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डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की तीसरी कड़ी

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की तीसरी कड़ी

"इसे देव के कमरे में पहुँचा देना। अगर यह कुछ सामान लाई हो तो वो भी वहीं रखवा देना। न लाई हो तो जब यह उठ जाए, इससे पूछ इसकी ज़रूरत का सामान किसी को भेज या तुम ख़ुद जाकर बाज़ार से ले आना। ये अब से यहीं रहेगी।"

"मम्मी! वापसी का टिकट कब का करा लूँ? कब चलना सही रहेगा। एक-दो दिन में थोड़ी तबीयत सही हो फिर चलते हैं हम लोग।"
"अनन्ता बेटा! तुम देव का कमरा साफ़ करा दो। उनकी एक मित्र आने वाली है।"
"माँ… !"
"देवयांक माली को बुलाकर बेटा बगीचे की सफ़ाई भी करवा दो। लताएँ बहुत बढ़कर ज़मीन पर फैल गयी हैं। चलने का भी रास्ता नहीं मिलता।"
अनन्ता ने हैरान नज़रों से देवयानी और देवयांक को बारी-बारी देखा। देवयांक के चेहरे पर भी हैरत के भाव उतने ही गहरे थे।

"माँ! कब का टिकट कराना है? मैं आपको अब यहाँ अकेला नहीं छोड़ सकता।" झुँझलाहट के भाव देवयांक के चेहरे पर तिर गये, जिसे देवयानी और अनन्ता दोनों ने देखा।
"इस बारे में बात करते हैं देवयांक, पहले जो मैंने कहा, वो करो।" कहकर हाथ के इशारे से देवयानी ने देवयांक को कुछ भी बोलने से रोक दिया।
अनन्ता ने कमरा साफ़ करा दिया। हर चीज़ करीने से रखी हुई थी। पापा अचानक क्यों घर छोड़ गये, ये सवाल देवयांक और अनन्ता दोनों के लिए अभी तक अनसुलझा था। उतना ही अनसुलझा था अनन्ता के लिए माँ का व्यवहार। माँ अब यहाँ अकेले कैसे रहेंगी? फिर वो जाने के विषय में कोई बात क्यों नहीं कर रही? माँ-पापा की जोड़ी की सब मिसाल देते हैं फिर पापा का मम्मी का छोड़कर जाना! सोच के जाल में मछली जैसी उलझी अनन्ता की नज़र बाहर गयी तो एक सुंदर-सकुचाई-सी लड़की गेट पर खड़ी थी। अनन्ता घबराई-घबराई-सी इस लड़की को दिलचस्पी से देखने लगी। दूध में केसर घुली रंगत। तीखे नैन-नक्श। काली-गहरी आँखें। उम्र में उससे कुछ छोटी ही होगी।

"वो अभी भी घबराई-सी खड़ी थी। उदासी भरी इस ख़ूबसूरती ने अनन्ता का भी मन मोह लिया।
"देवयानी ने उसे क्यों बुलाया है? देव का फोन क्यों बंद आ रहा है? देव उससे बात क्यों नहीं कर रहे हैं? यहाँ तक आ तो गयी, अब अंदर जाए कि न जाए!" शर्मिष्ठा गेट पर अपनी सोच में गुम थी कि एक मीठी आवाज़ शर्मिष्ठा को विचारों की दुनिया से बाहर ले आयी।" आपको किससे मिलना है?"
"जी। मुझे देवयानी जी ने बुलाया है।"
अनन्ता की हैरत और बढ़ गयी।

"यह किसको बुलाया है मम्मी ने और क्यों?" वो उसे देवयानी के पास ले आयी।
"आओ शर्मी।" मधुर आवाज़ और शर्मी संबोधन ने उसका डर कुछ कम किया।
"जी, वो देव....। भीगी-भीगी-सी आँखों से शर्मी ने कुछ बोलने की कोशिश की।
"देव घर और हमें छोड़कर न जाने कहाँ चले गये शर्मी। तुम्हें देव ने पता नहीं कुछ बताया कि नहीं बताया। तुम अकेली वहाँ रोये जा रही होगी। इसीलिए मैंने तुम्हें यहाँ बुला लिया है।" शर्मी की आँसुओं से भरी आँखें बेतहाशा छलकने लगीं। उसका रोना देख अनन्ता की आँखें भी भर आयीं।
देवयानी ने शर्मी को अपने से चिपका लिया। उसकी गोद की गरमाहट पा, शर्मी हिचकियों से रोने लगी। वो कैसे बताती कि उन दोनों के बीच आने से सिर्फ देव और देवयानी ने ही अलगाव नहीं झेला, उसने भी अपने रीते जीवन में मुट्ठी भर खुशियाँ भरने की चाह में अपने अंतस के लिए ढेरों काँटे चुन लिए थे। देव सिर्फ देवयानी का था। वो न जाने क्यों और कैसे उन दोनों के बीच चली आयी? देव की दूरी का दु:ख देवयानी की गोदी में पिघलने लगा। रोते-रोते शर्मी अचेत हो गयी। देवयानी ने घबराकर डाॅक्टर को फोन कर दिया। डाॅक्टर आराम की हिदायत देकर चले गये। देव की दी इस ज़िम्मेदारी को वो अपलक निहार रही थी।अब यही उसके जीवन का मक़सद है। शर्मिष्ठा के चेहरे को प्यार से सहला; देवयानी बाहर आ गयी।

"अनन्ता बेटा!"
"जी मम्मी!"
"इसे देव के कमरे में पहुँचा देना। अगर यह कुछ सामान लाई हो तो वो भी वहीं रखवा देना। न लाई हो तो जब यह उठ जाए, इससे पूछ इसकी ज़रूरत का सामान किसी को भेज या तुम ख़ुद जाकर बाज़ार से ले आना। ये अब से यहीं रहेगी।"
अनन्ता़ ने हैरानी से देवयानी को देखा।
"क्या हुआ बेटा? कुछ पूछना चाह रही हो?"
"न, नहीं तो मम्मी। मैं करवाती हूँ।"
अपने में उलझती अनन्ता शर्मिष्ठा का बैग देव के कमरे में रखवाने लगी। और तो कुछ वो लाई ही नहीं थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। देवयानी इस समय एक पहेली बनी हुई थी। शर्मिष्ठा को बैड पर लिटा; अनन्ता अपने कमरे में चली गयी। देवयांक भी हैरान-परेशान-सा बैठा था। पिछले एक दिन के बीते इस घटनाक्रम ने देवयांक की कुछ भी सोचने- समझने की ताक़त छीन ली थी। वो जान गया था कि बात इतनी सीधी नहीं, जितनी वो समझ रहा है लेकिन वो अपनी माँ को भी जानता था कि माँ उसे कुछ भी ऐसा नहीं बताने वालीं, जिससे उसके जीवन की नींव हिले। जो भी हुआ हो, उसे माँ का बस हर हाल में सपोर्ट करना है। माँ पहले ही दु:ख में घिरी हैं। कोई भी अप्रिय बात कर वो माँ का दिल नहीं दुखाएगा। यही हिदायत उसने अनन्ता को भी दी और बगीचे की तरफ़ चला आया। अनन्ता चिया को खाना खिलाने लगी।

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रचनाकार परिचय

उपमा शर्मा

ईमेल : dr.upma0509@gmail.com

निवास : दिल्ली

जन्मतिथि- 5 सितंबर, 1979
जन्मस्थान- रामपुर(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- बी० डी० एस०
संप्रति- दंत चिकित्सक
प्रकाशन- लघुकथा संग्रह 'कैक्टस' (प्रभात प्रकाशन, 2023) एवं उपन्यास 'अनहद' (शुभदा प्रकाशन, 2023)
हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कथाक्रम, कथाबिम्ब, कथादेश, साहित्य अमृत, हरिगंधा, साक्षात्कार, पुरवाई, कथा समवेत, प्रेरणा अंशु, अविलोम, लोकमत, अमर उजाला, प्रभात ख़बर, हरीगंधा, साक्षात्कार जैसी पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर रचनाओं का प्रकाशन
प्रसारण- आकाशवाणी दिल्ली से समय-समय पर कविताएँ प्रसारित
सम्मान- 'सत्य की मशाल' द्वारा 'साहित्य शिरोमणि सम्मान', प्रेरणा अंशु अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा लेखन सम्मान, हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच, गुरुग्राम लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा मणि सम्मान, कुसुमाकर दुबे लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, श्री कमलचंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल के दिल्ली अधिवेशन में 'लघुकथा श्री सम्मान' एवं प्रतिलिपि सम्मान, पुस्तक 'कैक्टस' को श्री पारस दासोत स्मृति सम्मान
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