Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
रूपम झा के नवगीत

युवा कवि रूपम झा नवगीत सहित कई विधाओं में समान हस्तक्षेप रखती हैं। रूपम झा के नवगीतों का कथ्य प्रभावशाली है, जो जनपक्षधरता के हित में बेबाक अभिव्यक्त होता है। वे सत्ता के मूल चरित्र को बिना किसी लाग-लपेट के न सिर्फ़ सीधा प्रस्तुत करती हैं बल्कि वाजिब सवाल भी करती हैं। कहना अनुचित न होगा कि इनके गीतों में सामाजिक विसंगतियों की सहज एवं प्रभावी अभिव्यक्ति है। इनके गीतों में स्त्री साहसी है, प्रतिरोधी है , क्रान्तिकारी चेतना से लैस है।रूपम की वैचारिक ज़मीन निश्चित ही उर्वर है।

- अनामिका सिंह

मयंक श्रीवास्तव के नवगीत

अल्हड़पन लेकर पछुआ का
घिर आयीं निर्दयी घटाएँ
दूर -दूर तक फैल गयी हैं
घाटी की सुरमई जटाएँ
ऐसे मदमाते मौसम में
जाने कौन-कौन तरसेंगे

माहेश्वर तिवारी के गीत

अपने गीतों की गुणवत्ता में माहेश्वर तिवारी नितान्त अलग और मौलिक हैं। अपने समय के यथार्थ को चित्रित करने का उनका अपना अंदाज़ रहा। भाषाई सहजता, आँचलिकता और प्राकृतिक बिम्ब उनके गीतों का मज़बूत पक्ष हैं। प्रकृति उनके गीतों में कुछ अलहदे अंदाज़ में उतरती है। जिस तरह वे अपने गीतों में प्रेम और प्रकृति की जुगलबंदी में भाषाई अलंकरण को बहुत ही परिष्कृत रचनात्मकता का हिस्सा बनाते हैं, वह सम्मोहित करता है। बिम्ब और व्यंजना के प्रयोग में यदि कहीं भी असंतुलन हो तो वह गीत अपनी नाज़ुकी और संप्रेषणीयता से मुँह फेर बैठता है। किन्तु माहेश्वर तिवारी के नवगीतों में ऐसी असंगतियों की लगभग अनुपस्थिति है। प्रेम के अनगिन गीत रचने पर भी उन्हें सिर्फ प्रेम का कवि कहना असंगत होगा क्योंकि उनके नवगीत प्रेम का एक विराट फ़लक तो रचते ही हैं किन्तु अपने समय, जीवन, परिवार, समाज एवं सत्ता की प्रमुख समस्याओं और विसंगतियों को बहुत गम्भीरता और लेखकीय दायित्व के साथ स्पर्श करते हुए माहेश्वर जी के नवगीतों में भाषा के लालित्य और कहन पर बहुत कुछ कहने के बाद कुछ न कुछ शेष रह जाने की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी।

- अनामिका सिंह

राम शंकर वर्मा के गीत

गीत कि जिनमें भीना-भीना
हलवाहे का चुवे पसीना
ढूँढ़े जो गारे तसले में
अपना काशी और मदीना
मेड़ों पर घसियारिन जिसमें
टेर रही हो मीत
भारती!
गाऊॅं ऐसे गीत