Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
सीमा सिंह की कहानी- वो अजनबी

तैयार होने के बाद ज़रूरत का सामान बैग में रखकर एक नज़र घड़ी पर डाली तो आठ बजने में दस मिनट अभी भी बाक़ी थे। कस कर जूड़े में बाँधे हुए बालों को खोल कर ब्रश से सँवारा और यूँ ही मुक्त छोड़ दिया अपने कंधों पर लहराने के लिए। मुकुल ने डोरबैल बजाने के लिए हाथ रखा ही था कि हल्के धक्के से दरवाज़ा खुल गया।वत्सला शीशे के सामने खड़े होकर कभी बाएँ कभी दाएँ गरदन घुमा कर खुद को निहार रही थी ठीक तभी मुकुल ने कमरे में प्रवेश किया।

"आईना देखकर कहते हैं सँवरने वाले,
आज बेमौत मरेंगे मेरे मरने वाले।"

रूप सिंह चंदेल की कहानी- हुण्डी

उस दिन पति से झगड़ने के बाद उसने पिता को फोन किया। सुनकर अमर बहादुर सिंह बोले, “चिन्ता न कर नन्दिनी। तू तुषार को लेकर दस मिनट के लिए फ्लैट से बाहर जा और मुझे बता कि तू बाहर आ गयी है। फिर देख मैं क्या तमाशा खड़ा करूँगा। तेरे सास-ससुर को नचा न दिया तो मेरा नाम....” नन्दिनी ने उनके सुझाव के अनुसार पार्क में जाकर उन्हें फोन किया और पाँ। मिनट बाद फ्लैट में वापस लौट गयी। उन्होंने उसके ससुर को फोन करके कहा, “कितने शर्म की बात है कि आपने मेरी बेटी को घर से निकाल दिया है। वह बेटे के साथ सड़क पर बैठी हुई है।”

राजेन्द्र राव की कहानी- थप्पड़

विशाल ने भी आवेग में और क्षणिक त्वरा में उसे चूम तो लिया मगर दूसरे ही क्षण उसे इसमें भावना प्रधानता न होने की कमी खलने लगी। वह मनोगत होकर सोचने लगा कि चुंबन सरासर एक रासायनिक क्रिया है जिसमें दो अलग अलग तत्व एक दूसरे से प्रतिक्रियायित होते हैं। उस क्षण वह जैसे ज्वार की लहर पर सवार था मगर बस किनारे की रेत को भिगो कर लौट आया। उधर बस एक समशीतोष्ण रेस्पान्स था। रेस्पान्स था भी कि नहीं, उसे निश्चित रूप से पता नहीं था।

मंजूश्री की कहानी - एक नई सुबह

मैं कमरे की खिड़की पर खड़ी सोचने लगी कि क्या सोचकर मैं इस अपरिचित जगह पर सबकुछ छोड़कर चली आयी हूँ! ये घर, ये लोग, ये रिश्ते सब तो अपरिचित हैं। बीच में कहीं भी किसी से जुड़ाव नहीं, लगाव नहीं। कहीं किसी भी रिश्ते में नहीं। कोई सपने नहीं, पुलक नहीं, उछाह नहीं, उस व्यक्ति के लिए भी नहीं, जिसके सहारे मैं सबकुछ छोड़कर चली आयी हूँ। झटका लगा ये क्या किया मैंने! क्या वाक़ई मेरा क़दम सही था?