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प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की सोलहवीं कड़ी

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की सोलहवीं कड़ी

सार्थक शिखा के पास आकर बैठ गया तो शिखा बोली थी- सार्थक, ख़ुश रहो बेटा। तुम्हारे पापा और मेरे विचार इस विषय में एक ही हैं। ख़ैर अब छोड़ो। अपने कमरे में जाकर रेस्ट करो। तुम्हें कल निकलना भी है। अपना सब सामान देख लेना बेटा। नई नौकरी में जल्दी आना नहीं होगा। मेरी कहीं ज़रूरत हो तो बता देना। मदद को आ जाऊँगी।

प्रखर जब इस तरह की बातें करता तो शिखा को समीर और उसकी शादी के बाद के दिन बहुत बार याद आते। जब दोनों का विवाह हुआ, समीर बहुत कम बोलते थे। शिखा बहुत कोशिश करती कि दोनों के बीच संवाद बना रहे पर समीर की कम बोलने की आदत उसकी सभी कोशिशों को नाकाम कर देती। समीर जब भी बोलते, बहुत सीधा-सपाट बोलते। उनकी बातों में लेप-लपाट नहीं था। तभी तो उनका प्यार भी रूखा मगर साफ़ था। उनकी बातें और विचार बहुत अच्छे थे। उन्होंने कभी भी शिखा से कोई शिकायत नहीं की। जीवन में जो भी उन्हें मिला, वह उससे भरपूर संतुष्ट थे।

विवाह से पहले शिखा को प्रखर से इतना अधिक भावनात्मक प्रेम मिल चुका था कि समीर का न बोलना उसे बहुत अखरता था। कई-कई दिन दोनों के बीच बग़ैर बात किए निकल जाते, समीर को कोई फर्क नहीं पड़ता था। पर शिखा स्कूल से आने के बाद अक्सर बहुत अकेलापन महसूस करती थी। घर में फैले हुए सुई पटक सन्नाटे में उसे ख़ुद की ही आवाज़ें गूँजती हुई सुनाई देती थीं। कई बार शिखा को लगता कि इतने बड़े घर में वह पागल न हो जाए। आसपास के घरों से बच्चों की आवाज़ें आते हुए सुनती तो बैचैन हो जाती। उसको लगता कि कोई किलकारी उनके यहाँ भी गूँजे तो कम से कम ख़ुद की ही आवाज़ों से डर न लगे। विवाह को तब तीन साल गुज़र चुके थे। एक रोज़ उसने ने समीर से कहा था- "समीर! आप राज़ी हो तो हम बच्चा गोद ले लें। हम दोनों इतना कमाते हैं।क्या होगा इस रुपये का हमारे बाद!"

"क्या होगा? इतना भी क्या सोचना है! अगर होना होगा तो अपना ही बच्चा होगा, मुझे कहीं से बच्चे को गोद लेकर नहीं पालना। प्लीज़ तुम गोद लेने जैसी बातों को सोचना भी नहीं। हम दोनों में जब कोई कमी नहीं तो समय आने पर बच्चा भी हो जाएगा।"
इतना सबकुछ बोलते हुए समीर के दिमाग़ में शिखा की फीलिंग का ज़रा भी ख़याल नहीं आता था। समीर अगर शिखा के मन की सोचते तो आपस में मिलकर निर्णय लेते। उस रोज़ समीर की बातें सुनकर उसे लगा था कि समीर सिर्फ़ अपना फैसला सुना रहे हैं।

समीर की जब पोस्टिंग मथुरा हुई, वहाँ एक बुजुर्ग आंटी उनके पड़ोस में अकेले रहा करती थी। उनके कोई बाल-बच्चे नहीं थे। दो साल पहले ही अंकल की मृत्यु हुई थी। जब समीर ने आंटी को अकेले हर बात के लिए परेशान होते हुए देखा, तब उन्हें भी यह एहसास हुआ कि कभी उनके साथ भी ऐसा हो गया तो!
उस घटना के बाद समीर ने शादी के सात साल बाद ख़ुद शिखा से कहा- "तुम कहो तो एक बच्चा गोद ले लेते हैं। समय का क्या पता कब अकेला रहना पड़े। कम से कम जो भी अकेला होगा, उसके साथ कोई तो होगा।"

शादी के इतने सालों बाद समीर का इस तरह सोचना ही पल भर में शिखा को ख़ुशियों से भर गया था। दोनों ने अनाथाश्रम से सार्थक को गोद लिया था। ज्यों-ज्यों सार्थक बड़ा हुआ, उन दोनों की ज़िंदगियों में भी रफ़्तार आ गयी। समीर के साथ जो बातचीत में खाई बन गई थी, वो सार्थक के आने के बाद पटने लगी थी। बच्चे के बहाने ही दोनों में किसी न किसी बात पर बातचीत होती। दोनों उसकी चुलबुली हरकतें देखकर साथ-साथ मुस्कुराते। जैसे-जैसे सार्थक बड़ा हुआ, पढ़-लिखकर समर्थ हुआ, उसकी सोच अपने माँ-पाप से बिल्कुल नहीं मिलती थी। जीन्स का फर्क था शायद। समीर और शिखा ने उसे खूब लाड़, प्यार और दुलार किया पर जैसा वो दोनों चाहते थे, सार्थक वैसा नहीं बना।

पिछले साल उसने बग़ैर दोनों को बताए मीता नाम की लड़की से शादी कर ली। सार्थक जब मीता को ब्याह करके घर ले आया। तभी दोनों को उसके विवाह कर लेने का पता लगा। शिखा ने ही सार्थक के घंटी बजाने पर दरवाज़ा खोला था। सार्थक ने दरवाज़े पर माँ को देखकर कहा- "माँ! मैंने मीता से शादी कर ली हैं। आपसे और पापा से आशीर्वाद लेने आया हूँ।"

पहले तो शिखा चकित रह गयी। फिर उसने दौड़कर पूजा की थाली तैयार की। दोनों की आरती उतारकर घर के अंदर लिया। दोनों बच्चों के पैर छूने पर समीर और शिखा ने आर्शीवाद दिया। समीर तो सार्थक की इस हरकत पर हक्के-बक्के ही रह गये। उस रोज़ ही समीर ने सार्थक को अपने कमरे में बुलाया और बातें कीं। पहली बार शिखा ने समीर को सार्थक से इतनी सारी बातें करते हुए देखा था, जितनी बातें शायद उसके आने और नौकरी पर जाने के बीच नहीं की होंगी।

"सार्थक कुछ बात करनी हैं तुमसे बेटा, मेरे कमरे में आना।"
"हाँ आता हूँ पापा। मीता के साथ कमरे में सामान रखवा दूँ। फिर आपके पास आता हूँ।" बोलकर सार्थक मीता के साथ अपने कमरे में चला गया। थोड़ी देर में आने का बोलकर वह समीर और शिखा के पास तीन घंटे बाद आया और बोला- "सॉरी पापा, थोड़ा लेट हो गया। मीता के साथ सामान लगवाने लग गया। कल ही हम दोनों को वापस लखनऊ के लिए निकलना हैं। मीता सभी सामान अपने साथ नहीं ले जाना चाहती थी। इसलिए उसके साथ कुछ सामान अपने कमरे में सेट करवा रहा था।"

"सार्थक कल ही निकल रहे हो, क्यों? कुछ दिन मीता और तुम रुकते तो हमें भी अच्छा लगता।" शिखा ने सार्थक को कहा।
"नहीं माँ, मीता की भी दो दिन बाद ही जॉइनिंग है। सोचा बस एक बार आप दोनों से उसे मिलवा दूँ। वापसी की टिकट करवा ली थी मैंने।"
शिखा चुपचाप अपने बेटे की बातों को सुनकर विश्लेषण कर रही थी। तभी समीर ने सीधी और सपाट बात सार्थक से की- "सार्थक, तुमने लड़की पसंद कर रखी थी और अपने पेरेंट्स को बताने की ज़रूरत भी नहीं समझी। अगर तुम हमसे मीता से प्यार और शादी की बात साझा करते तो हम तुम दोनों की शादी के लिए मना क्यों करते? क्या तुम्हें हम पर विश्वास नहीं था बेटा? तुमने तो हमारे लिए बहुत विपरीत स्थिति कर दी। नई बहू के घर आने की हम कोई तैयारी भी नहीं कर पाये। तुम्हें इतना तो पता ही है न कि नई बहू के आने पर घर में पूजा रखी जाती है। तुमने तो सब उल्टा कर दिया।"

"कोई बात नहीं पापा, मैं ऐसा कुछ भी नहीं सोचता। शादी का निर्णय बहुत जल्दी में लेना पड़ा। मीता के घर वाले उसकी शादी कहीं और करवाने पर तुले थे। वो चाहते ही नहीं थे कि हम दोनों शादी करें।"
"इसका मतलब मीता के घरवालों को तुम्हारे प्यार का पता था। बस हमें ही नहीं पता था। तुम्हें नहीं लगा कि अपने माँ-पापा को भी विश्वास में लेना चाहिए।"
"पापा, सब बहुत जल्दी हुआ। हमने मंदिर में जाकर शादी कर ली है। कोर्ट में जाकर अपनी शादी रजिस्टर करने के लिए फॉर्म भर दिया है। जैसे ही कोर्ट में हम शादी करेंगे, आप अपनी मर्ज़ी की रस्में करवा लीजिएगा।"

सार्थक की बातें सुनकर समीर बेहद चिढ़ गये थे। उनकी चिड़चिड़ाहट को महसूस करके शिखा ने चुपचाप समीर के हाथ पर हाथ रख कर शांत रहने को कहा-
"अपनी मर्ज़ी की रस्में, भूल जाओ सार्थक। अब ऐसा कुछ नहीं होगा। जब तुमने अपनी शादी से जुड़ी किसी भी बात में हमें कहीं जगह ही नहीं दी तो अब मैं और तुम्हारी माँ पागल नहीं हैं कि अपने मेहनत के रूपयों को यूँ ही ज़ाया करें।" शिखा ने कभी भी समीर को इस तरह से बातें करते हुए नहीं सुना था।
"सॉरी पापा, आपको बुरा लगा। मुझे लगा था आप दोनों अंडरस्टैंड करोगे।"
"सही कहा बेटा, हम दोनों अंडरस्टैंड करेंगे पर तुम हमें अंडरस्टैंड क्यों नहीं कर पाये। आज मुझे अफ़सोस हो रहा है। हमारी ख़ुशियाँ तुम्हारे साथ थीं पर तुम्हारी ख़ुशियों में हम दोनों नहीं हैं बेटा! मैं और तुम्हारी माँ हमेशा चाहेंगे कि तुम दोनों बहुत ख़ुश रहो। हमारी ब्लेसिंग हमेशा तुम्हारे साथ है। कल तुम दोनों वापस निकल रहे हो, अच्छे से पहुँचो। दुनिया जहान की ख़ुशियाँ तुम्हें मिले, हम दोनों यही चाहते हैं।" अपनी बात बोलकर समीर चुप हो गये।

इसके बाद समीर ने एक बार भी सार्थक से बात नहीं की। इसके बाद सार्थक शिखा के पास आकर बैठ गया तो शिखा बोली थी- सार्थक, ख़ुश रहो बेटा। तुम्हारे पापा और मेरे विचार इस विषय में एक ही हैं। ख़ैर अब छोड़ो। अपने कमरे में जाकर रेस्ट करो। तुम्हें कल निकलना भी है। अपना सब सामान देख लेना बेटा। नई नौकरी में जल्दी आना नहीं होगा। मेरी कहीं ज़रूरत हो तो बता देना। मदद को आ जाऊँगी।"

बस इतना-सा बोलकर शिखा चुप हो गयी और सार्थक उठकर अपने कमरे में चला गया। शिखा ने आज पहली बार समीर को इतनी बातें करते देखा था। समीर ने इस तरह कभी भी सार्थक से बातें नहीं की थी। ऐसा पहली बार हुआ था जब समीर ने इतने क्रोध में सार्थक से बात की थी।

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रचनाकार परिचय

प्रगति गुप्ता

ईमेल : pragatigupta.raj@gmail.com

निवास : जोधपुर (राजस्थान)

जन्मतिथि- 23 सितंबर, 1966
जन्मस्थान- आगरा (उत्तरप्रदेश)
शिक्षा- एम०ए० (समाजशास्त्र, गोल्ड मैडलिस्ट)
सम्प्रति- लेखन व सोशल-मेडिकल क्षेत्र में काउंसिलिंग
प्रकाशन- तुम कहते तो, शब्दों से परे एवं सहेजे हुए अहसास (काव्य-संग्रह), मिलना मुझसे (ई-काव्य संग्रह), सुलझे..अनसुलझे!!! (प्रेरक संस्मरणात्मक लेख), माँ! तुम्हारे लिए (ई-लघु काव्य संग्रह), पूर्ण-विराम से पहले (उपन्यास), भेद (लघु उपन्यास), स्टेप्लड पर्चियाँ, कुछ यूँ हुआ उस रात (कहानी संग्रह), इन्द्रधनुष (बाल कथा संग्रह)
हंस, आजकल, वर्तमान साहित्य, भवंस नवनीत, वागर्थ, छत्तीसगढ़ मित्र, गगनांचल, मधुमती, साहित्य भारती, राजभाषा विस्तारिका, नई धारा, पाखी, अक्षरा, कथाबिम्ब, लमही, कथा-क्रम, निकट, अणुव्रत, समावर्तन, साहित्य-परिक्रमा, किस्सा, सरस्वती सुमन, राग भोपाली, हिन्दुस्तानी ज़ुबान, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, नई दुनिया, दैनिक नवज्योति, पुरवाई, अभिनव इमरोज, हिन्दी जगत, पंकज, प्रेरणा, भारत दर्शन सहित देश-विदेश की लगभग 350 से अधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन और अनुवाद।
कविता अनवरत, कविता अभिराम, शब्दों का कारवां, समकालीन सृजन, सूर्य नगरी की रश्मियाँ, स्वप्नों की सेल्फ़ी, कथा दर्पण रत्न, छाया प्रतिछाया, सतरंगी बूंदें, संधि के पटल पर आदि साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
प्रसारण-
जयपुर दूरदर्शन से चर्चा व आकाशवाणी से सृजन का नियमित प्रसारण
सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में कविता का स्थान विषय पर टी.वी. पर एकल साक्षात्कार
संपादन- अनुभूतियाँ प्रेम की (संपादित काव्य संकलन)
विशेष-
राजस्थान सिन्धी अकादमी द्वारा कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' का अनुवाद।
कहानियों और कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' पर शोध।
प्रतिष्ठित कथा प्रधान साहित्यिक पत्रिका 'कथाबिम्ब' के संपादक मण्डल में क्षेत्रवार संपादक
कहानियों व कविताओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद
हस्ताक्षर वेब पत्रिका के लिए दो वर्ष तक नियमित 'ज़रा सोचिए' स्तंभ
सम्मान/पुरस्कार-
हिंदी लेखिका संघ, मध्यप्रदेश (भोपाल) द्वारा 'तुम कहते तो' काव्य संग्रह पर 'श्री वासुदेव प्रसाद खरे स्मृति पुरस्कार' (2018)
'अदबी उड़ान काव्य साहित्य पुरस्कार' काव्य संग्रह तुम कहते तो और शब्दों से परे पुरस्कृत व सम्मानित (2018)
साहित्य समर्था द्वारा आयोजित अखिल भारतीय 'डॉ० कुमुद टिक्कू कहानी प्रतियोगिता' श्रेष्ठ कहानी पुरस्कार (2019 और 2020)
विद्योत्तमा फाउंडेशन, नाशिक द्वारा 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' कहानी संग्रह 'विद्योत्तमा साहित्य सम्राट सम्मान' से पुरस्कृत (2021)
श्री कमल चंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता प्रथम पुरस्कार 2021
कथा समवेत पत्रिका द्वारा आयोजित 'माँ धनपति देवी स्मृति कथा साहित्य सम्मान' 2021, विशेष सम्मान व पुरस्कार
लघु उपन्यास भेद पुरस्कृत मातृभारती 2020
विश्व हिंदी साहित्य परिषद द्वारा 'साहित्य सारंग' से सम्मानित (2018)
अखिल भारतीय माथुर वैश्य महासभा के राष्ट्रीय सम्मेलन में 'समाज रत्न' से सम्मानित (2018)
डॉ० प्रतिमा अस्थाना साहित्य सम्मान, आगरा (2022)
कथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान द्वारा राज्य स्तरीय सम्मान 'रघुनंदन त्रिवेदी कथा सम्मान' स्टेपल्ड पर्चियांँ संग्रह को- 2023
पंडित जवाहरलाल नेहरु बाल साहित्य अकादमी, राजस्थान द्वारा 'इंद्रधनुष' बाल कथा संग्रह को 'बाल साहित्य सृजक' सम्मान 2023 
जयपुर साहित्य संगीति द्वारा 'कुछ यूँ हुआ उस रात' को विशिष्ट श्रेष्ठ कृति सम्मान 2023
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