Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
संवेदना का नया रूपाकार : शब्द बहुरुपिए हो गए- डॉ० शुभा श्रीवास्तव

संग्रह की कुछ कविताएँ पाठक से लगातार संवाद करती हैं। यह संवाद जीवन संपृक्ति का भी है और जीवन राग का भी है। इन कविताओं में कहीं भी तृष्णा, क्रोध, बदला जैसे भावों को दूर-दूर तक स्पर्श नहीं किया है। अपनी बात कहने की एक लय है।

जीवन के विविध पहलुओं पर गहराई से सोचने के लिए मजबूर करता संग्रह- रामनाथ यादव 'बेख़बर'

प्रस्तुत संग्रह का शायर अपने समय और समाज के तमाम सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील और जागरूक है और अपनी ग़ज़लों में इन मुद्दों को बेबाकी से उठाता है। उनकी ग़ज़लें सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता, समानता और मानवता की भावना को प्रोत्साहित करती हैं।

व्यंग्य विधा की पुस्तक-सिर मुँडाते ओले पड़े- डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

हिंदी में व्यंग्य की किताब उस अनुपात में नहीं आ रही है, जिस अनुपात में गद्य और पद्य की अन्य विधाओं का प्रकाशन हो रहा है। अभी भी व्यंग्य का नाम आते ही हमारा ध्यान हरिशंकर परसाई, काका हाथरसी और हुल्लर मुरादाबादी जैसे कुछ लोगों तक सिमट कर रह जाता है.समकालीन साहित्य में संतोष दिवाकर एक अच्छे व्यंग्य लेखक हैं। एक समय में उनकी व्यंग्य क्षणिकायें काफ़ी सुनी जाती थी। भारतीय स्टेट बैंक में नौकरी करते हुए भी उन्होंने अपने साहित्य को जिंदा रखा है, यही कारण है कि उनके व्यंग्य की एक नई किताब सर मुंडाते ओले पड़े छप कर आई है। इस पुस्तक में उनके व्यंग्य विधा के पचहत्तर निबंध हैं। सबसे बड़ी बात कि इस निबंध के विषय हमारे आसपास के हैं, लेकिन संतोष दिवाकर अपनी प्रतिभा से इस अभिधावली को व्यंजनात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके व्यंग्य की वो धार है, जिससे कोई नहीं बच पाया है।

ग़ज़लगोई को समझने के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए : आसमां तू ही बता- के० पी० अनमोल

संग्रह की ग़ज़लों के विषय विविधता भरे हैं। लहजे को परंपरागत ही रखते हुए मक़सूद साहब परंपरागत घेरे के बाहर से भी अपने कथ्य चुनते हैं, साथ ही अपनी कहन को विशेष रखने का प्रयास करते हैं और यहाँ वे गज़लगोई में सफल हो उठते हैं।