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अनिल पुरोहित की कहानी 'छत की दरार'

अनिल पुरोहित की कहानी 'छत की दरार'

उसे वो दिन याद आया- शादी का पहला साल था, प्रमोद एक बार उसे जवाहर कला केन्द्र घुमाने ले गया था। वहाँ नाटक देखने गए थे, और बाद में चाय की दूकान पर बैठकर घंटों बातें की थीं। किरन हँसती थी, चाय में बिस्कुट डुबोकर। प्रमोद भी मुस्कुराता था- तब उसकी मुस्कान आँखों में उतरती थी।

लेकिन अब, जैसे सब कुछ फीका हो गया था।

जयपुर की सुबहें कुछ ख़ास होती हैं। न ज़्यादा तेज़, न बहुत धीमी- एक मध्यम लय में बहती हुई, जैसे पुराने रेडियो पर बजता कोई ग़ज़ल का टुकड़ा, जो अधूरा छोड़ दिया गया हो। राजा पार्क की संकरी गली नंबर छह में, जहाँ नीम के पेड़ के नीचे पुराना रिक्शा खड़ा रहता था और हर सुबह दूधवाला निश्चित समय पर घंटी बजा जाता था, वहीं तीसरे मकान की दूसरी मंज़िल पर प्रमोद और किरन रहते थे।

प्रमोद शर्मा, उम्र लगभग बयालीस, राजस्थान सचिवालय में कनिष्ठ लिपिक। न ज़्यादा बोलने वाले, न ही ज़्यादा मुस्कुराने वाले। सुबह 7:30 की बस पकड़ना उनकी वर्षों पुरानी आदत थी। टिफ़िन में चार चपातियाँ, एक सब्ज़ी, और अलग से अचार की छोटी डिब्बी- ये उनका सुबह का पैकेज होता था। और किरन, छत्तीस वर्ष की, विवाह से पहले राजकीय कन्या महाविद्यालय की छात्रा- हिंदी साहित्य में प्रथम श्रेणी। अब, एक गृहिणी, एक माँ, और शायद…बस एक किरन ही।

आज भी सुबह का सूरज गली में वैसे ही झाँक रहा था, जैसे हर रोज़। चाय का पानी उबलते ही किरन ने चुपचाप दो कप में डाला। चीनी नापकर डाली- एक कप में कम, एक में ज़रा ज़्यादा। वो जानती थी कि प्रमोद को ज़्यादा मीठा पसंद है लेकिन अब पूछने की कोई ज़रूरत नहीं रही थी। शायद आदतें ही संवाद बन चुकी थीं।

प्रमोद ने कप उठाया, एक घूँट लिया और बिना कोई प्रतिक्रिया दिए अख़बार खोल लिया।
"अख़बार वाले ने आज फिर वही ख़ून-ख़राबे और अपराध की घिसी-पिटी ख़बरें दी हैं।" उसने कहा, मानो शिकायत करने से ज़्यादा सूचना दे रहा हो।
किरन ने कुछ नहीं कहा। वह रसोई में जाकर रोटी बेलने लगी। गैस की लौ धीमी थी, सिलेंडर ख़त्म होने को था, लेकिन उसे पता था- इस महीने फिर दो दिन रुकना पड़ेगा।

राहुल, उनका दस साल का बेटा, स्कूल की यूनिफॉर्म में तैयार हो चुका था। उसकी साइकिल की चेन कल शाम ही उतर गई थी, पर वह चुपचाप जूते पहन रहा था।
"मैं ऑटो से चला जाऊँगा मम्मा।" राहुल ने धीमे स्वर में कहा।
किरन ने उसकी ओर देखा- उसकी आँखें नींद से भरी थीं, लेकिन चेहरा कुछ कहता नहीं था।
"टिफ़िन रख लिया?"
राहुल ने सिर हिलाया।

प्रमोद ने घड़ी देखी और उठ खड़ा हुआ।
"चलता हूँ।" उसने कहा, और ब्रीफ़केस उठाकर बिना किसी को देखे दरवाज़ा खोला।
"दोपहर में आ जाएँगे पिताजी?” किरन ने पूछा- सुबह से पहली बार बोली थी वो।
"नहीं, शायद नहीं। कुछ फ़ाइलें निपटानी हैं।" प्रमोद ने जवाब दिया, लेकिन उसकी आवाज़ में कोई गर्मी नहीं थी।
दरवाज़ा बंद हुआ, और घर फिर से एक अजीब-सी ख़ामोशी में डूब गया।

किरन ने बर्तन समेटे, राहुल को स्कूल के लिए भेजा, और फिर छत पर कपड़े सुखाने चली गई। छत पर नीम की डालियाँ हवा में झूल रही थीं। सामने हवामहल की दिशा में धुंधली-सी परछाई दिखती थी। दूर से कभी-कभी परकोटे की आवाजाही की आवाज़ें सुनाई देती थीं।

किरन का मन आज विचलित था। कल रात प्रमोद से बात करने की उसने कोशिश की थी- कहने को नहीं, बस सुनने को। लेकिन प्रमोद थका हुआ था, और उसने कहा था- "अब मत शुरू करो किरन, काम का बहुत तनाव है।"

छत के कोने में एक पुरानी दरार थी- वही दरार, जो पिछले मानसून में पानी रिसने के कारण आई थी। वह जानती थी कि उसे ठीक करना ज़रूरी है, लेकिन हर बार कुछ न कुछ ज़रूरतें ज़्यादा बड़ी हो जाती थीं।

उसने कपड़े टाँगते हुए उस दरार की ओर देखा- वह छोटी-सी दरार अब लंबी हो चुकी थी। जैसे दो दीवारें एक-दूसरे से दूर हट रही हों, और बीच में केवल ख़ालीपन बचा हो।

उसे वो दिन याद आया- शादी का पहला साल था, प्रमोद एक बार उसे जवाहर कला केन्द्र घुमाने ले गया था। वहाँ नाटक देखने गए थे, और बाद में चाय की दूकान पर बैठकर घंटों बातें की थीं। किरन हँसती थी, चाय में बिस्कुट डुबोकर। प्रमोद भी मुस्कुराता था- तब उसकी मुस्कान आँखों में उतरती थी।

लेकिन अब, जैसे सब कुछ फीका हो गया था।

दोपहर में किरन ने खाना बनाया- आलू-मटर, और बचे हुए आटे से फुल्के। ख़ुद नहीं खाया। टी०वी० ऑन किया, लेकिन आवाज़ बहुत धीमी थी- जैसे डर हो कि कोई सुन न ले।

शाम को जब राहुल आया, तो उसकी कॉपी में टीचर की रेड इंक में लिखी टिप्पणी थी:
"योर सन सीम्स डिसट्रक्टेड इन क्लास. प्लीज टॉक टू हिम."

किरन ने राहुल से पूछा, “कुछ हुआ स्कूल में?”
राहुल ने सिर हिलाया- “कुछ नहीं मम्मा। बस ऐसे ही।”
किरन ने उसे सीने से लगाना चाहा, लेकिन राहुल बस्ता लेकर अंदर चला गया।
रात को जब प्रमोद लौटा, तो वह थका हुआ था। आँखों के नीचे काले घेरे उभर आए थे।

“खाना परोस दूँ?” किरन ने पूछा।
“हाँ, पर जल्दी। नींद बहुत आ रही है।” प्रमोद ने कहा।
खाना बिना कोई बात किए खा लिया गया। बीच में सिर्फ एक आवाज़ आई- टेबल पर स्टील की कटोरी से टकराते चम्मच की।

रात के ग्यारह बजे जब सब सो गए, किरन फिर से छत पर आई। आसमान में चाँद निकला था- पूरा नहीं, अधूरा।
वह फिर उस दरार के पास खड़ी हुई- और हाथ से उसकी लंबाई नापने लगी। एक उँगली, दो उँगली, फिर हथेली से ज़्यादा…।
वह बुदबुदाई- "ये दरार कब भरोगे प्रमोद...? दीवार की नहीं... इस रिश्ते की।"
नीचे से राहुल की नींद में बड़बड़ाने की आवाज़ आई- शायद वह सपना देख रहा था।
किरन एक लंबी साँस लेकर वापस सीढ़ियों की ओर बढ़ गई।
पीछे छत की दरार चाँदनी में और भी स्पष्ट हो गई थी- जैसे किसी पुराने ज़ख़्म की सिलवट हो।

राजा पार्क की वही गली, वही मकान, लेकिन भीतर का मौसम बदल चुका था। कभी-कभी एक घर के अंदर जो तूफान उठता है, वो बाहर से बिल्कुल शांत नज़र आता है- जैसे झील का पानी ऊपर से ठहरा हो, लेकिन नीचे लहरें ख़ुद को आपस में टकरा रही हों।

सुबह किरन जल्दी उठ गई थी। उसने चाय चढ़ाई, लेकिन उसे पीने का मन नहीं हुआ। बर्तन धोते-धोते उसकी आँखें कहीं और चली जाती थीं- वहाँ, जहाँ वह अपने पुराने दिनों को देखती थी। जहाँ उसकी गोद में कोई किताब होती थी, और बालकनी में धूप के साथ वो कविता के अंतरों को दोहराती थी।

आज कुछ अलग था।

प्रमोद ने जब चाय पी, तो कुछ कहे बिना उठकर तैयार होने चला गया।
राहुल की यूनिफॉर्म अभी भी आधी सिलवटों से भरी थी।
"बेटा, बाल बना लो। आज यूनिट टेस्ट है न?"
"हाँ मम्मा…।” राहुल की आवाज़ फ़ीकी थी।

किरन जानती थी कि बेटे का मन कहीं और है। पिछले कुछ हफ्तों से वह चुपचाप रहता था, ज़्यादा सवाल नहीं करता, न ही ज़्यादा शरारतें।
कभी-कभी किरन सोचती- "क्या ये ख़ामोशी हमने उसे सिखाई है?"

दोपहर में जब पूरा मोहल्ला सीधा होकर सो जाता है, और धूप दीवारों पर रेंगती है, किरन रसोई में सब्ज़ी काट रही थी। तभी उसके हाथ में एक पुरानी डायरी आ गिरी- शायद राहुल के स्कूल प्रोजेक्ट के लिए वह उसे निकाल रही थी।
उस डायरी में प्रमोद की लिखी कुछ कविताएँ थीं- शादी से पहले की।

तेरी हँसी से रंग पाता है मेरा मन,
जैसे सूनी दोपहर में कोई चाँद उतर आए।

किरन की आँखें भर आईं।
“ये शब्द तो मेरे लिए थे न प्रमोद?”

लेकिन अब प्रमोद दिनभर सरकारी फ़ाइलों में डूबा रहता था- जहाँ रिश्ते सिर्फ दस्तावेज़ों की तरह होते हैं, बिना भावनाओं के।

शाम को किरन की सहेली नीलम मिलने आई- वही नीलम, जो शादी के पहले उसकी सहपाठी थी, और अब वैशाली नगर में रहती थी, अपने पति के साथ।
"तू बदली नहीं बिल्कुल भी।" नीलम ने मुस्कुराकर कहा।
"तू भी नहीं।" किरन ने धीमी मुस्कान के साथ जवाब दिया।
"तेरा चेहरा कुछ कहता है… ठीक है सब?"
किरन कुछ पल चुप रही। फिर बोली- "बस… सब कुछ ठीक है। जैसा चलता है…।"
नीलम ने किरन का हाथ पकड़ा- "देख किरन, प्यार और ज़िम्मेदारियों के बीच में जो दीवार बनती है, अगर उसे समय रहते नहीं तोड़ा, तो वो दिलों को अलग कर देती है। बात कर उससे। कुछ कह… कुछ सुन…।"
किरन की आँखें नम थीं।
"बोलने से डर लगता है नीलम! लगता है कहीं और टूट न जाएँ…।”
"तू टूटी नहीं है किरन, बस थकी हुई है। पर थकने और हारने में फ़र्क होता है।"

नीलम चली गई, लेकिन उसके शब्द वहीं रुक गए- जैसे कमरे की हवा में टँगे हों।

रात को, जब प्रमोद लौटा, किरन ने खाना तैयार रखा था। आज उसने हल्का-सा प्रयास किया था- वही आलू का भरता, जो प्रमोद को पसंद था, और मूँग दाल।
प्रमोद ने खाने की प्लेट देखी, फिर नज़रों से पूछा- “कोई ख़ास बात?"
किरन ने धीरे से कहा- "कुछ नहीं, बस सोचा तुम्हें पसंद है।"
एक क्षण की ख़ामोशी आई- फिर प्रमोद ने सिर्फ एक शब्द कहा- "धन्यवाद…।"

धन्यवाद- एक औपचारिकता। जैसे वो दो अजनबी हों, जो पहली बार किसी कार्यालय में मिले हों।

किरन ने हिम्मत जुटाकर पूछा- "प्रमोद, कुछ दिनों से हम बहुत दूर हो गए हैं क्या?"
प्रमोद ने खाना खाते-खाते सिर उठाया।
"काम बहुत है किरन, ज़िंदगी आसान नहीं है और… बातें करने से कुछ बदलता भी नहीं।"
"बदलता है प्रमोद। कभी एक चुप्पी भी बहुत कुछ कह देती है।"
प्रमोद ने चुपचाप खाना खाया, फिर उठकर अपने कमरे में चला गया।

आधी रात को किरन की नींद टूटी। सीलन की महक कमरे में भर रही थी। खिड़की के पास पंखा चर्र-चर्र कर रहा था।
वह धीरे से सीढ़ियाँ चढ़ी, और फिर से छत पर गई।
आज भी वही दरार- लेकिन आज उसमें कुछ नया था। उसने देखा- दरार में किसी ने चुपचाप एक पत्ता दबा रखा था। नीम का पत्ता। शायद हवा ने उड़ाकर डाला होगा।
पर किरन ने महसूस किया- "ये पत्ता नहीं, उम्मीद है। जैसे कुछ कहता हो- टूटे हुए में भी कुछ बचा रह जाता है।"
उसने दरार को उँगलियों से सहलाया- फिर धीमे-से बुदबुदाई- "मैं तुमसे फिर से बात करूँगी प्रमोद! चाहे दीवार कितनी भी मोटी हो।"


जयपुर की फरवरी की सुबहें हल्की ठंडी होती हैं- सूरज खिड़कियों पर दस्तक देता है, लेकिन कमरे के भीतर एक अनकही-सी ठंडक पसरी रहती है।
किरन की दिनचर्या अब किसी पुरानी घड़ी की तरह हो गई थी- न एक मिनट कम, न एक ज़्यादा। चाय, नाश्ता, राहुल को स्कूल भेजना, और फिर अकेलेपन के घंटों में उलझना।

आज प्रमोद जल्दी उठ गया था। वह शेव कर रहा था और उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था- जैसे आईने में अपनी ही तस्वीर से बचता हो।
किरन ने धीरे से कहा, "राहुल की पेरेंट्स-टीचर मीटिंग है आज। चल पाओगे?"
प्रमोद ने आईने में देखा- किरन की आँखों में एक सूनी-सी उम्मीद थी।
"ऑफिस में मीटिंग है, तुम चली जाना।”
यह कोई नई बात नहीं थी- लेकिन आज इस जवाब में एक थकान थी, एक स्थायी अस्वीकृति।
किरन मुस्कुरा दी- वही झूठी मुस्कान, जो अब उसका रोज़ का श्रृंगार बन चुकी थी।

स्कूल में, टीचर ने कहा- "राहुल ब्राइट बच्चा है, लेकिन इन दिनों बहुत शांत और मौन हो गया है। पार्टिसिपेट नहीं करता। कुछ ट्रबल है क्या घर में?"
किरन को लगा जैसे किसी ने उसका ही चेहरा रख दिया हो मेज़ पर।
“शायद है, लेकिन जवाब नहीं है मेरे पास।”

दोपहर को किरन बाज़ार गई थी। सब्ज़ी लेते हुए सबकुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन मन अंदर कहीं बहुत असामान्य हो गया था। जब वह लॉटरी की दूकान के पास से गुज़री तो एक महिला फुसफुसा रही थी- "बीवी भाग गई, तीन साल हो गए, वो अब भी उसी खिड़की पर बैठा रहता है, चाय लेकर…।”
किरन को लगा, भागने का मतलब सिर्फ शरीर से नहीं होता। एक रिश्ता भी तो चुपचाप छोड़ देता है, बिना सामान लिए।

शाम को राहुल ने टी०वी० चालू किया। कोई पुरानी हिंदी फिल्म चल रही थी- संवेदनाओं से भरी नायिका पति के लिए सबकुछ छोड़ देती है, और पति अंत में कहता है- "मैंने तुम्हारा त्याग कभी समझा ही नहीं।"
राहुल ने पूछा- "मम्मा, त्याग का मतलब क्या होता है?"
किरन कुछ देर चुप रही, फिर बोली- "त्याग का मतलब है, किसी को ख़ुश देखने के लिए ख़ुद की ख़्वाहिशें भूल जाना।"
राहुल ने टी०वी० म्यूट कर दिया। कमरे में चुप्पी गूँजने लगी।

रात को प्रमोद वापस आया। चेहरे पर थकान की परतें थीं।
किरन ने पूछा- "खाना लगाऊँ?"
प्रमोद ने हाँ में सिर हिलाया।
खाने की मेज़ पर दोनों चुप थे। उनके बीच सिर्फ दो प्लेटें नहीं, बल्कि कई सवाल और कई अधूरी बातें रखी थीं।
फिर अचानक किरन ने कहा- "क्या हम ऐसे ही रहेंगे, बस चुप!!”
प्रमोद ने पहली बार आँखें उठाईं- "कभी-कभी ख़ामोशी ही बेहतर होती है। बातों से सब उलझ जाता है।"
किरन की आँखें भर आईं- "तो क्या हम उलझने से डरते हैं अब?"
"नहीं…।" प्रमोद धीरे से बोला, "हम थक गए हैं शायद।"
"थकना तो दौड़ में होता है प्रमोद, रिश्ते में नहीं।"
इस बार प्रमोद ने जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप उठकर बालकनी में चला गया।

रात के डेढ़ बजे-
किरन को फिर नींद नहीं आ रही थी। वह धीरे से छत पर चली गई।
छत पर वही दरार थी- और इस बार उसमें से कुछ घास उग आई थी।
"घास भी जानती है कि टूटन में भी जीवन बचा रह सकता है।"
किरन ने आकाश की ओर देखा- सन्नाटा था, लेकिन कहीं दूर कोई कुत्ता भौंक रहा था।
उसने ख़ुद से कहा- "सुनाई नहीं देती आवाज़ें, लेकिन वो होती हैं।
रिश्तों की भी आवाज़ होती है, बस वो कान से नहीं, दिल से सुनी जाती है।"

अगली सुबह किरन ने प्रमोद के लिए फिर वही कविता निकाली-
एक छोटी-सी पंक्ति को काग़ज़ पर लिखा और उसकी डायरी में चुपचाप रख दी:

ख़ामोशी भी रिश्ता बन सकती है
अगर कोई उसे पढ़ना जाने

****************

मार्च की शुरुआत हो चुकी थी। गुलाबी सर्दी विदा ले रही थी और जयपुर की हवाओं में अब बसंती महक घुलने लगी थी। छत की दरार में अब घास कुछ और हरी हो चली थी। किरन ने गौर किया- दरार बढ़ी नहीं थी, शायद थम गई थी।

सुबह के वक्त प्रमोद जल्दी उठा।
अलमारी से कुछ ढूँढ रहा था, लेकिन फिर एक काग़ज़ का टुकड़ा गिरा।

वही किरन की लिखी पंक्ति-

ख़ामोशी भी रिश्ता बन सकती है
अगर कोई उसे पढ़ना जाने

वो ठिठक गया।

एक पल के लिए कुछ नहीं कहा, लेकिन देर तक उसी पंक्ति को देखता रहा- जैसे शब्दों ने आईना रख दिया हो उसके सामने।

नाश्ते की मेज़ पर किरन ने कुछ नहीं पूछा।
प्रमोद ने ख़ुद से कहा, "मैंने पढ़ा, वो जो तुमने कहा था।
शब्द छोटे थे, लेकिन बहुत कुछ कह गए।"
किरन ने चुपचाप उसकी तरफ देखा। वर्षों बाद उसे लगा जैसे यह वही चेहरा है, जिससे वह एक समय प्रेम करती थी- थके हुए चेहरे में एक कोना अब भी ज़िंदा था।

उस दिन दोपहर को, किरन ने रसोई में काम करते हुए टेप पर लता के एक पुराने गीतों का कैसेट लगा लिया-
"लग जा गले, कि फिर ये हसीं रात हो न हो..."

प्रमोद खिड़की के पास बैठा चुपचाप सुनता रहा।
फिर बोला, "किरन, क्या तुम आज शाम मेरे साथ चलोगी? वहीं, जहाँ हम पहली बार मिले थे- रामबाग़ के उस चाय वाले के पास?”
किरन कुछ नहीं बोली, लेकिन उसकी आँखों की कोरों से हल्की-सी चमक फूट पड़ी।
वह मुस्कराई- वही मुस्कान, जो कई सालों से कहीं गुम थी।

रामबाग़ में वही चाय की पुरानी दूकान अब थोड़ी नई लग रही थी- दीवार पर टाइलें लग गई थीं, लेकिन चाय का स्वाद वही था।
प्रमोद ने कहा, "शादी के बाद सबकुछ फ़ास्ट हो गया किरन, जैसे कोई ट्रेन हो जो रुके ही नहीं। कभी काम, कभी ज़िम्मेदारी… और हम दोनों उस खिड़की से बाहर देखने तक नहीं रुके।"
किरन ने कहा, "ट्रेन रुकी नहीं, लेकिन हम उतर भी तो सकते थे। थोड़ी देर किसी स्टेशन पर बैठकर साँस लेते…।"
प्रमोद ने धीरे से किरन का हाथ थामा- बहुत सालों बाद।
"अब भी देर नहीं हुई… चलो, आज थोड़ा रुकते हैं।”

उसी रात घर लौटकर किरन फिर छत पर गई। प्रमोद भी साथ आया।
दोनों ने उस दरार को देखा-
प्रमोद ने धीरे से कहा, "इसे भरने की ज़रूरत नहीं है, ये हमें याद दिलाती रहेगी कि हम टूटे थे, लेकिन फिर जुड़े।"
किरन ने सिर हिलाया।
"दरारें ख़राब नहीं होतीं प्रमोद, अगर उनमें धूप उतरती रहे।"

कहानी का अंत उस छत पर नहीं हुआ, बल्कि उस समझ में हुआ, जहाँ दो लोग यह मानने को तैयार हुए कि रिश्ते किताबें नहीं होतीं, जो बस पढ़कर बंद कर दी जाएँ।
वे बगीचे होते हैं-
जिन्हें रोज़ सींचना पड़ता है,
दरारों में भी बीज डालना होता है,
ताकि किसी दिन वहाँ फूल खिल सकें।

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रचनाकार परिचय

अनिल पुरोहित

ईमेल : anilpurohit123@gmail.com

निवास : सुजानगढ़ (राजस्थान)

शिक्षा- हिन्दी साहित्य में अधिस्नातक
प्रकाशित कृतियाँ- 'वो कौन थी', 'उस पार', 'सुबह का भूला', 'रहस्यमय कॉल',
                     'भूख का उसूल', 'मेरी इक्यावन कविताएँ', 'शापित महल', 
                     'फ़ाइल नं०- 303' एवं 'जीवन की डगर'

पता- सांड चौक, सुजानगढ़ (राजस्थान)- 331507
मोबाइल- 9828547841