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पंकज परदेसी के गीत

पंकज परदेसी के गीत

यशशेष पंकज 'परदेसी' का नाम कानपुर के अच्छे गीतकारों में सम्मिलित है। आपका प्रेमी हृदय, प्रेम गीतों में ही रमता था। आप जितनी तन्मयता से प्रेम-गीत रचते थे उतने ही प्रभावशाली ढंग से उनको प्रस्तुत भी करते थे। श्रोता उनको मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे। कभी-कभी वो गीत गाते गाते इतने भावुक हो जाते थे कि उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती थी। अत्यंत सहृदय एवं नवनकुरों को प्रोत्साहित करँए वाले थे। कानपुर हमेशा आपको याद करेगा।  इरा मासिक वेब पत्रिका आपके गीतों को प्रकाशित कर आपकी स्मृतियों को नमन करती है। 

गीत- एक

तोड़कर धर्म के बन्धनों की रसम।
लौट आओ तुम्हें आँसुओं की क़सम।

एक दर पर खड़े,
एक तस्वीर को-
एकटक देखते,
इक ज़माना हुआ
एक मेले में हम
ढूँढते फिर रहे-
एक चेहरा वही,
अपना जाना हुआ

प्रीति की जाति का प्यार ही है धरम!
लौट आओ तुम्हें आँसुओं की क़सम।

सौ युगों बाद आयी
मिलन की घड़ी कुछ
अँधेरा लिये,
दो पलों के लिये
आज सन्ध्या जला,
राह पर रख गयी
ओर से छोर तक,
तारकों के दिये "

चाँदनी, द्वार पर लिख रही स्वागतम्।
लौट आओ तुम्हें आँसुओं की क़सम।

मैं पपीहा बना,
स्वाति की बूँद तुम,
मैं अमर बन गया,
तुम सुमन-पाँखुरी
तुम नयन बन गये,
अश्क मैं बन गया,
मैं अधर बन गया,
तुम बने बाँसुरी

"हम मिलेंगे इसी रूप में हर जनम"।
लौट आओ तुम्हें आँसुओं की क़सम।

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गीत- दो

आँखों में छवि तेरी, होंठों पे नाम।
देहरी पर दीप धरे बैठी है शाम।

पथ, मेरा "परदेसी" जाये न भूल पुरवा!
तू सँग चलना होकर अनुकूल
ऊपर से गुज़रें जब रेशम से पाँव,
फूलों में ढल जाना राहों की धूल॥

आती है सुधि तेरी ही आठों याम!
देहरी पर दीप घरे बैठी है शाम।

जिस दिन से रूठी है निंदिया बेपीर
जगती है मेरे संग तेरी तस्वीर
रो, रोकर कहता है अन्तर का दर्द,
जाने कब बदलेगी अपनी तक़दीर

आँसू भी हो बैठे मेरे बदनाम
देहरी पर दीप धरे बैठी है शाम।

कोयल की कुहुकें ये पपिहे के बोल
बिजली का नर्तन, ये बादल के ढोल
थम-थम कर होती ये रिमझिम बरसात,
रह, रहकर जाते सब रस में विष घोल

कोई पहुँचा दे, ये उन तक पैग़ाम,
देहरी पर दीप धरे बैठी है शाम।

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गीत- तीन

छुप गया लो चाँद भी
पर तुम न आये।
चाँदनी बैठी रही
पलकें बिछाये॥

ये पपीहे की अकिंचन याचनायें!
ये तिमिर के सिन्धु में डूबी दिशायें।
कह रही हैं आज फिर प्यासी नदी से-
लौटने को हैं बिना बरसे घटायें॥

शबनमी ने फिर बहाये !
चाँदनी बैठी रही पलकें बिछाये।।

याद है, वो रात, जब हम तुम मिले थे।
साथ अपने तारकों के काफ़िले थे।
धड़कनों में बन्द साँसे हो गयीं थीं,
फूल मन में रातरानी के खिले थे।

क्या पता, वो रात, फिर आये, न आये?
चाँदनी बैठी रही पलकें बिछाये॥

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गीत- चार

ये गीला मौसम,
ये गीला मौसम।
लगा गया दिल के घावों पर,
यादों का मरहम।

याद हमें आ गया वही
फिर कालिन्दी का कूल
जब साँसों में महके थे
रजनीगन्धा के फूल

मचल गया था
संयम की भी
खाकर हाय! कसम
ये गीला मौसम।

दूर कहीं निर्जन में गूँजा-
था, झरने का गीत
जिसकी सरगम पर छेड़ा था
मेघों ने संगीत

थिरक, थिरक उठता था,
जिसकी लय पर क़दम-क़दम
ये गीला मौसम।

हँसकर तुमने कहा हमारे-
साथ बढ़ा कर पाँव
साथ चलेंगे, जहाँ तलक है
नील गगन की छाँव

भूल न पाओगे 'परदेसी'
तुम भी जनम जनम
ये गीला मौसम,
ये गीला मौसम।

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गीत- पाँच

उम्र भर ये गीत, क्वाँरे ही रहेंगे।
हम तुम्हारे हैं, तुम्हारे ही रहेंगे।

एक ही तस्वीर,
जो मन में बसी है
जो हमारी ज़िन्दगी की
ज़िन्दगी है

एकटक उसको निहारे ही रहेंगे!
हम तुम्हारे हैं, तुम्हारे ही रहेंगे ।

ज़िन्दगी बीते तुम्हें ही
याद करते
कट गया हर दिन
यही फ़रियाद करते

रात को गिनते सितारे ही रहेंगे।
हम तुम्हारे हैं, तुम्हारे ही रहेंगे।

ये न तुम पूछो कि
हम कैसे जिये हैं
तुमने तो हमको सदा
आँसू दिये हैं

फिर भी हम तुमको पुकारे ही रहेंगे।
हम तुम्हारे हैं, तुम्हारे ही रहेंगे।

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गीत- छह

हुई ज़िन्दगी जब से तेरे नाम।
डूब गयी आँखों, आँखों में शाम।

दूर खड़े ही मुस्काते रहना
दिल की बातें नज़रों से कहना
और कभी अनबन हो जाये तो
हाय! आँसुओं का अविरल बहना

अपना तो ये है प्रतिदिन का काम।
डूब गयी आँखों, आंखों में शाम।

शाम ढले ही दीपक का बुझना
फिर अलसाई पलकों का झुकना
आँख बचाकर दुनिया वालों की
सपने में तेरा मिलना जुलना

जाने क्या हो इन सब का परिणाम।
डूब गयी आँखो, आँखो में शाम।

झूल रहा है बाहों में सावन
सिमट गया साँसों में चन्दन वन
जब से तुम आए गये ज़िंदगी में
और हो गया ममतामय जीवन

रहें सामने हम तुम आठो याम।
डूब गयी आँखों, आँखों में शाम।

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गीत- सात

ज़िन्दगी का क्या ठिकाना
ढूँढ़कर कोई बहाना
तुम चले आना।

याद जब मेरी सताये
दर्द दिल का जब रुलाये
जब प्रतीक्षा में किसी की -
चाँदनी पलकें बिछाये

छोड़कर सारा ज़माना
ढूँढकर कोई बहाना
तुम चले आना

जब घिरें नभ पर घटाएँ
इन्द्रधनुषी हो फ़िज़ायें
जब दबे होंठों चमन में-
शोख कलियाँ मुस्कराये

जब भ्रमर छेड़े तराना,
ढूँढकर कोई बहाना,
तुम चले आना।

ज़िन्दगी बोझिल लगे जब
डूबता साहिल लगे जब
खास अपने प्रिय जनों से -
टूटता सा दिल लगे जब

आज़माने दोस्ताना
ढूँढकर कोई बहाना
तुम चले आना।

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रचनाकार परिचय

पंकज परदेसी

ईमेल :

निवास : कानपुर (उत्तर प्रदेश)

आशाराम गुप्ता उर्फ पंकज परदेसी ने जो  देखा,भोगा,गाया।बड़े-से बड़े साहित्यकारों के साथ मंच साझा किया।सुरीले कंठ के धनी परदेसी का मधुमेह भी  हौसला नहीं  डिगा नहीं सका।
मित्र कवियों का मार्गदर्शन करने वाला जीवट गीतकार जीवन-धारा के विपरीत तैरते-तैरते शायद थक गया।
इसे हार कहें या जीत।
पीड़ा का कवि पीड़ा गाते -गाते सभी का साथ छोड़ कर अनंत यात्रा पर चला गया।