Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
नीलम तोलानी 'नीर' के लघु-उपन्यास 'करवाचौथ' की पाँचवीं कड़ी

यह सब घटनाक्रम इतनी तेजी से घटित हुआ कि कबीर न तो समझ पाया न ही सम्हल पाया...आख़िर ऐसा क्या ग़लत कह दिया था उसने.... इन छः महीनों के साथ में हर क्षण उसने यही महसूस किया था कि स्निग्धा भी वही चाहती है जो वह चाहता है... फिर ग़लती कहाँ हुई, जो भी था वह सपना था, या जो अब हो रहा है वह सपना है? क्या कहेगा वह पापा मम्मी को ..हर दिन जिस की बातें करता रहा... वह लड़की मुझसे शादी ही नहीं करना चाहती ...लिव इन की बात करती है . शनैः शनैः कबीर की आँखों में अँधेरा छाने लगा... अब क्या करें न तो स्निग्धा के बग़ैर जी सकता है , न उसकी शर्ते मान कर ...

प्रगति गुप्ता के उपन्यास "पूर्णविराम से पहले" की चौथी कड़ी

एक उम्र के बाद प्रेम का स्वरूप कितना विशाल हो जाता है....प्रखर को अच्छे
से महसूस हुआ। इंसान जिसे सच्चा प्यार करता है उसके साथ के हर रिश्ते से
भी बहुत प्यार करने लग जाता है। तभी तो छोटे से ही अंतराल में समीर भी
उसका मित्र बनने लगा था।

नीलम तोलानी 'नीर' के लघु-उपन्यास 'करवाचौथ' की चौथी कड़ी

स्निग्धा और कबीर जैसे एक अलग ही दुनिया में पहुँच गए थे ...हर घड़ी या तो एक दूसरे के साथ रहना था या एक दूसरे के ख़यालों में रहना था। यह वह पहले वाला गोवा तो हरग़िज़ नहीं था ...यह तो एक अलग ही दुनिया थी ..जहाँ सिर्फ़ प्रेम था ..समुद्र की लहरें अब सिर्फ़ खिलखिलाहटें ही लाती थीं.. सारी फ़िज़ाएँ जैसे हमेशा रजनीगंधा की महक से महक रही होती थीं ...गोवा की हवा में इतनी मादकता तो पहले कभी नहीं थी। दिन इतने छोटे और रातें इतनी लंबी ...ऐसा तो कभी नहीं था ।

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्ण-विराम से पहले' की तीसरी कड़ी

स्कूल, कॉलेज, प्रखर का मिलना, फिर समीर से विवाह और समीर के विदा लेने के बाद उसकी डायरियों का मिलना। रिश्तों से जुड़े समीकरण। कितनी बातें, कितनी यादें। अथाह समंदर के जैसी। जितना गहरे उतरते जाओ, न जाने कितनी रंग-बिरंगी सीपियाँ आसपास बिखरी हुई दिख रही थीं। कुछ बदरंग सीपियाँ भी जीवन के यथार्थ को सहेजे हुई थीं।