Ira Web Patrika
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डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की दूसरी कड़ी

अनन्ता धीरे-से उठकर बाहर चली गई। परेशान वो भी थी। उलझन का कोई सिरा ढूँढे से हाथ नहीं आ रहा था। क्या हुआ मम्मी-पापा के बीच? कहाँ गये पापा? क्या कोई झगड़ा हुआ? पर किस बात को लेकर? कोई तीसरा उनके बीच आ गया? पर कौन? क्या मम्मी सच में पापा के बारे में अब कुछ नहीं जानतीं?

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की पंद्रहवीं कड़ी

समीर जब शिखा के चेहरे पर अनायास आई मुस्कुराहट की वजह पूछता तो शिखा उसे अधिकांशतः कुछ भी बोलकर टाल जाती थी, पर कभी सच भी बोल देती थी कि प्रखर की किस बात पर हँसी है। समीर भी कई बार उसकी बातों पर मुस्कुराता था, और शिखा के पूछने पर बता देता था। पर तीनों किस बात पर क्यों हँस रहे हैं, यह वजह सबकी बहुत अपनी थी। कुल मिलाकर तीनों की ज़िंदगी रिटायर होने के बाद भी बहुत रफ़्तार से चलने लगी थी।

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की चौदहवीं कड़ी

कविता के अंत तक पहुँचते-पहुँचते दोनों एक-दूसरे का हाथ थामकर न जाने कब तक अपने रिश्ते को महसूस करते रहे। प्रखर ने शिखा की लिखी हुई कविता वाले पन्ने को तह करके अपनी शर्ट की पॉकेट में रख लिया। शिखा को अपनी कविता और प्रखर का दिल एक-दूसरे के बहुत पास महसूस हुए। दोनों एक-दूसरे की कही हुई हर बात को महसूस करके ख़ुद में सहेजते जा रहे थे।

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की पहली कड़ी

मन के कोकून से यादों का कीड़ा बाहर निकलने को फिर कुलबुलाया। इस बार देवयानी ने उन्हें सुलाने की कोई कोशिश नहीं की। यादों की ठंडी-मीठी बयार चुपके-से बह चली थी। वो देव की यादों की सुगंध में शनै:-शनै: डूबने लगी।