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मृदुल तिवारी की ग़ज़लें

मृदुल तिवारी की ग़ज़लें

कामयाबी तो मिली  हमको  मगर  इस  दौर  में 
क्या कहें कितना रहे हम  बेख़़बर  इस  दौर  में 
 
जंगलों की   वहशतें  जब  से  नगर में  आ  गईं 
दूर हमसे हो गया जंगल  का  डर  इस  दौर  में 

ग़ज़ल- एक 

कितनी उम्मीदें थी मुझको इस नगर से  देखिए 
लोग   कतराते   हैं   मेरी  रहगुज़र  से  देखिए 
 
मेरी  नाकामी पे ख़ुश  हैं ग़ैर  भी  अहबाब  भी 
बेख़बर  कोई  नहीं  है  इस  ख़बर  से   देखिए 
 
कल न मिल पाने की मजबूरी  थी उसके सामने 
आज  क्या   पैग़ाम  आता   है उधर  से  देखिए 
 
खोखला  जिसका  तना  हो झर गईं  हों  पत्तियॉं 
दूर  रहते   हैं   परिंदे  उस   शजर  से   देखिए
 
एक  सी सूरत नज़र आती  है  आम  इंसान  की 
अपने घर  से  देखिए  या उनके  घर  से  देखिए
 
रेल  पटरी  से  उतर  जाए  तो  कोई  क्या   करे 
हादिसे   को  आप   सरकारी   नज़र   से देखिए
 
तल्ख़ियॉं,  रुस्वाईयॉं,   महरूमियॉं,    मजबूरियॉं 
ये  हुआ  हासिल 'मृदुल' को अपने  घर से  देखिए
 
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ग़ज़ल- दो 
 
पश्चिमी   तहज़ीब  के  मारे  हुए  किरदार  हम 
सिर्फ़  बनकर  रह  गए  हैं सरफिरे बाज़ार हम 
 
हमको  होना   चाहिए   था  एक  दस्तावेज़  सा 
चंद ख़बरों के लिए क्यों  हो  गए  अख़़बार  हम 
 
आप  आएँगे तो   सहरा  में  बहार  आ  जाएगी 
यह कहानी सुन चुके हैं इक नहीं  सौ  बार  हम 
 
प्यास के मारे हुए थे फिर  भी  सब  कहने  लगे 
तेरी   बातों   में   समुंदर  आ  गए  बेकार  हम 
 
कितना समझाया था सबने काम कुछ अच्छे करो 
अब ज़मानत ज़ब्त है तो क्या  करें  सरकार  हम 
 
जी  हुज़ूरी हाँ हुज़री से  मिले  जिनको  ख़िताब 
उनका भी दावा यही  है, हो  गए  फ़नकार  हम 
 
वक़्त से पहले नहीं मिलता है जब कुछ भी 'मृदुल' 
फिर मुक़द्दर से  ज़ियादा  क्यों  करें  इसरार  हम
 
*********
 
 
ग़ज़ल- तीन 
 
कामयाबी तो मिली  हमको  मगर  इस  दौर  में 
क्या कहें कितना रहे हम  बेख़़बर  इस  दौर  में 
 
जंगलों की   वहशतें  जब  से  नगर में  आ  गईं 
दूर हमसे हो गया जंगल  का  डर  इस  दौर  में 
 
यह रक़ीबों की है  बस्ती  है  रक़ाबत  औज  पर 
कोई भी मिलता  नहीं  है  मोतबर  इस  दौर  में 
 
एक  जैसी  शक्ल  में  सब  दिख  रहे  हैं  देखिए 
क्या सहर क्या शाम और क्या दोपहर इस दौर में 
 
जिसकी जितनी है सिफ़ारिश उतनी ऊॅंची है उड़ान 
काम आते ही नहीं  हैं  बाल-ओ-पर  इस  दौर  में 
 
साज़िशें   बाहर  हुईं  और   हादिसे  घर   में   हुए 
चौकसी  कितनी  रही   है  बे-असर  इस  दौर  में 
 
पत्थरों से क्या शिकायत  वह  तो  पत्थर  हैं  'मृदुल' 
चोट देते  हैं  हमें  शीशे   के   घर    इस  दौर में
 
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ग़ज़ल- चार 
 
किसे ख़बर है यहॉं किस पे क्या  गुज़र  जाए 
जो  एक  पल  के  लिए  ज़िंदगी  ठहर  जाए 
 
सभी   के   ऐब   हमारी  नज़र  में  रहते  हैं 
मज़ा तो जब है कभी  ख़ुद पे  भी  नज़र जाए 
 
हज़ार  तंज़  किसी   पे   असर   नहीं   करते 
कोई ज़मीर  की  आवाज़  सुन  के  डर  जाए 
 
जिसे   मलाल  हो   आईना   टूट   जाने   का 
वो   पत्थरों  के  नगर  में  न  भूल  कर  जाए 
 
जो सिर्फ़ ज़िद है उस आवारगी से क्या हासिल 
कुछ  ऐसा   काम   करो  ज़िंदगी  सॅंवर  जाए 
 
खिले  जो  फूल  वफ़ा  के  तो  यूॅं   लगा  जैसे 
ख़िज़ॉं  के  बाद  चमन  ख़ुशबुओं  से  भर जाए 
 
'मृदुल' तवील सफ़र  है  तू  एहतियात  से  चल 
कि  तेरे  पॉंव  में  गर्दे-सफ़र   न   भर   जाए
 
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ग़ज़ल- पाँच 
 
आईना  जिसमें  न  हो  ऐसा  तो  कोई  घर  नहीं 
फिर भी ख़ुद को आदमी  पहचानता क्यों कर नहीं
 
देखिए इस दौर  का  कितना  दुखद  पहलू  है  ये 
राहज़न   तो   राहज़न   है   राहबर   रहबर  नहीं 
 
क्या हुआ  था  और  क्या  समझा  रहे  हैं  वो  हमें 
कोई   समझाए  उन्हें  भी  काम  यह  बेहतर नहीं 
 
फ़िक़्र थोड़ी  सी  जो  होती  आम  लोगों  की  उसे 
इस  तरह  से  अपना  हाकिम  घूमता रथ पर नहीं 
 
ग़ैर  वाजिब  काम  खुलकर  हो  रहे  हैं  आज  भी 
ऐसा  लगता  है  किसी  को  भी  किसीका डर नहीं
 
लाख  समझाओ मगर  तब तक  समझता  है  कहॉं 
जब  तलक  इंसान  को  लगती   यहॉं  ठोकर  नहीं 
 
सर  उठाकर  जीना  है  तो  मशवरा यह  है 'मृदुल' 
ज़िंदगी  के   फ़ैसला  करना  कभी   गिरकर नहीं
 
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वसंत जमशेदपुरी

26 September 2025

बेहतरीन गजलें

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रचनाकार परिचय

मृदुल तिवारी

ईमेल :

निवास : कानपुर (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि-25 फरवरी, 1956 
जन्मस्थान- कानपुर
शिक्षा- कला स्नातक
सम्प्रति- (से०नि०)हिंदी अधिकारी, द ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन लि०,कानपुर
प्रकाशन- विविध पत्र पत्रिकाओं व सामूहिक संकलनों में
प्रसारण- आकाशवाणी व दूरदर्शन के अनेक कार्यक्रमों में
सम्मान/पुरस्कार- विविध संस्थाओं द्वारा सम्मानित 
सम्पर्क- 22 मनोहर विहार,निकट वनका पुरवा, गोपाल नगर,कानपुर208011
मोबाइल- 9369735407