Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
डॉ० नीरज शर्मा 'सुधांशु' की लघुकथाएँ

गलियारे में कई मोड़ों से गुज़रते हुए आखिर वह कोठरिया आ ही गई जहाँ एक बूढ़ी महिला, बीच से ढीले, नीचे लटके बान के झिंगोले में धँसी खाँस रही थी।
डॉक्टर सुमित को देखते ही उसकी ललाई आँखों में उम्मीद की किरण जगमगाई। लगातार खाँसने से ज़बान अटक गई थी। मूक याचना करते कँपकँपाते उसके हाथ जुड़ गए थे।

संध्या तिवारी की लघुकथाएँ

मुझे  फैक्ट्री के सारे मुलाजिम हमेशा ही फैक्ट्री में बजने बाले हूटर के गुलाम सरीखे दिखते थे। हालांकि ये सब नियम से नहाते-धोते ,खाते-पीते थे, लेकिन इनके जीवन में स्फूर्ति न थी। एक यन्त्रवत जीवन यापन था। एक अनकही यन्त्रणा थी।

सुधीर द्विवेदी की लघुकथाएँ

"तुम्हे दकियानूसी लोगों की बातों को सीरियसली नहीं लेना चाहिए। " समझाते हुए पत्नी ने फौरन पति के हाथों से चाक़ू छुड़ाया और मुस्कुरा कर उसके हाथों में चाय का कप थमा दिया।

दिव्या शर्मा की लघुकथाएँ

"तुम्हारे लिए सफेद रंग जरूरी है।"
वह इस रंग को अपने से दूर रखना चाहती थी, क्योंकि यह रंग तो उसने न दिया था…
...लेकिन सफेद  रंग तन के साथ उसके मन पर भी पोत दिया गया। उसके दिए हुए सारे रंग छूट गए।