Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
पिता होना- सुधा गोयल

यह वह वक्त था, जब लड़कियाँ अकेली घर से बाहर नहीं निकलती थीं। आप उन परम्पराओं से बग़ावत करना सिखा रहे थे। और मैं क़दम-क़दम आपके सिखाए या दिखाए रास्ते पर चल रही थी। आप मुझे गढ़ रहे थे। हिम्मत से आगे बढ़ा रहे थे। मैं आपका सपना थी और आप वह सपना पूरा कर रहे थे। आप राजनैतिक जलसों में भी साथ ले जाने लगे थे। राजनीति का क-ख-ग भी आपसे सीखे रही थी।

मृद्गंध की स्मृति : हरिगढ़ की मिट्टी से नगर के आकाश तक- डॉ० मुकेश कुमार

प्रातःकाल के सूरज की लालिमा खेतों में फैल रही थी। बालक अपने छोटे पाँव हल की पथरीली रेखाओं पर रखकर चलता और बैलों की धीमी चाल तथा हल की खुरचाइयाँ उसके भीतर जीवन में संतुलन और स्थिरता का भाव पैदा कर रही थी।

बचपन की चोरी- अंजू केशव

गर्मियों में जब पूरा परिवार दोपहर की नींद का मजा ले रहा होता तो माँ के बनाए हुए अचार चुरा कर खाना प्रिय शगल था। क्या आनंद था उसमें आहाहा! भुलाए नहीं भूलता। एक बार तो इस चोरी के चक्कर में, नए बने अचार की पूरी की पूरी बरनी ही ऊँचाई से गिरा कर तोड़ दी और बरनी के साथ अचार का भी सत्यानाश कर दिया।

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी- गोपाल खन्ना

बाबू के सर से रक्त की धार बह चली होगी। बाबू के हाथ से चाय की केतली छूट कर गिर गई होगी, गर्म चाय और अपने रक्त के ऊपर बाबू निढाल पड़े खुली आँखों से इस बेरहम दुनिया को अलविदा कह रहे होंगे। केतली से गिरी चाय ने खून की लालिमा को कुछ सफेद कर दिया होगा।