतिथि-10 जनवरी 1978
जन्मस्थान- भवानन्दपुर,बेगूसराय, बिहार
शिक्षा- एम.ए. (हिन्दी, अंग्रेजी, शिक्षा शास्त्र)बीएड,पत्रकारिता, पीएचडी हिन्दी, यू जी सी नेट (हिन्दी )
संप्रति- सरकारी सेवा

प्रकाशित कृतियाँ-
1. खुले दरीचे की खुशबू- हिंदी गजल
2. खुशबू छू कर आई है- हिंदी गजल
3.परवीन शाकिर की शायरी- हिंदी आलोचना
4.ग़ज़ल लेखन परंपरा और हिंदी ग़ज़ल का विकास-हिन्दी आलोचना
5. हिंदी गजल :स्वभाव और समीक्षा - हिंदी आलोचना
6. चांद हमारी मुट्ठी में है- हिंदी बाल कविता
7. आखिर चांद चमकता क्यों है- हिंदी बाल कविता
8. मैं आपी से नहीं बोलती -उर्दू बाल कविता
9. चलें चांद पर पिकनिक करने- उर्दू बाल कविता
10. लड़की तब हंसती है- संपादन

पुरस्कार एव सम्मान-
आपदा प्रबंधन पुरस्कार,बिहार शताब्दी सम्मान,यशपाल सम्मान तथा शाद अजीबाबादी साहित्य एवं समाज सेवा सम्मान समेत पचास से अधिक सम्मान एवं पुरस्कार

संपादन एवं पत्रकारिता-
संवादिया( बाल पत्रिका)जागृति, निगाह, चल पढ़ कुछ बन, साहित्य प्रभा आदि में सहयोगी संपादक एवं दैनिक हिंदुस्तान समेत कई पत्र -पत्रिकाओं में पत्रकारिता। 

विशेष-
. आकाशवाणी पटना दरभंगा भागलपुर, डीडी बिहार,ई टीवी बिहार आदि से नियमित प्रसारण
. बाल कविता नासिक के पाठ्यक्रम में शामिल
. पीएचडी उपाधि हेतु कई शोधार्थियों द्वारा ग़ज़ल साहित्य पर शोध
. देश भर के कई सेमिनारों और मुशायरों में शिरकत

पता-
C/O-एस. एम इफ़्तेख़ार काबरी
(पेशकार )
शरीफ कॉलोनी,बड़ी दरगाह, नियर बीएसएनएल टॉवर,पार नवादा
ज़िला -नवादा(बिहार) 805112
मोबाइल-6205254255
मोबाइल -9934847941