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जनवरी 2026 के अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

माहेश्वर तिवारी के गीत

माहेश्वर तिवारी के गीत

अपने गीतों की गुणवत्ता में माहेश्वर तिवारी नितान्त अलग और मौलिक हैं। अपने समय के यथार्थ को चित्रित करने का उनका अपना अंदाज़ रहा। भाषाई सहजता, आँचलिकता और प्राकृतिक बिम्ब उनके गीतों का मज़बूत पक्ष हैं। प्रकृति उनके गीतों में कुछ अलहदे अंदाज़ में उतरती है। जिस तरह वे अपने गीतों में प्रेम और प्रकृति की जुगलबंदी में भाषाई अलंकरण को बहुत ही परिष्कृत रचनात्मकता का हिस्सा बनाते हैं, वह सम्मोहित करता है। बिम्ब और व्यंजना के प्रयोग में यदि कहीं भी असंतुलन हो तो वह गीत अपनी नाज़ुकी और संप्रेषणीयता से मुँह फेर बैठता है। किन्तु माहेश्वर तिवारी के नवगीतों में ऐसी असंगतियों की लगभग अनुपस्थिति है। प्रेम के अनगिन गीत रचने पर भी उन्हें सिर्फ प्रेम का कवि कहना असंगत होगा क्योंकि उनके नवगीत प्रेम का एक विराट फ़लक तो रचते ही हैं किन्तु अपने समय, जीवन, परिवार, समाज एवं सत्ता की प्रमुख समस्याओं और विसंगतियों को बहुत गम्भीरता और लेखकीय दायित्व के साथ स्पर्श करते हुए माहेश्वर जी के नवगीतों में भाषा के लालित्य और कहन पर बहुत कुछ कहने के बाद कुछ न कुछ शेष रह जाने की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी।

- अनामिका सिंह


1.

चीख़ बनते जा रहे
हम सब खदानों की,
हो गये हैं शोक-धुन,
बजते पियानो की।

कल तलक सुनते रहे जो,
आज बहरे हैं।
आँसुओं के बोल जिनके,
पास ठहरे हैं।
ज़िंदगी अपनी हुई है,
मैल कानों की।

देखते जब शब्द के,
बारीक छिलके खोल।
देश लगता रह गया,
बनकर महज भूगोल।
एक साजिश है खुली,
ऊँचे मकानों की।

********


2.

आसपास
जंगली हवाएँ हैं,
मैं हूँ।

पोर-पोर
जलती समिधाएँ हैं,
मैं हूँ।

आड़े-तिरछे
लगाव
बनते आते, स्वभाव
सिर धुनती
होंठ की ऋचाएँ हैं,
मैं हूँ।

अगले घुटने
मोड़े
झाग उगलते
घोड़े
जबड़ों में
कसती वल्गाएँ हैं,
मैं हूँ।

********


3.

हम पसरती आग में जलते शहर हैं

एक बिल्ली
रात भर
चक्कर लगाती है,
और दहशत
जिस्म सारा
नोंच जाती है।

हम झुलसते हुए
बारूदी सुरंगों के सफ़र हैं।

कल उगेंगे
फूल बनकर हम
ज़मीनों में,
सोच को तब्दील करते
फिर यकीनों में।

आज तो
ज्वालामुखी पर थरथराते हुए घर हैं।

********


4.

छोड़ आए हम अजानी
घाटियों में,
प्यार की शीतल हिमानी छाँह!

हँसी के झरने,
नदी की गति,
वनस्पति का
हरापन,
ढूँढ़ता है फिर
शहर-दर-शहर
यह भटका हुआ मन।

छोड़ आए हम अजानी
घाटियों में,
धार की चंचल सयानी छाँह!

ऋचाओं से गूँजती
अन्तर्कथाएँ
डबडबाई आस्तिक ध्वनियाँ,
कहाँ ले जाएँ
चिटकते हुए मनके
सर्प के फन में
पड़ी मणियाँ।

छोड़ आए हम पुरानी
घाटियों में,
काँपते-से पल, विदा की बाँह!

********


5.

उँगलियों से कभी
हल्का-सा छुएँ भी तो
झील का ठहरा हुआ जल
काँप जाता है।

मछलियाँ बेचैन हो उठतीं
देखते ही हाथ की परछाइयाँ,
एक कंकड़ फेंक कर देखो
काँप उठती हैं सभी गहराइयाँ।
और उस पल झुका कंधों पर क्षितिज के
हर लहर के साथ
बादल काँप जाता है।

जानते हैं हम
जब शुरू होता कभी
कँपकँपाहट से भरा यह गन्दुमी बिखराव,
टूट जाता है अचानक बे-तरह
एक झिल्ली की तरह पहना हुआ ठहराव।
जिस तरह ख़ूंख़ार
आहट से सहमकर
सरसराहट भरा जंगल काँप जाता है।

********


6.

याद तुम्हारी जैसे कोई
कंचन-कलश भरे,
जैसे कोई किरन अकेली
पर्वत पार करे।

लौट रही गायों के
संग-संग
याद तुम्हारी आती,
और धूल के
संग-संग
मेरे माथे को छू जाती।
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे,
जैसे कोई हंस अकेला
आँगन में उतरे।

जब इकला कपोत का
जोड़ा
कंगनी पर आ जाए,
दूर चिनारों के
वन से
कोई वंशी स्वर आए।
सो जाता सूखी टहनी पर
अपने अधर धरे,
लगता जैसे रीते घट से
कोई प्यास हरे।

********


7.

एक तुम्हारा होना
क्या से क्या कर देता है,
बे-ज़ुबान छत दीवारों को
घर कर देता है।

ख़ाली शब्दों में
आता है
ऐसे अर्थ पिरोना,
गीत बन गया-सा
लगता है
घर का कोना-कोना।

एक तुम्हारा होना
सपनों को स्वर देता है।

आरोहों-अवरोहों
से
समझाने लगती हैं,
तुमसे जुड़ कर
चीज़ें भी
बतियाने लगती हैं।

एक तुम्हारा होना
अपनापन भर देता है।

********


8.

आओ हम धूप-वॄक्ष काटें,
इधर-उधर हलकापन बाँटें।

अमलतास गहराकर फूले
हवा नीमगाछों पर झूले,
चुप हैं गाँव, नगर, आदमी
हमको, तुमको, सबको भूले।

हर तरफ़ घिरी-घिरी उदासी
आओ हम मिल-जुल कर छाँटें।

परछाईं आकर के सट गई
एक और गोपनता छँट गई,
हल्दी के रँग-भरे कटोरे-
किरन फिर इधर-उधर उलट गई।

यह पीलेपन की गहराई
लाल-लाल हाथों से पाटें।

आओ हम धूप-वृक्ष काटें।

********


9.

कंगूरों में
कैद उजाला,
बाहर पहरे हैं।

आँधी के
हाथों में पत्ते
हुए फटे
रूमाल,
आसमान से
गर्म तेल-सा
टपका नया सवाल।

झुलसी हुई
चमड़ियाँ पहने
सारे चेहरे हैं।

सारा दर्द
बन रहा
केवल नारों का
अनुवाद,
कोई अर्थ
नहीं देते हैं
आत्मीय संवाद।

हर जुलूस में
शामिल केवल
गूँगे-बहरे हैं।

********


10.

धान उगे
खेतों की
खुरदुरी हथेली पर,
पत्ता-पत्ता जैसे
सोने की खान उगे
धान उगे।

कल उनको
दूध से भरेगी
क्वार की
पकी उजली धूप,
कानों के फूलदार
झब्बों-सी
झुकी हुई
बालें पहने होंगी रूप।

उकठेंगे
आँगन-ओसवारे
सूनसान उगे।
धान उगे।

डालों से
उड़-उड़ कर आएँगे
हरियल पाँखों
वाले तोते,
चौंक कर
उठेगा सारा बंजर
टाँग पसारे सोते-सोते।

लगता है
खेतों के रोयें फूटे
उनके प्रान उगे।
धान उगे।

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वसंत जमशेदपुरी

29 January 2026

गहराई तक डूब कर लिखे गए गीत

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रचनाकार परिचय

माहेश्वर तिवारी

ईमेल : maheshwarjee@gmail.com

निवास : संतकबीर नगर

संक्षिप्त जीवन परिचय ।।

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नाम : माहेश्वर तिवारी ।

जन्मतिथि एवं स्थान : 22, जुलाई, 1939 ई0। ग्राम-मलौली, संतकबीर नगर, जिला बस्ती [उ.प्र.]

 

पिता : स्व. श्री श्यामबिहारी तिवारी ।

माता : स्व. श्रीमती चन्द्रावती तिवारी l

 

प्रकाशित कृतियाँ : ‘हरसिंगार कोई तो हो’ [नवगीत संग्रह] ‘नदी का अकेलापन’ [नवगीत संग्रह] ‘सच की कोई शर्त नहीं’ [नवगीत संग्रह] ‘फूल आए हैं कनेरों में’ [नवगीत-संग्रह] लगभग आधा दर्जन नवगीत-संग्रह एवं एक निबंध-संग्रह प्रकाशनाधीन।

 

साहित्येतर : हिन्दी तथा उर्दू की लगभग 120 काव्य-कृतियों की भूमिकाओं का लेखन और कुछ रचनाओं का अंग्रेज़ी और फ्रेंच में अनुवाद। देश के कई विश्वविद्यालयों के स्नातक तथा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में रचनाएं सम्मिलित। 

 

प्रकाशन : आज, दैनिक जागरण, सन्मार्ग, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, नई दुनिया, हिन्दुस्तान, कल्पना, ज्ञानोदय, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, नवनीत, लहर, उत्तरार्द्ध, पहल, शब्द, उत्कर्ष, नया प्रतीक आदि। समवेत संग्रहों में : ‘पाँच जोड़ बाँसुरी’ [ज्ञानपीठ] ‘एक सप्तक और’ [मिलन मंदिर कलकत्ता] ‘श्रेष्ठ हिन्दी गीत संचयन’ [साहित्य अकादमी] ‘नवगीत दशक-2’ नवगीत अर्द्धशती [पराग प्रकाशन, दिल्ली] ‘यात्रा में साथ-साथ’ गीतायन [नवनीत प्रकाशन, वाराणसी] सप्तपदी-5 [अयन प्रकाशन, दिल्ली] शताधिक गीत-संकलनों में गीतों का प्रकाशन।

 

प्रसारण : दूरदर्शन केन्द्र दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, पटना, रांची, जालंधर, अहमदाबाद आदि तथा आकाशवाणी केन्द्र इलाहाबाद, दिल्ली, छतरपुर, लखनऊ, भोपाल, पटना, रांची, जालंधर, रायपुर, नजीबाबाद, बरेली, रामपुर, पोर्टब्लेयर आदि से अनेकबार कविता कार्यक्रम प्रसारित। 1984 से 2005 के मध्य 2 बार सर्वभाषा कविसम्मेलन में गुजराती व उड़िया में अनुवाद। आकाशवाणी के केन्द्रीय निदेशालय द्वारा 3 घंटे के लम्बे साक्षात्कार व काव्य-पाठ की आर्काइव के लिए रिकार्डिंग।

 

विश्ष्टि सम्मान : उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 11 लाख रुपये का ‘यशभारती सम्मान’, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से ‘साहित्य भूषण’ तथा नवगीत-संग्रह ‘हरसिंगार कोई तो हो’ पुरस्कृत, विष्णु प्रभाकर स्मृति सम्मान [बरेली] हिन्दी सेवा सम्मान [रोटरी इंटरनेशनल] ‘वीरेन्द्र मिश्र सम्मान’ [हरसूद म.प्र.[ एवं अनुभव प्रकाशन [ग़ाज़ियाबाद] पुनर्नवा साहित्य सेवा सम्मान [फैज़ाबाद] समन्वय सृजन सम्मान [सहारनपुर] कविश्री [भारतीय साहित्य सम्मेलन प्रयाग] अखिल भारतीय परिवार सम्मान [मुम्बई] सुधाबिन्दु स्मृति सम्मान गोरखपुर] डा.शम्भुनाथ सिंह नवगीत सम्मान [वाराणसी] संस्था-मंथन से ‘श्रेष्ठ नवगीतकार सम्मान’, सिन्दूर मैमोरियल ट्रस्ट कानपुर द्वारा ‘रामस्वरूप सिन्दूर नवगीत सम्मान’ सहित देश की शताधिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत और सम्मानित। 

 

सम्प्रति : लगभग दो दशक तक प्राध्यापन तथा पत्रकारिता से जुड़े रहने के पश्चात, स्वतंत्र लेखन।

 

स्थायी पता : ‘हरसिंगार’- ब/म-48, नवीन नगर, काँठ रोड, मुरादाबाद-244-001 ईमेल -maheshwarjee@gmail.com

मोबाइल - 09456689998