Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
दिलीप कुमार सिंह की कहानी- लॉस्ट एंड फाउंड

मुंबई के उपनगर मीरा रोड के बैंजो लेन में पहले तल पर 'जाज़' ओपन एयर रेस्टोरेंट की ये एक उदास शाम थी। इस रेस्टोरेंट में सब कुछ खुला ही था यहाँ तक किचन भी, सिर्फ वॉशरूम ढके-मुँदे थे। 'जाज़' रेस्टोरेंट की खासियत ये थी कि यहाँ गीत-संगीत हमेशा गुंजायमान रहता था। उनके पास पेशेवर गाने वाले लोग थे जो कस्टमर की डिमांड पर गाने गाया करते थे और हर वीकेंड पर एक स्पेशल कलाकार का शो होता था, वो कलाकार अच्छे मगर सस्ते होते थे, ज़ाहिर है हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में काम पाने की कोशिश कर रहे लोगों मजमा यहाँ जमा होता था।

अनिल पुरोहित की कहानी 'छत की दरार'

उसे वो दिन याद आया- शादी का पहला साल था, प्रमोद एक बार उसे जवाहर कला केन्द्र घुमाने ले गया था। वहाँ नाटक देखने गए थे, और बाद में चाय की दूकान पर बैठकर घंटों बातें की थीं। किरन हँसती थी, चाय में बिस्कुट डुबोकर। प्रमोद भी मुस्कुराता था- तब उसकी मुस्कान आँखों में उतरती थी।

लेकिन अब, जैसे सब कुछ फीका हो गया था।

सुधा गोयल की कहानी 'वसंत कब आएगा'

जीवन कच्चे सूत का धागा नहीं, जिसे एक ही झटके से तोड़कर फेंक जा सके। काकी तो स्वयं मुक्त होना चाहती थीं। सारे सुख-दुख उन्होंने देख लिए थे। अब कोई इच्छा शेष न थी।

स्नेह गोस्वामी की कहानी 'ऐसा यहाँ होता है'

बिशनसिंह ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी। अभी तो साढे नौ ही बजे हैं, वे लोग ग्यारह बजे से पहले तो क्या ही आएँगे। साढ़े दस का तो टाइम ही दिया है उन्होंने। उसे अपनी घड़ी पर गुस्सा आया। आज इतनी धीमी चल रही है कि ले राम का नाम। फिर अपनी ही सोच पर उसे हँसी आ गयी। बेचारी घड़ी का क्या कसूर!