Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
विनय मिश्र की ग़ज़लें

जीवन परतों दर परतों में सिमट गया
सारा मौसम दो आंँखों में सिमट गया

होने को था मेरा क़द कुछ बड़ा मगर
मैं जीने की तरकीबों में सिमट गया

डॉ० सीमा विजयवर्गीय की ग़ज़लें

अर्जुन की मछली-सा तू है, मेरी नज़रें  बस  तुझ  पर
बाक़ी   सारी   दुनियादारी,  मंज़िल,   रस्ते  सब  तेरे

मृदुल तिवारी की ग़ज़लें

कामयाबी तो मिली  हमको  मगर  इस  दौर  में 
क्या कहें कितना रहे हम  बेख़़बर  इस  दौर  में 
 
जंगलों की   वहशतें  जब  से  नगर में  आ  गईं 
दूर हमसे हो गया जंगल  का  डर  इस  दौर  में 

अंसार क़ंबरी की ग़ज़लें

हम इधर भी रहे हम  उधर  भी  रहे
जानते  भी   रहे   बेख़बर   भी  रहे
 
ज़िंदगी तो  रही  क़ैदियों  की तरह
बाज़ुओं पर मगर बालो-पर भी रहे