Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
प्रमोद पवैया के गीत

हमें स्वर्ग का मूल्य चुकाकर
नर्कवास को ठुकराना है,
और अदेखी वैतरणी में
सतत डूबना-उतराना है,

व्यापारी को
संत मानकर,
ख़ुश रहना है।

वेद प्रकाश शर्मा 'वेद' के गीत

देखता गुमसुम समय
यह फेसबुक की घुड़चढी है

गीता गुप्ता 'मन' के गीत

कुछ अनबुझे कुछ अनजाने, कुछ लगते जाने पहचाने,
मन को मंदिर कर देते है, कुछ गीतों के बोल सुहाने।

शकुन अग्रवाल 'सहज' के गीत

धर्म-धर्म का खेल खेलते, भरते सबके हृद में रोष।
लूट-पाट दंगे फैलाकर, भरते जाते अपना कोष।
अपना उल्लू सीधा करते, कैसी कैसी चलते चाल।
लड़ते हैं आडंबर खातिर, इसे बनाते अपनी ढाल।
झूठी शान हेतु करते हैं, एक दूसरे पर ही वार।
जीत रही पशुता पग पग पर, आज रही मानवता हार।