Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
महेश कुमार केशरी की कहानी 'धूप के रेशे मुलायम हैं'

पैतनपुर गाँव, जहाँ उसका जन्म हुआ था। बचपन से ही वो इस माहौल में पला-बढ़ा। उसके पिताजी भी कट्टे ही बनाते थे। कोई तीन-चार सौ लोग रहते हैं उस गाँव में। सबका यही व्यवसाय है। कट्टा बनाने का। लीगल तरीके से यहाँ कुछ नहीं होता।

दिलीप कुमार सिंह की कहानी- लॉस्ट एंड फाउंड

मुंबई के उपनगर मीरा रोड के बैंजो लेन में पहले तल पर 'जाज़' ओपन एयर रेस्टोरेंट की ये एक उदास शाम थी। इस रेस्टोरेंट में सब कुछ खुला ही था यहाँ तक किचन भी, सिर्फ वॉशरूम ढके-मुँदे थे। 'जाज़' रेस्टोरेंट की खासियत ये थी कि यहाँ गीत-संगीत हमेशा गुंजायमान रहता था। उनके पास पेशेवर गाने वाले लोग थे जो कस्टमर की डिमांड पर गाने गाया करते थे और हर वीकेंड पर एक स्पेशल कलाकार का शो होता था, वो कलाकार अच्छे मगर सस्ते होते थे, ज़ाहिर है हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में काम पाने की कोशिश कर रहे लोगों मजमा यहाँ जमा होता था।

अनिल पुरोहित की कहानी 'छत की दरार'

उसे वो दिन याद आया- शादी का पहला साल था, प्रमोद एक बार उसे जवाहर कला केन्द्र घुमाने ले गया था। वहाँ नाटक देखने गए थे, और बाद में चाय की दूकान पर बैठकर घंटों बातें की थीं। किरन हँसती थी, चाय में बिस्कुट डुबोकर। प्रमोद भी मुस्कुराता था- तब उसकी मुस्कान आँखों में उतरती थी।

लेकिन अब, जैसे सब कुछ फीका हो गया था।

सुधा गोयल की कहानी 'वसंत कब आएगा'

जीवन कच्चे सूत का धागा नहीं, जिसे एक ही झटके से तोड़कर फेंक जा सके। काकी तो स्वयं मुक्त होना चाहती थीं। सारे सुख-दुख उन्होंने देख लिए थे। अब कोई इच्छा शेष न थी।