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सुरेश चन्द्र 'सर्वहारा' के दोहे

सुरेश चन्द्र 'सर्वहारा' के दोहे

बिना प्रेम के ज़िंदगी, है बिल्कुल बकवास।
सुंदर पर बिन काम की, जैसे गाजरघास।।

जाते-जाते पेड़ पर, अटक गई है शाम।
शायद माँ की ही तरह, याद आ गया काम।।

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खोज सुखों के नीर की, करता चारों खूँट।
रहा भटकता थार में , इच्छाओं का ऊँट।।

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आकर बादल चल दिए, बैठ हवा की पाँख।
खड़े पेड़ की दूर तक, रही देखती आँख।।

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जीवन बाजी ताश की, जीत मिले या हार।
हमको तो बस खेलना, पत्तों के अनुसार।।

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बिना प्रेम के ज़िंदगी, है बिल्कुल बकवास।
सुंदर पर बिन काम की, जैसे गाजरघास।।

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जीवन भर अर्जित किए, धन, बल, पद, यश साख।
हो जाते शमशान में, घण्टे भर में राख।।

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सरल प्रकृति के व्यक्ति को, रहते सब ही छेड़।
देखें हैं तूफान से, हमने उखड़े पेड़।।

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रही आपसी फूट की, यही एक बस रीत।
जब लड़ती दो बिल्लियाँ, जाता बन्दर जीत।।

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अपनी लघुता से नहीं, हीनभावना ग्रस्त।
अंधकार को दे रहा, दीपक अतः शिकस्त।।

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जाल बिछाकर फाँसना, है दुष्टों की रीत।
मछुआरे होते नहीं, कभी मीन के मीत।।

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अपनी ताकत चीटियाँ, जब लेती हैं भाँप।
खा जाती वे एक दिन, मिल जहरीला साँप।।

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पर्वत को राई करे, करे फूल को धूल।
सृजन और संहार में, तत्त्व समय का मूल।।

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परिवर्तन संसार का, है आवश्यक अंग।
रंग बदलता व्योम भी, रात-दिवस के संग।।

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भेदभाव करता नहीं, कभी पुरुष गुणवान।
गंध लुटाता फूल है, सबको एक समान।।

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जीवन को सुंदर करे, मिल सुख-दुःख के रूप।
इन्द्रधनुष बनता तभी, जब हो वर्षा धूप।।

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रचनाकार परिचय

सुरेश चन्द्र 'सर्वहारा'

ईमेल : scsarwahara@gmail.com

निवास : कोटा (राजस्थान)

पता- म. नं.- 445, सेक्टर- 7, व्यायामशाला मार्ग, केशवपुरा ज़िला- कोटा (राज.)- 324009
मोबाइल- 9928539446