Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
मुझसे उनका लगाव कुछ अलग ही तरह का था- दीपक जैन 'दीप'

मेरी ज़िंदगी मे आपके होने के तसव्वुर को मैं शायद आज तक कोई नाम नहीं दे पाया हूँ। आपके सुलूक़ से कभी लगता था कि आप मुझे अपना भाई समझते हैं, कभी लगता था दोस्त समझते हैं, कभी लगता था आप मेरी रहबरी फ़रमा रहे हैं, कभी बच्चों की तरह दुलार रहे हैं।

ग़ज़लकार गोविंद गुलशन तथा जीवन और मौत का फ़लसफ़ा- के० पी० अनमोल

गोविंद गुलशन साहब को पढ़ते हुए बार-बार एक बिंदु पर ध्यान जाता रहा कि इनके लेखन में जीवन और मौत को कई तरह से समझा गया है, परिभाषित किया गया है। वे जीवन को उसकी पूरी धड़कन के साथ महसूस करते हैं तो मौत को उसकी पूरी जड़ता के साथ।

चक्कर लगा रही हैं हवाएँ उसी के पास- संतोष सिंह

रोज़मर्रा की ज़िंदगी की उधेड़-बुन, आशा-निराशा, हार-जीत तथा धूप-छाँव को अपने में समेटती गोविन्द गुलशन जी की ग़ज़लें विविधता से भरी हुई हैं।

गोविंद गुलशन : एक बरस की शनासाई, सदियों का रिश्ता- अज़ीज़ नबील

गोविन्द गुलशन साहब से तअल्लुक़ का वक़्त भले ही मुख़्तसर रहा, मगर उनकी मुहब्बत और ख़ुलूस ने उसे सदियों की शनासाई बना दिया। वो सिर्फ़ शायर नहीं, उर्दू तहज़ीब की एक ज़िंदा मिसाल थे। उनकी आवाज़, उनका लहजा और उनका कलाम आज भी दिलों में गूँजता है। कुछ लोग रुख़्सत होकर भी जाते नहीं, गुलशन साहब अब भी हमारे एहसासों में एक ख़ूबसूरत बाज़गश्त की तरह मौजूद हैं।