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मनोज कुमार शुक्ल 'मनुज' के गीत

मनोज कुमार शुक्ल 'मनुज' के गीत

अब शृँगालों में गधे कुछ शेर सा साहस भरेंगे।
रोशनी की अहमियत को अब अँधेरे तय करेंगे?

गीत- एक

रूठते संबंध हैं जब अनसुनी हों प्रार्थनाएँ।
प्रेम के अनुबंध में भी टूटती हैं वर्जनाएँ ।।

बुद्धि का फैला हुआ आकाश छोटा पड़ रहा है,
धैर्य का सागर उमड़कर के स्वयं से लड़ रहा है।
जब विनय का मोल भी चुकने लगे तब क्या करोगे,
हाथ से अपने चिता पर क्या स्वयं को तुम धरोगे।

चीखती हैं हो गईं बेसुध हमारी भावनाएँ।
प्रेम के अनुबंध में भी टूटती हैं वर्जनाएँ ।।

बादलों के पार का परिदृश्य काला हो चुका है,
आपको लगता भले हो अब उजाला हो चुका है।
टूटता विश्वास जीवन की खुशी को तोड़ता है,
है वही सम्मान का क्षण जो हृदय को जोड़ता है।

काल की जब चाल वक्री हो ठिठकती साधनाएँ।
प्रेम के अनुबंध में भी टूटती हैं वर्जनाएँ ।।

प्राण की वो शक्ति घटती जा रही क्या हो गया है,
सब कुशल है फिर ठगे से हो कहो क्या खो गया है।
है कठिन पथ किंतु तुमने लक्ष्य गुरुतर तय किए हैं,
वेदना उर की सँजोकर पात्र अमृत क्षय किए हैं।

छोड़ देंगे तोड़ देंगे हम सृजन की कामनाएँ।
प्रेम के अनुबंध में भी टूटती हैं वर्जनाएँ ।।

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गीत- दो

याद आ रहा इस पड़ाव पर बचपन का हर ठाँव रे।
मेरा अपना छोटा सुन्दर और सजीला गाँव रे।।

सीधे साधे लोग जहाँ थे सीधी उनकी बोली थी,
खेत और खलिहान नापती हम बच्चों की टोली थी।
खेतों से अनाज मिल जाता फल बागों से आते थे,
गाय भैंस का दूध नित्य पीते थे मौज मनाते थे।

यहाँ कहाँ आ गया शहर में छूटी पीपल छाँव रे।
मेरा अपना छोटा सुन्दर और सजीला गाँव रे।।

झूठी शान ज्ञान का भ्रम है और बसेरा छोटा सा,
भारी बस्ते हैं बच्चों के चश्मा लगता मोटा सा।
मनमुटाव मक्कारी धोखा हवा साथ में लाती है,
कोयल के दर्शन दुर्लभ हैं डिबिया गीत सुनाती है।

यहाँ मधुरता गायब सी है मुखरित होती काँव रे।
मेरा अपना छोटा सुन्दर और सजीला गाँव रे।।

हर दिमाग में होशियारी है रिश्ते होते व्यर्थ यहाँ,
है ऐसी सभ्यता अनोखी शब्द खो चुके अर्थ जहाँ।
तन मन हुए खोखले लेकिन ऐंठ नित्य बढ़ती जाती।
सच की चादर चिथड़े हो कर झूठी है चढ़ती जाती।

खुश होते हैं चलकर बुद्धू अपने उल्टे दाँव रे।
मेरा अपना छोटा सुन्दर और सजीला गाँव रे।।

सच कहता हूँ यहाँ मशीनी हुई ज़िन्दगी भाई जी,
नोटों की बरसात कहीं है कहीं कठिन है पाई जी।
आडंबर है संत नहीं हैं भक्ति बिक रही गली गली,
चालाकी का पाठ पढ़ाते मम्मी जी की उम्र ढली।

धीरे धीरे लौट चलेंगे उसी ओर अब पाँव रे।
मेरा अपना छोटा सुन्दर और सजीला गाँव रे।।

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गीत- तीन

दर्द भी वरदान होगा।
दर्प का अवसान होगा।।

ये तुम्हारे छल प्रपंचों के बुझे सब तीर झूठे,
ग्रह सभी अब सीध में हैं जो रहे ताउम्र रूठे।
तुम स्वयं अपने बुने ही जाल में फंसकर रहोगे,
मृत्यु कब आसान होगी मृत्यु सी पीड़ा सहोगे।

दुष्टता का मान होगा?
दर्प का अवसान होगा।।

नीचता की देहरी को लाँघकर आगे बढ़े हो,
पैर अपने काटते हो कौन कहता तुम पढ़े हो?
चाटुकारों से किसी का कब भला होता भला है?
स्वार्थियों का संग भी आद्यन्त तक किसका चला है?

नष्ट सब अवदान होगा।
दर्प का अवसान होगा।।

आह बनकर श्राप देगी भस्म कर सब पुण्य प्यारे,
उच्च के सब ग्रह चलेंगे चाल अब उल्टी तुम्हारे।
जो तुम्हारे पक्ष में थी वो हवा उल्टी बहेगी,
जो विजय की देवि थी अब वो पराजय ही कहेगी।

अब नहीं अपमान होगा।
दर्प का अवसान होगा।।

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गीत -चार

अब शृँगालों में गधे कुछ शेर सा साहस भरेंगे।
रोशनी की अहमियत को अब अँधेरे तय करेंगे?

कालिमा अब श्वेत दिवसों की सफेदी जाँचती है,
अब गरीबी भाग्य धनिकों का यतन से बाँचती है।
नाचती है तुच्छता अधिकार पाकर श्रेष्ठता सी,
है कनिष्ठा ऐंठती कुछ मान पाकर ज्येष्ठता सी।

रूपसी की सादगी को छोड़ छल को ही वरेंगे।
रोशनी की अहमियत को अब अँधेरे तय करेंगे?

भोर को आँखें दिखाते उल्लुओं के दिन घटेंगे,
हैं कुलाँचे मारते पर इन अजों के सर कटेंगे।
दीनता से दुष्टता तक का सफ़र पागल बनाता,
है समय बदला मदारी को वही बंदर नचाता।

कुक्कुरों को लग रहा है शेर भी उनसे डरेंगे,
रोशनी की अहमियत को अब अँधेरे तय करेंगे?

सच कहूँ तो बुद्धि साहस का न कोई तोड़ होता,
जो मिला सामर्थ्य से है वो सदा बेजोड़ होता।
कल्पना साकार करने की जिन्हें ताकत मिली है,
ज़िंदगी उनकी कमल के पुष्प सी रहती खिली है।

फूल हरसिंगार के सब कर्मशीलों पर झरेंगे।
रोशनी की अहमियत को अब अँधेरे तय करेंगे?

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गीत- पाँच

अनवरत प्रेमरस से रहा भीगता
तृप्त होते रहे जो तृषित थे नयन,
हो गयी अर्चना वंदना हो गयी
पूर्ण पूजा हुयी हो गया आचमन।

आपका प्रेम है उच्च अट्टालिका
मैं कुटी की तरह हूँ धरा पर धरा,
आप हो तारिणी मैं भँवर ही रहा
धूल मैं हूँ अगर आप कंचन खरा।
लोचनों में रहा बिम्ब मेरा सदा
दृग मनुज नीर से ही भरे रह गए,
पुण्य चलता रहा साथ में आपके
पाप के दंड हम मौन हो सह गए।

सुप्त सा है मनन अब सृजन मौन है
नेह के गीत लगने लगे हैं भजन,
हो गयी अर्चना वंदना हो गयी
पूर्ण पूजा हुयी हो गया आचमन।

श्लाघ्य है आपका रूप यौवन प्रिये
प्रेम के दुर्ग की भित्ति है पावनी,
द्वार है स्वर्ग के द्वार सा दिव्यतम
है महक आ रही दूर से सावनी।
श्रेष्ठतम उच्चतम दिव्य प्राकार है
सीढियाँ त्याग की शीर्ष पहचान हैं,
जो कँगूरे बने आपके ज्ञान से
वो हमारा सदा से रहे मान हैं।

अब अलग ये रहेंगे कहाँ तक कहो
चिर कुँआरे हमारे तुम्हारे वचन,
हो गयी अर्चना वंदना हो गयी
पूर्ण पूजा हुयी हो गया आचमन।

मोक्ष की देवि मेरे हरो पाप सब
कर्म से भाग्य अब क्यों विजेता रहे,
अब महादेव ही दें बता कर दया
दंड कब तक भला सत्य ही यूँ सहे।
देह नश्वर भले हो अमर प्रेम है
मैं ऋणी हूँ युगों तक प्रिये आपका,
आप मुझसे विलग दूर मैं आपसे
अंत होगा कभी तो कठिन शाप का।

झुक गया है गगन,रुक गया है रुदन
कह रहे देव शुभ है हमारा चयन,
हो गयी अर्चना वंदना हो गयी
पूर्ण पूजा हुयी हो गया आचमन।

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रचनाकार परिचय

मनोज शुक्ल 'मनुज'

ईमेल : gola_manuj@yahoo.in

निवास : लखनऊ (उत्तरप्रदेश)

जन्मतिथि- 04 अगस्त, 1971
जन्मस्थान- लखीमपुर-खीरी
शिक्षा- एम० कॉम०, बी०एड
सम्प्रति- लोक सेवक
प्रकाशित कृतियाँ- मैंने जीवन पृष्ठ टटोले, मन शिवाला हो गया (गीत संग्रह)
संपादन- सिसृक्षा (ओ०बी०ओ० समूह की वार्षिकी) व शब्द मञ्जरी(काव्य संकलन)
सम्मान- राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान, उत्तर प्रदेश द्वारा गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही' पुरस्कार
नगर पालिका परिषद गोला गोकरन नाथ द्वारा सारस्वत सम्मान
भारत-भूषण स्मृति सारस्वत सम्मान
अंतर्ज्योति सेवा संस्थान द्वारा वाणी पुत्र सम्मान
राष्ट्रकवि वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्यिक प्रकाशन समिति, मन्योरा-खीरी द्वारा राजकवि रामभरोसे लाल पंकज सम्मान
संस्कार भारती गोला गोकरन नाथ द्वारा साहित्य सम्मान
श्री राघव परिवार गोला गोकरन नाथ द्वारा सारस्वत साधना के लिए सम्मान
आगमन साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समूह द्वारा सम्मान
काव्या समूह द्वारा शारदेय रत्न सम्मान
उजास, कानपुर द्वारा सम्मान
यू०पी०एग्री०डिपा०मिनि० एसोसिएशन द्वारा साहित्य सेवा सम्मान व अन्य सम्मान
उड़ान साहित्यिक समूह द्वारा साहित्य रत्न सम्मान
प्रसारण- आकाशवाणी व दूरदर्शन से काव्य पाठ, कवि सम्मेलनों व अन्य साहित्यिक कार्यक्रमों में सहभागिता
निवास- जानकीपुरम विस्तार, लखनऊ (उ०प्र०)
मोबाइल- 6387863251