Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
अनिल पुरोहित की कहानी 'छत की दरार'

उसे वो दिन याद आया- शादी का पहला साल था, प्रमोद एक बार उसे जवाहर कला केन्द्र घुमाने ले गया था। वहाँ नाटक देखने गए थे, और बाद में चाय की दूकान पर बैठकर घंटों बातें की थीं। किरन हँसती थी, चाय में बिस्कुट डुबोकर। प्रमोद भी मुस्कुराता था- तब उसकी मुस्कान आँखों में उतरती थी।

लेकिन अब, जैसे सब कुछ फीका हो गया था।

सुधा गोयल की कहानी 'वसंत कब आएगा'

जीवन कच्चे सूत का धागा नहीं, जिसे एक ही झटके से तोड़कर फेंक जा सके। काकी तो स्वयं मुक्त होना चाहती थीं। सारे सुख-दुख उन्होंने देख लिए थे। अब कोई इच्छा शेष न थी।

स्नेह गोस्वामी की कहानी 'ऐसा यहाँ होता है'

बिशनसिंह ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी। अभी तो साढे नौ ही बजे हैं, वे लोग ग्यारह बजे से पहले तो क्या ही आएँगे। साढ़े दस का तो टाइम ही दिया है उन्होंने। उसे अपनी घड़ी पर गुस्सा आया। आज इतनी धीमी चल रही है कि ले राम का नाम। फिर अपनी ही सोच पर उसे हँसी आ गयी। बेचारी घड़ी का क्या कसूर!

नीरजा हेमेन्द्र की कहानी 'यह शाम का समय है'

कभी-कभी मैं सोचता कि बच्चे जब माता-पिता की बात नहीं मानते, उनके अनुभवों का लाभ उठाना नहीं चाहते तथा जीवन के प्रमुख निर्णय विवाह इत्यादि अपनी इच्छा से कर लेते हैं तो जीवन की दुश्वारियों को फेस क्यों नही कर पाते? असफल होने पर माता-पिता को दोष क्यों देते हैं?