Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
डॉ० ज्योत्सना मिश्रा की कहानी 'जइयो बरसियो कहियो'

आत्मकथ्यात्मक शैली में रचित एक कहानी, जो घर-दफ़्तर से लेकर बाहर तक स्त्री के संघर्ष और उसकी मानसिक जद्दोजहद का जीवंत चित्र खींचती है। एक तरफ उसका अपना 'मन' है, अपने सुख-दुःख बटोर रहा है, आसपास का सबकुछ अनुभव कर जो एक इंसान की भांति जीना चाहता है, दूसरी तरफ उसका एक 'स्त्री' होना है, जो उसके 'मन के जीने' के बीच किसी साए की तरह आकर खड़ा है और उसे बार-बार अनुभव करवाता है कि तुम सामान्य इंसान नहीं, एक स्त्री हो। जिसे हर एक जगह सजग व संघर्षरत रहना है। पढ़िए, एक विचारप्रधान मार्मिक रचना।

राजेश अरोड़ा की कहानी 'और फिर'

हमेशा जीवंत रहने वाली मेरी कॉलोनी की आवाज़ गुम हो गई थी। हाँ, लेकिन कोयल के बोलने के स्वर अब बिलकुल साफ सुनाई पड़ने लगे थे, बुलबुलें भी ज़्यादा आने लगी थीं। पार्क ख़ाली था, झूलों पर बच्चे नहीं थे, बेंच पर बूढ़े अख़बार नहीं पढ़ रहे थे। आज रामनवमी है, कहीं कन्या भोज का आयोजन नहीं हो रहा।

देवेन्द्र कुमार पाठक 'महरूम' की कहानी 'आख़िरी हँसी'

गँवई-गाँवों में ज़्यादातर लोगों के नामों के शुरुआती शब्दों को तोड़-मरोड़, काट-छाँटकर कहने- बोलने का चलन सदियों से है। दरअसल इससे कहने-बुलाने में बड़ी सुविधा और सरलता होती है और आत्मीय निकटता मानी-समझी जाती है। मसलन, राजेश को रज्जू, रमेश को रम्मू, बड़े बेटे को बड़कुर, बड्डू या बड़का, छुटके को लहुरा, छोटू या चुट्टू। लड़कियों के नामों की भी काट-छाँट कर दी जाती है। सीता- सितिया हो जाती है, पूर्णिमा- पुनिया और शीला- सिल्ली।

हंसा दीप की कहानी- बैटरी

प्रकृति के इस रूप का सामना करने के लिए इंसान को बहुत तैयारी करनी पड़ती। कभी-कभी जब इंसानी मस्तिष्क से चूक हो जाए तो लोग “आ बर्फ, मुझे जमा कर देख” की तर्ज पर सोफी की तरह जानबूझ कर बर्फीले मौसम को चुनौती देने की गलती कर बैठेते। सोफी का हठ कहें या फिर मजबूरी, वह इस जानलेवा मौसम में हाईवे पर है, गाड़ी में। कल उसे ज्वाइन करना है। जाना जरूरी है।