Ira Web Patrika
नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
वसंत जमशेदपुरी के गीत

बरसाने की राधा हो तुम,
ब्रज का हूँ नटनागर मैं।
वृंदावन की कुंज गली तुम,
मैं यमुना का तीर प्रिये।

जयराम जय के नवगीत

परिवर्तन का ढोल पीटते
थके नहीं अभिनेता
कलयुग को भी बातचीत में
बता रहे हैं त्रेता
झूठ बोल करके ही सबका
मन कब से बहलाए

देवेन्द्र पाठक 'महरूम' के गीत

बिरला कोई किसी का बेटा
पढ़-लिख गर क़ाबिल बनता है,
सफल हुआ लेकिन नियुक्ति के
इन्तज़ार में दिन गिनता है,

सत्यशील राम त्रिपाठी के गीत

बड़े सवेरे घर बुहार चमकाती कोना-कोना,
लीप-पोतकर कर देती हैं घर का रूप सलोना।
मेंहदी रची हथेली से जब रचती हैं रंगोली,
लगता होली खेल गईं हैं शुभ किरणों की टोली।