Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
सत्यशील राम त्रिपाठी के गीत

बड़े सवेरे घर बुहार चमकाती कोना-कोना,
लीप-पोतकर कर देती हैं घर का रूप सलोना।
मेंहदी रची हथेली से जब रचती हैं रंगोली,
लगता होली खेल गईं हैं शुभ किरणों की टोली।

गरिमा सक्सेना के गीत

बड़े दिनों में भीगे 
और नहाये पेड़
मंद-मंद मुस्काये पेड़
 
इक अरसे से 
धूल भरे थे चित्र सभी
दिखे नहीं थे 
बहुत दिनों से मित्र सभी

डॉ० राम वल्लभ आचार्य के गीत

शीतल पड़ी फुहार
धरा से गंध उठी सौंधी।

धरती का रस चूस चूस कर,
मेघ हुए भारी;
आखिर कितना ढोते,
झरने की थी लाचारी;
जल से भरी गगरिया अपनी,
रख दी फिर औंधी।

आलोकेश्वर चाबडाल के गीत

हो गई जब भूल हो, दूर दिखता कूल हो
तिल सरीखी बात को जब, दे रहा जग तूल हो
त्यागकर ऋजुता, निगाहें तीर रखना रे!
धीर रखना रे ओ राही, धीर रखना रे!