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राम शंकर वर्मा के गीत

राम शंकर वर्मा के गीत

गीत कि जिनमें भीना-भीना
हलवाहे का चुवे पसीना
ढूँढ़े जो गारे तसले में
अपना काशी और मदीना
मेड़ों पर घसियारिन जिसमें
टेर रही हो मीत
भारती!
गाऊॅं ऐसे गीत

1.

जिनमें छवि उभरे भारत की
छलक उठे संगीत
भारती!
गाऊॅं ऐसे गीत

गीत कि जिनसे पत्थर पिघले
कोई किरन सूरज से निकले
अधियारों से बाँह खोलकर
चौराहों पर गले आ मिले
ईंट-ईंट हिल उठे नींव की
गिरे बैर की भीत

गीत कि जिनमें रंग भरे हों
श्वेत टोपियाँ शिखर धरे हों
केसर, चंदन, लौंग, सुपारी
लिये खेत बागान हरे हों
नील उदधि पर लिखी जा रही
हो माँझी की जीत

गीत कि जिनमें भीना-भीना
हलवाहे का चुवे पसीना
ढूँढ़े जो गारे तसले में
अपना काशी और मदीना
मेड़ों पर घसियारिन जिसमें
टेर रही हो मीत

गीत कि जिनमें कुशलक्षेम के
अपने-अपने धरम-नेम के
कोटि-कोटि कण्ठों से निकलें
गीत-तराने देशप्रेम के
संगीनों पर लिखें सिपाही
बलिदानों की रीत

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2.

ज्ञान के जगमग दीप जलें

अमानिशा की दुनिया उजड़े
तम झाँके बगलें
ज्ञान के जगमग दीप जलें

गाँव-गैल, वन-उपवन, पनघट
दीप छटा बिखरे
नगर-चौक, घर-हाट, सरित-तट
मंगल रूप धरे
मन-मानस के गलियारे में
मोद करे चुहलें

संसृति के श्रीमुख पर हरियल
घूंघट पट लहरे
दीन-जनों की पर्ण कुटी में
सुख समृद्धि ठहरे
सदियों से सूने नयनों में
सुखप्रद सपन पलें

जाति-वर्ण, स्वर, लिंग द्वेष का
तिल-तिल तिमिर जरे
समता, विश्च बंधुता, करूणा
आँगन प्रति उतरे
झिलमिल हों अन्तर्मन हिलमिल
जनगण संग चलें

*********


3.

सरसों करतल पर बोता है
साहब तो साहब होता है

साहब ने पोथी पढ़-लिख कर
विद्या-बुधि के झंडे गाडे़
एक कमाऊ कुर्सी खातिर
जोग-जुगत के पढ़े पहाड़े
ऊपर सूटकेस पहुँचाकर
साहब विजयी हुए अखाड़े
अब बहती गंगा में निश-दिन
साहब का लगता गोता है

दफ्तर में साहब के मुँह पर
रहता सदा जेठ का मौसम
पर आमद ठेकेदारों की
साहब से बिछवाती जाजम
बंद किवाड़ों के अंदर से
खुसुर-पुसर की बजती सरगम
साहब ने सेक्शन-सेक्शन में
पाल रखा मिट्ठू तोता है

आना-जाना काम समय से
ड्यूटी के पाबंद फरीदे
माथा-पच्ची फाइल नोटिंग
जी०ओ० पढ़-पढ़ फूटे दीदे
मिट्टी के माधो ने प्रभु की
नहीं शान में गढ़े कसीदे
बैठे मार कुल्हाड़ी पैरों
अब पछताये क्या होता है!

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4.

बावरे मन एक से दिन
नहीं होते हैं सदा
तू मान ले कहना
कि तेरा व्यर्थ है दहना

आज है हेमंत यदि बलवंत
द्रुम विस्मित खड़े
कोख जाये पात
हो निस्पन्द
भूतल पर पड़े
आयेंगे ध्रुव सत्य
ऋतु उल्लास के दिन
छाएगा छतनार पल्लव
ओट मंजरियों
कोई रसबात होगी
गायेगा सोहर
हुए भिनसार कलरव
निर्वसन सुख पहन लेंगे
फिर पटंबर और गहना

है असम्भव
दृष्टि के उस पार पढ़ना
या कि सुलझाना
समय के गर्भ की कोई पहेली
व्यर्थ इस पर शोक
थी कल बंद मुट्ठी
रिक्त कर दी दैव ने
सहसा हथेली
तू सरोवर में
कमलदल के सदृश
निर्लिप्त रहना

*********


5.

सुनो रूकैया, सलमा, सीता
जुम्मन, झब्बा, झूरी
काम-काज के साथ-साथ
है पढ़ना बहुत ज़रूरी

पढ़ो कि पण्डित पढ़ा सके न
कोई मंतर झूठा
कोरे कागज पर काजी न
लगवा सके अंगूठा
पढ़ो कि खुद पढ़ सको किताबें
सीखो दुनियादारी
तुम क्यों नंगे पैर हवा पर
वे क्यों करें सवारी
पढ़ो कि जान सको माथे पर
किसने लिखी मजूरी

पढ़ो कि पढ़ने से कट जाती
पैरों की जंजीरें
भूख-गरीबी से निजात की
मिल जाती तदबीरें
पढ़ो कि पढ़ने से हट जाते
हैं दिमाग़ के ताले
बुर्के घूँघट के बाहर के
दिखते नये उजाले
पढ़ो कि नाप सको पंखों से
आसमान की दूरी

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रचनाकार परिचय

रामशंकर वर्मा

ईमेल : rsverma8362@gmail.com

निवास : लखनऊ (उत्तरप्रदेश)

जन्मस्थान- रानी जयदेई खेड़ा, उन्नाव (उत्तरप्रदेश)
जन्मतिथि- 8 मार्च, 1962
शिक्षा- लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक
सम्प्रति- सिंचाई विभाग, उत्तर प्रदेश से सेवानिवृत्त
लेखन विधाएँ- दोहे, कुण्डलियॉं, गीत, नवगीत, बाल कविता, अवधी कविता आदि छान्दसिक विधाएँ। गद्य में समीक्षा, ललित निबंध, आलेख आदि।
प्रकाशन- ‘चार दिन फागुन के’ (गीत-नवगीत संग्रह), ‘मुठभेड़ समय से’ तथा अवधी में ‘अनँदी अनँद करौ यहु गॉंव’ कुण्डलिया संग्रह
गीत-नवगीत, दोहा, कुण्डलिया के अनेक समवेत संकलनों एवं देश की अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में रचनाओं का प्रकाशन। हिंदी की अंतरजाल काव्य पत्रिका अनुभूति, नवगीत की पाठशाला, अनहद कृति, पूर्वाभास, हिंदवी पर भी कविताएँ प्रकाशित। दूरदर्शन एवं आकाशवाणी केंद्र, लखनऊ द्वारा रचनाओं का प्रसारण।
पुरस्कार/ सम्मान- उ०प्र० सरकार द्वारा 'चार दिन फागुन के' पर डॉ० हरिवंशराय बच्चन पुरस्कार से पुरस्कृत
निवास- 592 झ/ 458, रथीन्द्र नगर, तेलीबाग, लखनऊ (उत्तरप्रदेश)- 226029
मोबाइल- 9415754892