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सत्यशील राम त्रिपाठी के गीत

सत्यशील राम त्रिपाठी के गीत

बड़े सवेरे घर बुहार चमकाती कोना-कोना,
लीप-पोतकर कर देती हैं घर का रूप सलोना।
मेंहदी रची हथेली से जब रचती हैं रंगोली,
लगता होली खेल गईं हैं शुभ किरणों की टोली।


गीत- 01

हम जंगल के फूल,
हमें खिलकर मुरझाना आया।

किसी वनपरी ने देखा ही,
नहीं स्नेह नज़रों से।
हम वंचित ही रहे सदा,
वनदेवी के गज़रों से।
बनकर रहे बबूल,
किसी ने हमें नहीं दुलराया।

पहला परिचय हुआ शेर के,
खून सने पंजों से।
गंध बाँट हम पूरे जंगल,
रहे भीखमंगों से।
धँसे स्वयं के शूल,
कि हमने कुछ भी नहीं कमाया।

हमें तोड़कर रहे मसलते,
सारी उम्र शिकारी।
अंत समय में हम टूटे,
महकाकर उनकी आरी।
रहा समय प्रतिकूल,
मगर हमने जंगल महकाया।

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गीत- 02

नदी बनी माँ, नौका बहनें
बादल बने पिता।
खुद तपकर सुख-शांति बाँटकर
पीपल बने पिता।।

गुड्डा-गुड़िया नहीं किंतु
विपदाएँ बनी सहेली।
बस्ते वाली जगह बालपन में
पीड़ा ने ले ली।
ठोकर खाकर गिरे लुढ़ककर,
बोतल बने पिता।।

रोटी-कपडे़ की तलाश में,
भटके गली-गली।
वक्त गिराता रहा उन्हीं पर,
बे-मौसम बिजली।
इधर-उधर अपमानित होकर,
पागल बने पिता।।

जब तक घर में रहे खुशी की,
तब तक धाक रही।
आज खुशी घर आने का ही,
रस्ता ताक रही।
घर के दुर्ग, स्वास्तिक, पगड़ी,
साँकल बने पिता।।

मनके टूटे घर के तब से,
मौन लगे रहने।
अपनी एकाकी दुनिया की,
धारा में बहने।
काँटे थे, विष थे, मरकर,
गंगाजल बने पिता।।

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गीत- 03

लिपे-पुते आँगन में होतीं तुलसी-चौरा-सी,
शिव के संग चली जाती हैं बहनें गौरा-सी।

बड़े सवेरे घर बुहार चमकाती कोना-कोना,
लीप-पोतकर कर देती हैं घर का रूप सलोना।
मेंहदी रची हथेली से जब रचती हैं रंगोली,
लगता होली खेल गईं हैं शुभ किरणों की टोली।
शगुन-संदेशा बाँटा करती सोनचिरैया-सी,
स्नेह-सुधा बरसाती सब पे सत्ती-मैया-सी।।

रही अभावों में तिस पर विपदाएँ बनीं सहेली,
टूटे सपने, छूटे संगी-साथी हुईं अकेली।
बचपन की तितली यौवन के स्वप्न लिए पाँखों में,
लाखों में थी एक मगर खो गई कहीं लाखों में।
पग-पग देती अग्नि परीक्षा माता सीता-सी,
लगे लांछनों से बचती हैं परम-पुनीता-सी।।

बहनें जन्मीं तो घर आकर पुरखे शगुन विचारें,
पूजा होगी यही सोच हर्षित होती दीवारें।
बहनें जहाँ गईं लेकर शुभ रस्म-रिवाज घरों के,
वहाँ-वहाँ पर नाम किया है गाँव, नगर, पितरों के।
इतना कुछ अच्छा होने पर बँधतीं गैया-सी,
कभी कैद हो जाती पिंजरे में गौरैया-सी।।

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गीत- 04

अम्मा तू दूर क्या हुई,
गाँव की मिठास खो गई।

खो गई है चूल्हे की गोल-गोल रोटी,
प्यार से न काटे कोई गाल पे चिकोटी।
सूना-उदास पड़ा तुलसी का चौरा,
कोई नहीं देता है कुत्ते को कौरा।
अम्मा तू दूर क्या हुई,
प्रेम-सिक्त प्यास खो गई।।

जाने किसने चलवा दी रिश्तों पे गोली,
खुशियों के घर उतरी मातम की डोली।
जिस घर में आती थीं सैकड़ों सहेलियाँ,
शोकगीत गाती उसी घर में बिल्लियाँ।
अम्मा तू दूर क्या हुई,
घर की उजास खो गई।।

बात-बात में तेरी निर्जला मनौती,
कोई न विचारता है शुभ की शगुनौटी।
लोगों ने ओढ़ लिया ढोंग का मुखौटा,
याद आता है माँ वो करधनी कजरौटा।
अम्मा तू दूर क्या हुई,
आँचली हुमास खो गई।।

सबको तू जोड़ती थी नेह की डोर से,
तीज-त्योहार में तू खटती थी भोर से।
सूना है कोंइछा तुम्हारी ही याद में,
ज़िक्र है तुम्हारा ही हर एक संवाद में।
अम्मा तू दूर क्या हुई,
संस्कृति-सुवास खो गई।।

आम की अमावट, खटाई गुम हो गई,
सिरका, अचार, घी, मलाई गुम हो गई।
रिश्तों को बाँधती थी प्रेम पगी चिट्ठी,
याद आती हैं तेरी बातें खटमिट्ठी।
अम्मा तू दूर क्या हुई,
पीढ़ियों की साँस खो गई।।

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गीत- 05

गीत मेरे!
हर सवेरे,
रोशनी के गीत गाना।
विश्व ज्योतिर्मय बनाना।।

जीतने या हारने की बात छोड़ो,
मन व तन से जूझते रहना ज़रूरी।
जीतने का अर्थ आगे जूझना है,
हारने का अर्थ तैयारी अधूरी।

गीत मेरे!
हर सवेरे,
प्रेरणा के गीत गाना।
विश्व उर्जामय बनाना।।

नम्रता से बात कहना बात सुनना,
नम्रता विष को अमर-अमृत बनाती।
मोहिनी मुस्कान मुखड़े पर सजी हो,
और भाषा-माधुरी जग को लुभाती।

गीत मेरे!
हर सवेरे,
अर्चना के गीत गाना।
विश्व वंदनमय बनाना।।

हर समय यह चाहना खुद और जग को,
दे सको सुख-शांति के पल हर सवेरे।
सूर्य से सम्बंध अच्छा हो न हो पर,
देखकर अंधियार ना आँखें तरेरे।

गीत मेरे!
हर सवेरे,
शांति-सुख के गीत गाना।
विश्व को सुखमय बनाना।।

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रचनाकार परिचय

सत्यशील राम त्रिपाठी

ईमेल : satysheel441@gmail.com

निवास : गोरखपुर (उत्तरप्रदेश)

जन्मतिथि- 08 फरवरी, 2000
जन्मस्थान- रुद्रपुर (उत्तरप्रदेश)
शिक्षा- गोरखपुर विश्वविद्यालय से परास्नातक
प्रकाशन- देश की विभिन्न पत्रिकाओं में दोहे, गीत एवं ग़ज़लों का प्रकाशन
सम्प्रति- गोरखपुर विश्वविद्यालय से बीएड में अध्ययनरत
निवास- ग्राम- रुद्रपुर, पोस्ट- खजनी, ज़िला- गोरखपुर (उत्तरप्रदेश)- 273212
मोबाइल- 6386578871