Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की पाँचवी कड़ी

बेकल-सा देव उठकर बाहर चला आया। उसका मन बस आह्वान पर अटका था। योग की कौनसी सीढ़ी है, जिसे साध वो देवयानी को पा लेगा। इंसान भी कितना अजीब होता है, हमेशा अप्राप्य के पीछे भागता है। जब देवयानी उसके पास थी, न जाने कौनसी भावना के तहत शर्मिष्ठा के पास चला गया। और जब देवयानी उससे दूर हुई तो दिल सिर्फ देवयानी को याद करता है तो क्या उसने देवयानी को धोखा दिया?

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की अठारहवीं कड़ी

आज न जाने क्या हुआ प्रखर का हाथ अपने कंधे से हटाते समय शिखा उसका हाथ छोड़ नहीं पाई और उसे पकड़कर सुबकने लगी। शिखा को सुबकते हुए देखकर तेज़ चेस्ट पैन में भी समीर ने कहा- "सब ठीक हो जाएगा शिखा! हौसला रखो। इतनी जल्दी मरने वाला नहीं हूँ मैं।"

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की तीसरी कड़ी

मिटने से पहले सबको जता देती है कि मेरे पास अब लम्हे सिमट रहे हैं। सब अपने घर को लौट चलो। पक्षी अपने बसेरों पर चल देते हैं। पशु अपने घर की ओर लौट चलते हैं और गाय जब गले में रुनझुन घंटी की गूँज के साथ अपने टापों से धूल उड़ाती हुई घर की ओर लौटती हैं। अहा! अपनी माँ को रँभाते हुए वो नन्हें-नन्हें छौने उनके बछड़े और घर वापसी को बेकरार भागती हुई माँ। जब धूल के गुबार आकाश को छूते हैं, कितना सुंदर मंज़र होता है! वो साँझ की ख़ूबसूरती होती है, जो जताती है कि छोटी-सी ज़िंदगी भी कितनी ख़ूबसूरत हो सकती है।"

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की सत्रहवीं कड़ी

विवाह के बाद के इतने सालों में शिखा ने पहली बार समीर को इतने क्रोध में देखा। उनके बोलने से लग रहा था कि जल्द से जल्द बहू-बेटे घर से चले जाएँ।सार्थक के ऐसा क़दम उठाने से समीर बहुत आहत हुए थे।