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नवम्बर-दिसम्बर 2025 संयुक्तांक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

डॉ० सीमा विजयवर्गीय की ग़ज़लें

डॉ० सीमा विजयवर्गीय की ग़ज़लें

अर्जुन की मछली-सा तू है, मेरी नज़रें  बस  तुझ  पर
बाक़ी   सारी   दुनियादारी,  मंज़िल,   रस्ते  सब  तेरे

ग़ज़ल- एक 
 
पर्वत, घाटी, झरने, वादी, चाँद    सितारे   सब  तेरे
मेरी ख़ुशियों  का  हर  मोती,  हीरे-पन्ने  सब   तेरे
 
अपना तो क्या तनहाई  में  वक़्त  गुज़ारा  करते  हैं 
भवरें-कलियाँ, तितली-बुलबुल, जुगनू प्यारे सब तेरे
 
जीती बाज़ी हार गए जब, अब शतरंज भी खेले कौन
राजा,  रानी,  हाथी,  घोड़े  और  ये  प्यादे  सब तेरे
 
अंतर्मन  के  उस  कोने  में  दफ़्न  हुए  हैं  सपने पर
भूल  नहीं  पाई  वो  यादें  और  वो  क़िस्से  सब  तेरे
 
भूले बिसरे ही  मथुरा  से  आ  इक  बार  बजा  बंसी
फिर से राधा, मधुवन, पनघट, गोकुल, ग्वाले सब तेरे
 
अर्जुन की मछली-सा तू है, मेरी नज़रें  बस  तुझ  पर
बाक़ी   सारी   दुनियादारी,  मंज़िल,   रस्ते  सब  तेरे
 
क्या  माँगूँ  मैं  तुझसे  यारा,  तू  मुझमें  मैं  हूँ  तुझमें
मेरा  दिल,  मेरी  धड़कन  के   ताने-बाने   सब   तेरे
 
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ग़ज़ल- दो 

धरा  तो बाँट लेंगे पर ख़ुशी क्या  बाँट  पाएँगे
हवा, सूरज वो चँदा-चाँदनी क्या  बाँट  पाएँगे
 
तुले हैं जो सियाही-लेखनी को बाँटने पल-पल
बताओ   वाग्देवी-भारती   क्या   बाँट   पाएँगे
 
उन्हें तो चाहिए बस  आसमाँ  बैठे  बिठाए  ही
मगर प्रतिभा, हुनर की ताज़गी क्या बाँट पाएँगे
 
है जिनकी ज़िंदगी ख़ंजर, ये तलवारें, ये हत्याएँ
कभी वो ज़िन्दगी को ज़िन्दगी क्या  बाँट  पाएँगे
 
वो हिन्दू और मुसलमाँ बाँट लेंगे एक  भाषण से
मगर इंसानियत  की  रौशनी  क्या  बाँट  पाएँगे
 
यहाँ गंगा की धारा है, वहाँ  यमुना  की  धारा  है
वो गंगा  और  जमुनी  रागिनी  क्या  बाँट  पाएँगे
 
नहीं फ़ुर्सत जिन्हें है वाद, पंथों  से  निकलने  की
अदब को फिर वो अदबी शायरी  क्या बाँट पाएँगे     
 
अदब को बाँटना जो चाहते  कितने  ही  खे़मों  में
कबीरा-सूर-तुलसी-जायसी    क्या    बाँट   पाएँगे
 
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ग़ज़ल- तीन 

इक दवा  हो  गई  प्रेम  की   वो  गली
इक दुआ  हो  गई  प्रेम  की  वो   गली
 
उसका टकराना हर दिन उसी मोड़ पर
इक  बला  हो  गई  प्रेम  की  वो  गली
 
पास आता गया  वो  मेरे  दिल  के  जब
सिलसिला  हो  गई  प्रेम  की  वो   गली
;
उसके  चेहरे  में  जैसे  ख़ुदा  बस  गया
फिर ख़ुदा  हो  गई  प्रेम  की   वो  गली
 
इश्क  का  इश्क  पर  रंग   ऐसा  चढ़ा
सूफ़िया  हो   गई  प्रेम  की   वो   गली
 
इक  तरफ़ इश्क़ था इक तरफ़ ये जहाँ
फिर  जुदा  हो  गई  प्रेम  की  वो गली
 
आज   भी  याद  उसकी  सताती  मगर
वाक़या  हो  गई   प्रेम   की   वो   गली

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ग़ज़ल- चार 
 
मुझे   चेहरे  पे  चेहरों   को   लगाना  ही  नहीं  भाता
यहाँ   हर  वक़्त  आडम्बर   दिखाना  ही  नहीं  भाता
 
कहेंगे लोग  क्या, इस डर  से  अच्छे  काम  भी छोड़ो
मुझे  इस  डर  से  दुनिया  को  निभाना ही नहीं भाता
 
पहाड़ों  से  तो   घण्टों   बात  कर   लेती  अकेले  में
मगर  इस  भीड़  के  नखरे  उठाना   ही  नहीं  भाता
 
मैं वाकिफ़ हूँ बहुत  अच्छी  तरह  से अपनी  थाती  से
मगर  इन  रूढ़ियों  को  भी  निभाना  ही  नहीं  भाता
 
छुपाता है  बहुत  ख़ुद   को   मगर   मैं पढ़ ही लेती हूँ
दिलों   के   बीच   दीवारें   उठाना   ही   नहीं   भाता
 
समझ में ही नहीं आता कि किस दुनिया की है ख़्वाहिश
मुझे    छल-छद्म   में   डूबा   ज़माना  ही   नहीं  भाता
 
बस इक छुट्टी का दिन और कुछ किताबें पास हो अपने
समय   है  क़ीमती,  इसको   गँवाना   ही   नहीं  भाता
 
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ग़ज़ल- पाँच 

कहाँ  गईं  वो  हँसीं  फ़िज़ाएँ,  चिनार  सोचे  ये  रात-दिन  अब
डरी-डरी  क्यों   दसों-दिशाएँ,  चिनार  सोचे  ये  रात-दिन  अब
 
उफनती नदियाँ, ये ढहते पर्वत, वो फटते बादल, वो सहमी वादी
थमेंगी  कब  ये   विभीषिकाएँ,  चिनार  सोचे  ये  रात-दिन  अब
 
ये मौत कब तक करेगी तांडव, ये काल कब  तक  बनेगा  दानव
विनाश   लाई  हैं  क्यों  घटाएँ,  चिनार  सोचे  ये  रात-दिन  अब
 
वो शिव का मंदिर ढहा है कल ही, वो  बस्तियाँ  भी  उजड़ गई हैं 
किसे   पुकारें   ये   आस्थाएँ,   चिनार   सोचे  ये  रात-दिन  अब
 
रँगीली 'नाटी', सजीली थिरकन, वो उजला  यौवन,कहाँ  वो  नर्तन
वो हँसती-खिलती सभी  दिशाएँ,  चिनार  सोचे  ये  रात-दिन  अब
 
पहाड़ी   रागों   में   डूबती-सी,   मचलती   शामें  हुई  हैं  गुमसुम
खड़ी   हैं   कैसी   ये   वर्जनाएँ,  चिनार  सोचे   ये  रात-दिन  अब
 
ओ ख़्वाहिशो तुम ज़रा तो  सोचो,  सहेगी  कुदरत  कहो  कहाँ  तक
बढ़ेंगी   कब  तक  ये  कामनाएँ,  चिनार  सोचे  ये   रात-दिन  अब
 
महकती घाटी,  हवा  वो  चंचल, वो  पल  में बारिश वो पल में सूरज
सजेंगी कब फिर  से  वो  फ़िज़ाएँ,  चिनार  सोचे  ये  रात-दिन  अब
 
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'नाटी'- हिमाचली नृत्य विशेष
 

1 Total Review

वसंत जमशेदपुरी

26 September 2025

आपकी गजलें सीधे दिल में उतर गईं, हार्दिक बधाई, बाई सा!

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रचनाकार परिचय

सीमा विजयवर्गीय

ईमेल : seemavijay000@gimail.com

निवास : अलवर (राजस्थान)

जन्मतिथि- 3 नवम्बर
जन्मस्थान- अलवर( राजस्थान)
लेखन विधाएँ- गीत, ग़ज़ल, दोहा, गद्य आदि
शिक्षा- एम० ए०, बी० एड एवं पी-एच डी
सम्प्रति- हिंदी व्याख्याता
प्रकाशन- चार ग़ज़ल संग्रह 'ले चल अब उस पर कबीरा', 'रज़ा भी उसी की', 'तेरी ख़ुशबू मेरे अंदर' एवं 'बुद्ध होना चाहती हूँ' प्रकाशित
प्रसारण- दूरदर्शन एवं रेडियो पर ग़ज़लों का प्रसारण
पता- 2/84, स्कीम- 10 बी, अलवर (राजस्थान)
मोबाइल- 7073713013