Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
माहेश्वर तिवारी के गीत

अपने गीतों की गुणवत्ता में माहेश्वर तिवारी नितान्त अलग और मौलिक हैं। अपने समय के यथार्थ को चित्रित करने का उनका अपना अंदाज़ रहा। भाषाई सहजता, आँचलिकता और प्राकृतिक बिम्ब उनके गीतों का मज़बूत पक्ष हैं। प्रकृति उनके गीतों में कुछ अलहदे अंदाज़ में उतरती है। जिस तरह वे अपने गीतों में प्रेम और प्रकृति की जुगलबंदी में भाषाई अलंकरण को बहुत ही परिष्कृत रचनात्मकता का हिस्सा बनाते हैं, वह सम्मोहित करता है। बिम्ब और व्यंजना के प्रयोग में यदि कहीं भी असंतुलन हो तो वह गीत अपनी नाज़ुकी और संप्रेषणीयता से मुँह फेर बैठता है। किन्तु माहेश्वर तिवारी के नवगीतों में ऐसी असंगतियों की लगभग अनुपस्थिति है। प्रेम के अनगिन गीत रचने पर भी उन्हें सिर्फ प्रेम का कवि कहना असंगत होगा क्योंकि उनके नवगीत प्रेम का एक विराट फ़लक तो रचते ही हैं किन्तु अपने समय, जीवन, परिवार, समाज एवं सत्ता की प्रमुख समस्याओं और विसंगतियों को बहुत गम्भीरता और लेखकीय दायित्व के साथ स्पर्श करते हुए माहेश्वर जी के नवगीतों में भाषा के लालित्य और कहन पर बहुत कुछ कहने के बाद कुछ न कुछ शेष रह जाने की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी।

- अनामिका सिंह

राम शंकर वर्मा के गीत

गीत कि जिनमें भीना-भीना
हलवाहे का चुवे पसीना
ढूँढ़े जो गारे तसले में
अपना काशी और मदीना
मेड़ों पर घसियारिन जिसमें
टेर रही हो मीत
भारती!
गाऊॅं ऐसे गीत

ज्योति जैन 'ज्योति' के गीत

पैर धरातल पर ही रखना,
सुता, न देना हद उमगाय।

अनामिका सिंह के नवगीत

हमने जो
रेखाएँ खीचीं
रबर फिरा दी तुमने उन पर
फिर भी काग़ज़
अगर उठाया
तुमने लिखा रसोई , बिस्तर