Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
डॉ० राम वल्लभ आचार्य के गीत

शीतल पड़ी फुहार
धरा से गंध उठी सौंधी।

धरती का रस चूस चूस कर,
मेघ हुए भारी;
आखिर कितना ढोते,
झरने की थी लाचारी;
जल से भरी गगरिया अपनी,
रख दी फिर औंधी।

आलोकेश्वर चाबडाल के गीत

हो गई जब भूल हो, दूर दिखता कूल हो
तिल सरीखी बात को जब, दे रहा जग तूल हो
त्यागकर ऋजुता, निगाहें तीर रखना रे!
धीर रखना रे ओ राही, धीर रखना रे!

मनोज कुमार शुक्ल 'मनुज' के गीत

अब शृँगालों में गधे कुछ शेर सा साहस भरेंगे।
रोशनी की अहमियत को अब अँधेरे तय करेंगे?

पंकज परदेसी के गीत

यशशेष पंकज 'परदेसी' का नाम कानपुर के अच्छे गीतकारों में सम्मिलित है। आपका प्रेमी हृदय, प्रेम गीतों में ही रमता था। आप जितनी तन्मयता से प्रेम-गीत रचते थे उतने ही प्रभावशाली ढंग से उनको प्रस्तुत भी करते थे। श्रोता उनको मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे। कभी-कभी वो गीत गाते गाते इतने भावुक हो जाते थे कि उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती थी। अत्यंत सहृदय एवं नवनकुरों को प्रोत्साहित करँए वाले थे। कानपुर हमेशा आपको याद करेगा।  इरा मासिक वेब पत्रिका आपके गीतों को प्रकाशित कर आपकी स्मृतियों को नमन करती है।