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फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

अंसार क़ंबरी की ग़ज़लें

अंसार क़ंबरी की ग़ज़लें

हम इधर भी रहे हम  उधर  भी  रहे
जानते  भी   रहे   बेख़बर   भी  रहे
 
ज़िंदगी तो  रही  क़ैदियों  की तरह
बाज़ुओं पर मगर बालो-पर भी रहे

ग़ज़ल- एक

तुमने तन या धन  देखा है 
हमने केवल  मन  देखा है 
 
लोगों  ने  धरती  के  आगे 
झुकते हुए  गगन  देखा है 
 
उसको अपना बना न पाए 
करके लाख  जतन देखा है 
 
उसने   अपनी  मर्यादा का 
होते   हुए  हनन   देखा है 
 
दौलत के  आगे दुनिया को 
करते   हुए  नमन  देखा है 
 
तुमने  देखा  फ़नकारों  को 
हमने  उनके  फ़न  देखा है 
 
******
   
 
ग़ज़ल- दो
 
जब  से  पश्चिम  से सूरज निकलने लगा 
रोशनी    क्या  हुई  देश   जलने  लगा 
 
आग    ऐसी    उगलने   लगा   आसमॉं
सर्द   झीलों   का   पानी  उबलने  लगा 
 
आईने       आस्तीनें     चढ़ाने     लगे
पत्थरों   का    कलेजा    दहलने  लगा 
 
धूप  से  डर  गए  जब    मेरे  हमसफ़र  
मेरा   साया   मेरे   साथ  चलने   लगा 
 
जब   कभी   झोपड़ी  सर  उठाने  लगी 
जाने  क्यों   ये  हवेली  को खलने  लगा
 
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ग़ज़ल- तीन
 
हम इधर भी रहे हम उधर भी रहे
जानते  भी  रहे   बेख़बर  भी  रहे
 
ज़िंदगी तो रही  क़ैदियों  की  तरह
बाज़ुओं पर मगर बालो-पर भी रहे
 
हम तो बढ़ते गए मंज़िलों की तरफ़
राह   में  राहज़न, राहबर  भी  रहे 
 
दूरियॉं भी  रहीं रात दिन  की  तरह
साथ मेरे  वो  शामो-सहर  भी  रहे 
 
दिल में हसरत यही रह गई 'क़म्बरी'
ज़िन्दगी का कोई  हमसफ़़र  भी  रहे
 
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ग़ज़ल- चार
 
कहीं  पे  जिस्म, कहीं  सर दिखाई देता  है 
गली-गली  यही   मंज़र  दिखाई   देता   है 
 
दिखा रहे हैं  वो  प्यासों  को   ऐसी  तस्वीरें
के  जिनमें  सिर्फ़  समंदर  दिखाई  देता  है 
 
गुनाहगार   नहीं   हो  तो  ये   बताओ  हमें 
तुम्हारी आँख  में  क्यूॅं  डर दिखाई  देता  है 
 
मुझे ये  शक़  है  कहीं वो मेरा रक़ीब न हो 
तेरी  गली  में  जो  अक्सर  दिखाई  देता है 
 
तुम्हारा दिल हो या काबा हो या हो बुतख़ाना 
हमें  तो  हर  जगह  पत्थर  दिखाई  देता  है
 
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ग़ज़ल- पॉंच
 
काल  पूरा   हुआ  राम  वनवास  का
लौट  आया  समय  हर्ष  उल्लास  का 
 
कोई  दरिया  नहीं  कोई  सागर  नहीं
प्यास है अब मुक़द्दर  मेरी  प्यास  का 
 
जा रहे  हो  मगर  लौट  आना  सनम
तोड़ना   मत  भरम  मेरे  विश्वास  का 
 
दीन ही  दीन  हो और  दुनिया  न  हो
कोई  मतलब  नहीं  ऐसे  संन्यास  का 
 
उसमें अपना भी इक नाम मिल जाएगा 
आप  पन्ना  पलटिये  तो  इतिहास  का 
 
जिस चमन में मोहब्बत की ख़ुशबू न हो 
क्या  करेंगे   भला   ऐसे  मधुमास  का 
 
दृष्टि  तो   दूर की  आप  रखते   हैं पर
हाल  देखें  कभी आस   का  पास  का
 
मिल गए  तुम  मुझे 'क़ंबरी' की  क़सम 
फल मुझे मिल गया  मेरी  अरदास  का
 
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2 Total Review

वसंत जमशेदपुरी

11 July 2025

बहुत दिन बाद आपको पढ़ा, अच्छी गजलें हैं

कैलाश बाजपेयी

11 July 2025

भाईसाहब आपकी ग़ज़लों का जवाब नहीं। तुमने तन व धन देखा है हमने केवल मन देखा है

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रचनाकार परिचय

अंसार क़ंबरी

ईमेल : ansarqumbari@gmail.com

निवास : कानपुर (उत्तर प्रदेश)

जन्मतिथि- 3 नवम्बर, 1950                
लेखन विधा- गजल, गीत, दोहा, मुक्तक, नौहा, सलाम,
यदा-कदा आलेख एवं पुस्तक समीक्षा आदि.
प्रकाशन
'अंतस का संगीत' (दोहा व गीत काव्य संग्रह) 
'कह देना' (ग़ज़ल -संग्रह)   ं
देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित 
सम्मान- उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 19960 के सौहार्द पुरस्कार एवं समय-समय पर देश की अनेकानेक साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित
विशेष- देश के विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों एवं टी वी चैनलों पर काव्य पाठ
सम्पर्क- 'जफर मंजिल /6, ग्वालटोली, कानपुर
मोबाइल- 9450938689