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डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की दूसरी कड़ी

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की दूसरी कड़ी

अनन्ता धीरे-से उठकर बाहर चली गई। परेशान वो भी थी। उलझन का कोई सिरा ढूँढे से हाथ नहीं आ रहा था। क्या हुआ मम्मी-पापा के बीच? कहाँ गये पापा? क्या कोई झगड़ा हुआ? पर किस बात को लेकर? कोई तीसरा उनके बीच आ गया? पर कौन? क्या मम्मी सच में पापा के बारे में अब कुछ नहीं जानतीं?

"मम्मी! पापा ऐसे बिना बताए हमें छोड़ कहाँ और क्यों चले गये? और आपने हमें बताया भी नहीं! अकेले क्यों सहना था माँ? आप कबसे बीमार थीं और मुझे देखिए कैसा बेटा हूँ, यह पता ही नहीं चला कि पापा घर छोड़कर चले गये और मम्मी यहाँ बेहोश होकर अकेली घर में पड़ी हैं। पड़ोस के अंकल-आंटी मेरी माँ को एडमिट न कराते तो जाने क्या हो जाता? और मैं! मैं तब आ पाता हूँ, जब माँ हॉस्पिटल से घर वापस आने वाली होती हैं। रोज़ बात भी करता रहा और मुझे यह पता ही कि मेरी मम्मी अकेले इतना बड़ा तूफ़ान सह गयीं। बताइए न माँ, यह सब क्या और कैसे हुआ?"
देवयानी ने पलकें नीचे झुका लीं। समझ नहीं पा रही थी क्या कहे? कैसे कहे?

"माँ! पापा आपके बिना एक पल भी नहीं रहते थे। कभी जो आप मेरे पास अकेले आ जाती थीं, कैसे शोर मचा देते थे? दूसरे ही दिन ऑफिस छोड़, हमारे पास आ जाते थे। आपको साथ लिए बिना कभी वापस आये हों, मुझे ऐसा याद नहीं पड़ रहा। और अब हमें ऐसे छोड़कर जाने का निर्णय! ऐसा क्या हुआ माँ? क्या छुपा रही हैं आप हमसे।" देवयांक की भीगी आँखों में इतने सवाल एक साथ देख सिहर गई देवयानी।
"नहीं-नहीं, मैं देव का सच, देव की इकलौती ग़लती उसके बेटे तक नहीं जाने दे सकती। देव उसके पिता, उसके आइडियल हैं।"
अपनी गीली हो आईं पलकों की कोरों से आँसू छुपा, देवयानी ने पूरा आत्मविश्वास बटोरकर बेटे की आँखों में झाँकते हुए जवाब दिया।
"न क्यों और न कहाँ? मुझे कुछ नहीं पता बेटा। शायद दुनियादारी से ऊब गये देव या शायद तुम्हारी माँ से।"

"यह क्या कह रही हो माँ?" आख़िरी शब्द देवयानी ने बहुत धीमे-से बोले फिर भी देवयांक ने सुन लिए।
"माँ! पापा और आपसे विलग! नहीं माँ। पूरी क़ायनात भी यह कहे तो मैं नहीं मान सकता। मुझे बहुत चिंता हो रही है। आख़िर कहाँ गये पापा? जबसे आया हूँ अपने तरीक़े से हर जगह पता लगाने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन अभी तक कुछ पता नहीं चल रहा। माँ कहीं ऐसा तो नहीं कोई अनहोनी…!!"
"नहीं नहीं बेटा, ईश्वर इतना निष्ठुर नहीं कि देव को देवयानी से सदा के लिए अलग कर उसका जीवन ही छीन ले।" आगे के शब्द देवयानी के गले में अटक गये। आँखों से अश्रुधार बह चली।
"माफ़ कर दो माँ! आपकी तबीयत ख़राब में आपका दिल दु:खा बैठा मैं।" देवयांक देवयानी के गले लग सिसकने लगा।
"नहीं बेटा! तुमने दिल नहीं दुखाया। बस नियति का लिखा भोग रहे हैं हम सब। मैं समझती हूँ तुम अपने माँ-पापा के लिए परेशान हो।"
"माँ! पापा को संसार से मोह समाप्त भी हो गया तो बताकर तो जाते। समझ नहीं आ रहा कहाँ तलाशूँ?"
"ईश्वर की शरण में किसी गुफा, किसी कन्दरा में जीवन का सच तलाशते देव तुझे कहाँ मिलेंगे बेटा?"
"माँ....! हमसे क्या ग़लती हुई, जो पापा ने ये सज़ा चुनी हमारे लिए?"
"क्या पता किसकी ग़लती और किसने सज़ा चुनी बेटा!"
"माँ! क्या कह रही आप? मुझे कुछ समझ नहीं आया।
माँ.....!"
"बेटा! परेशान मत हो। जब समझेंगे वापस आ जाएँगे। तुम परेशान होगे, चिया भी परेशान होगी। बेटियाँ बाप के ज़्यादा क़रीब होती हैं।"
"माँ!"
"तुमने कुछ खाया बेटा। कामकाज कैसा चल रहा है?"

"देवयांक! मम्मी को क्या हो गया है? मम्मी इतनी सामान्य कैसे हैं? देखो पापा घर छोड़कर चले गये और..." अनन्ता धीमे-से देवयांक के कान में फुसफुसाई।
"चुप करो अनी। न जाने मम्मी के दिमाग़ में क्या चल रहा है? सब जानते हैं पापा मम्मी को बहुत प्यार करते थे। और मम्मी भी। कोई समझ ही नहीं सकता दोनों एक-दूसरे के लिए क्या हैं? तुम चिया को देखो कहाँ गई?

अनन्ता धीरे-से उठकर बाहर चली गई। परेशान वो भी थी। उलझन का कोई सिरा ढूँढे से हाथ नहीं आ रहा था। क्या हुआ मम्मी-पापा के बीच? कहाँ गये पापा? क्या कोई झगड़ा हुआ? पर किस बात को लेकर? कोई तीसरा उनके बीच आ गया? पर कौन? क्या मम्मी सच में पापा के बारे में अब कुछ नहीं जानतीं? फिर इतनी सामान्य कैसे? सबकुछ सही है उनके बीच तो पापा के जाने का हमें क्यों नहीं बताया?"

जितना सोचती, उतनी यह गुत्थी उलझती जाती। देवयांक इस विषय में कुछ सुनने को तैयार ही नहीं था। वो चिया को खोजते हुए मम्मी के बनाये बगीचे में चली आई। सामने लताओं को काटकर बीच में पत्थर डलवा, मम्मी ने बहुत सुंदर बैठने की जगह बना रखी थी। साइड में अमलतास, कचनार के पेड़ शान से झूम रहे थे। पूरी बगिया पर मौसमी फूलों की बहार थी। दूसरे कोने में आम-अमरूद, आँवला जैसे बड़े पेड़ भी एक-दूसरे का आलिंगन कर रहे थे। मम्मी ने इतनी ख़ूबसूरती से यह बगीचा सजा रखा था कि यहाँ आ, बाहर निकलने का मन ही नहीं होता था। गेट से अन्दर की ओर आते ही गुलमोहर अपनी पूरी शान से चटक रंग बिखेर रहा था। मम्मी अपनी इस दुनिया से बाहर निकलने को बहुत मुश्किल से तैयार होती थीं और पापा, वो तो जैसे मम्मी को देखकर ही जीते थे। कुछ देर ही वो बगिया की सुंदरता में खो पाई कि गुलमोहर के लाल रंग देख वो फिर से पापा को ही सोचने लगी। लेकिन कहीं कोई सिरा हाथ नहीं आ रहा था।

"चिया कहाँ है अनी?" देवयांक की आवाज़ सुन, वो अपने विचारों के जाल से बाहर आ गई।
"उसी को देख रही हूँ देवयांक।"
देवयांक उसका चेहरा ध्यान से देखने लगा।
"क्या हुआ अनी? क्या सोच रही हो?"
वो कोई जवाब देती तब तक सामने से चिया आकर देवयांक के गले में झूल गई।
"मुझे खोज रहे थे न? मैं यहाँ छिपी थी पापा। बस थोड़ा आपको परेशान कर रही थी। आप भी दादू को ऐसे ही परेशान करते थे न!"
देवयांक ने लाड़ से चिया को गले लगा लिया। काश! पापा भी उसे ऐसे ही कहीं मिल जाते तो उनके गले लगकर जीभर कर रो लेता। वो चिया को साथ लगाये देवयानी के पास चला आया।

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रचनाकार परिचय

उपमा शर्मा

ईमेल : dr.upma0509@gmail.com

निवास : दिल्ली

जन्मतिथि- 5 सितंबर, 1979
जन्मस्थान- रामपुर(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- बी० डी० एस०
संप्रति- दंत चिकित्सक
प्रकाशन- लघुकथा संग्रह 'कैक्टस' (प्रभात प्रकाशन, 2023) एवं उपन्यास 'अनहद' (शुभदा प्रकाशन, 2023)
हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कथाक्रम, कथाबिम्ब, कथादेश, साहित्य अमृत, हरिगंधा, साक्षात्कार, पुरवाई, कथा समवेत, प्रेरणा अंशु, अविलोम, लोकमत, अमर उजाला, प्रभात ख़बर, हरीगंधा, साक्षात्कार जैसी पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर रचनाओं का प्रकाशन
प्रसारण- आकाशवाणी दिल्ली से समय-समय पर कविताएँ प्रसारित
सम्मान- 'सत्य की मशाल' द्वारा 'साहित्य शिरोमणि सम्मान', प्रेरणा अंशु अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा लेखन सम्मान, हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच, गुरुग्राम लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा मणि सम्मान, कुसुमाकर दुबे लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, श्री कमलचंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल के दिल्ली अधिवेशन में 'लघुकथा श्री सम्मान' एवं प्रतिलिपि सम्मान, पुस्तक 'कैक्टस' को श्री पारस दासोत स्मृति सम्मान
निवास- बी- 1/248, यमुना विहार, दिल्ली- 110053
मोबाईल- 8826270597