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नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा : नवीन भाव-बोध की सरस कविताएँ- सुरेश चन्द्र 'सर्वहारा'

नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा : नवीन भाव-बोध की सरस कविताएँ- सुरेश चन्द्र 'सर्वहारा'

समीक्ष्य पुस्तक- नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा
विधा- बाल कविता
रचनाकार- योगेन्द्र प्रताप मौर्य
प्रकाशक- फ्लाइड्रीम्स पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली
संस्करण- प्रथम, 2025
मूल्य- ₹160/-
पृष्ठ संख्या- 47

लीक से हटकर आधुनिक भाव-बोध की इकतीस कविताओं का यह संकलन कवि के मौलिक सोच की उपज है। ये कविताएँ पारम्परिक विषयों के स्थान पर आधुनिक जीवन-शैली से सम्बन्धित नवीन विषयों को प्राथमिकता देती है।

अनेक पुरस्कारों से सम्मानित एवं विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, ई-पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशित उत्तरप्रदेश के प्रतिष्ठित कवि श्री योगेन्द्र प्रताप मौर्य के अब तक पाँच काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- 'सूरज चाचा हाय-हाय' (बालकविता संग्रह), 'चुप्पियों को तोड़ते हैं' (नवगीत संग्रह), 'पाइप से पौधे नहलाएँ' (बाल कविता संग्रह), 'गीत हौसले हैं' (नवगीत संग्रह) तथा 'नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा' (बाल कविता संग्रह)।

बाल साहित्य और प्रौढ़ साहित्य में समान रूप से सृजनरत श्री योगेन्द्र प्रताप मौर्य, वर्तमान में सहायक अध्यापक, बेसिक शिक्षा परिषद, जौनपुर में कार्यरत हैं। मूल रूप से नवगीतकार के रूप में जाने जाने वाले श्री योगेन्द्र प्रताप मौर्य बाल-मनोविज्ञान के भी अच्छे जानकार हैं। उनका यही रूप उनकी पाँचवी काव्य-कृति 'नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा' में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। लीक से हटकर आधुनिक भाव-बोध की इकतीस कविताओं का यह संकलन कवि के मौलिक सोच की उपज है। ये कविताएँ पारम्परिक विषयों के स्थान पर आधुनिक जीवन-शैली से सम्बन्धित नवीन विषयों को प्राथमिकता देती है। उदाहरण के तौर पर आजकल के बच्चे टीवी, टेबलेट, लेपटॉप और मोबाइल जैसे इलेक्ट्रॉनिक साधनों की आभासी दुनिया में इतने व्यस्त हैं कि वे बाहरी दुनिया से लगभग कटे हुए- से रहने लगे हैं। उन्हें घर से बाहर जाकर खेलने और लोगों से मिलने का समय नहीं है। मोबाइल पर अधिक व्यस्त रहने से बच्चे तरह-तरह की शारीरिक और मानसिक व्याधियों के शिकार हो रहे हैं। 'रील बनाते हैं' कविता में कवि ने आधुनिक जीवन की इसी समस्या पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है-

टैबलेट-मोबाइल पर हम
पढ़ते-लिखते हैं
नहीं खेल के मैदानों में
हम सब दिखते हैं
गेम खेलते और वीडियो
रील बनाते हैं
फेसबुक-इंस्टा-ट्विटर पर हम
लाइव आते हैं
इन चीजों से बुरी तरह से
आज घिरे हैं हम
दादा कहते ये गड्ढे हैं
जहाँ गिरे हैं हम

तरह-तरह की बीमारी
डाॅक्टर बतलाते हैं
एक नहीं दो-तीन गोलियाँ
साथ खिलाते हैं
अपनी पीढ़ी आज हमारी
बात कहाँ माने
आभासी दुनिया को केवल
ये अपना जाने

'नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा' इस पुस्तक की शीर्षक कविता है। कविता में एक बालक जल्दी नींद आने से परेशान है, क्योंकि इससे उसकी पढ़ाई ठीक प्रकार से नहीं हो पाती है। यह कविता बच्चों में पढ़ाई के प्रति लगाव, उत्तरदायित्व की भावना और लक्ष्य प्राप्ति के लिए कष्ट-सहिष्णु होने की सीख देती है। कवि सीधे-सीधे बच्चों को उपदेश नहीं देता बल्कि एक बच्चे की दुविधा के माध्यम से आत्मानुशासन का पाठ पढ़ाते हुए कहता है-

नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा
तुमने सारा काम बिगाड़ा
आ जाती हो रोज रात में
कर पाऊँ कब याद पहाड़ा

देर रात तक चुन्नू खेले
उसके पास न जाती हो तुम
आखिर पास हमारे आकर
झट से मुझे सुलाती हो तुम

आज रात मत जल्दी आना
मैं देखूँगा चंदा प्यारा
तारों की जगमग-जगमग को
आसमान का खुला नज़ारा

फिर बैठूँगा पढ़ने लेकर
काॅपी-कलम-किताबें-पेंसिल
कर लूँगा मैं याद पहाड़े
होगी यों थोड़ी-सी मुश्किल

थक जाऊँ जब पढ़ते-पढ़ते
तब आकर तुम मुझे सुलाना
नहीं तुम्हें फिर मैं रोकूँगा
बातें मेरी नहीं भुलाना

घर सभी प्राणियों के लिए जीवन की मूलभूत आवश्यकता होती है। घर के बिना किसी भी व्यक्ति का जीवन असुरक्षित, असहाय, अव्यवस्थित और असुविधाओं से भरा हो जाता है। जैसे मानव के लिए मकान आवश्यक है, वैसे ही कई जीवों के रहने के लिए पेड़ों की आवश्यकता होती है। वृक्षों के काटने से कितने ही पशु-पक्षियों के ये आवास नष्ट हो जाते हैं और उनका जीवन खतरे में पड़ जाता है। 'यदि उजड़ा घर पाएँ' कविता में जहाँ कवि पेड़ों के संरक्षण का संदेश देता है, वहीं मानव से किसी का घर नहीं उजाड़ने का भी आग्रह करते हुए कहता है-

कहीं गया था कालू बन्दर
लेकिन जब वह आया
जिस पर रहा बसेरा उसका
पेड़ नहीं वह पाया

वही पेड़ क्यों और पेड़ भी
नहीं नज़र में आए
नहीं कहीं थे साथी उसके
कहाँ गए घबराए

सिर्फ खड़ी थीं कटर मशीनें
चिल्लाहट थी उनकी
इसी शोर में कहीं खो गई
पीड़ा उसके मन की

इधर-उधर वह ताका- झाँका
आँसू खूब बहाए
किन्तु आदमी नहीं पसीजे
उसको मार भगाए

सोचो घर से बाहर जाएँ
फिर जब वापस आएँ
कितनी पीड़ा हमको होगी
यदि उजड़ा घर पाएँ

किसी भी सृजन के लिए समय और श्रम की आवश्यकता होती है। 'तब पकते गेहूँ के दाने' कविता में कवि गेहूँ की फसल के पकने की दीर्घ प्रक्रिया के माध्यम से बताता है कि बिना कष्ट सहे, किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त नहीं होती है। लक्ष्य-प्राप्ति के लिए सुख का त्याग करना पड़ता है। कवि बच्चों में सहनशीलता, धीरज, मेहनत, लगन और पारस्परिक सहयोग के साथ आगे बढ़ने का आह्वान करते हुए कहता है-

मिट्टी भीतर बीज दबाती
बस थोड़ा-सा समय बिताती

अंकुर एक निकलता है तब
आँखें अपनी मलता है तब

समय-समय पर पानी पीता
मौसम के सुख-दुःख को जीता

धीरे-धीरे ऊपर उठता
चिड़ियों से भी बातें करता

आखिर उसमें बाली आती
बाली भी थोड़ी इतराती

लगते हैं जब दिन गरमाने
तब पकते गेहूँ के दाने

उक्त कतिपय उदाहरणों से स्पष्ट है कि कवि ने नवीन भाव-बोध एवं सरस भाषा शैली में आधुनिक सन्दर्भों में बाल-मन को स्पर्श करने का प्रयास किया है। संग्रह की शेष रचनाओं में भी कथ्य और शिल्प की यही नवीनता दृष्टिगोचर होती है। 'मैं पंखे का भाई' कविता में कूलर को पंखे का भाई बताया गया है, जो पंखे की तरह ही गर्मी दूर भगाता है। 'टाॅमी और अजगर' कविता में टाॅमी कुत्ते का अजगर के प्रति प्रेम बताया गया है और कहा गया है कि यदि आदमी अच्छे होते तो अजगर भी टाॅमी के साथ रह लेता। 'झाड़ू भाई' कविता में साफ-सफाई करने वाले झाड़ू की उपयोगिता बताई गई है। 'काॅलोनी की सत्ता' कविता मधुमक्खियों के छत्ते की कलात्मकता को दर्शाती है। 'कंचे हँसते और हँसाते' कविता में बच्चों द्वारा कंचे की गोलियों से खेले जाने वाले खेल का आकर्षक चित्रण है। 'पेड़ नारियल पात हिलाता' कविता में नारियल के पेड़ और बया का सुन्दर संवाद है, जिसमें नारियल का पेड़ एक बया को अपने यहाँ घोंसला बनाने को आमंत्रित करता है। 'कुदरत ने रंग बनाया' कविता में बच्चे सोचते हैं कि अगर रंग नहीं होते तो वे होली कैसे खेलते। 'स्टेनलेस स्टील' कविता आज आम आदमी के जीवन में इस्पात की उपयोगिता बताती है। 'महँगे स्कूलों में' कविता खर्चीली शिक्षा पर चिंता व्यक्त करती है, जिसके कारण मजदूरों के बच्चों का तो निजी विद्यालयों में पढ़ना ही असम्भव हो गया है। 'तांडव खूब मचाया' कविता में गर्मी के कारण होने वाली परेशानियों से ऊबकर बरसात होने की कामना की गई है। 'शहरी बाबू' कविता में शहर की चकाचौंध से आकर्षित होकर एक ग्रामीण बालक भी शहरी बाबू बनना चाहता है। 'देती है संदेश बड़ा' कविता में कल्पना की गई है कि एक चिड़िया छत पर तिरंगा झंडा लेकर आई है और भारत के आत्मनिर्भर बनने पर प्रसन्नता व्यक्त कर रही है। 'चम्मच जी चमकीले' कविता खाना खाने में सहायक चम्मच-काँटों की रोचक जानकारी देती है। 'दीवाली हो' कविता, झुग्गी-झोपड़ियों के निर्धन बच्चों में भी दीपावली की खुशियों को बाँटने का संदेश देती है।'दादाजी की छड़ी कमाल' में वयोवृद्ध दादाजी की छड़ी के विषय में बताया गया है, जो छतरी, कुर्सी, टार्च बन जाती है और कोई छू ले तो जोर से चिल्लाने लगती है। 'बच्चे हुए अधीर' कविता में गर्मी की भीषणता से व्याकुल बच्चों का वर्णन किया गया है। कवि ने गर्मी के प्रकोप से बचने के लिए वृक्षों के संरक्षण का आग्रह किया है। 'महल और झोपड़ी' कविता के माध्यम से समाज में व्याप्त वर्ग-भेद जनित वैषम्य और आपस में ईर्ष्या के भाव को बताया गया है। यह कविता आपस में मिल-जुल कर रहने का संदेश देती है। 'पापा मेरा दम घुटता है' कविता में एक बच्चा महानगर में आवास के जगह की कमी और भीड़-भाड़ की वजह से फिर से अपने गाँव के घर जाने की इच्छा व्यक्त करता है। 'तरह-तरह की तस्वीरें हैं' कविता प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त तस्वीरों के माध्यम से बच्चों को प्रकृति के निकट रहने की सीख देती है। 'खूब घूमते दो दिन बीते' कविता में पढ़ाई और बड़ों की महत्त्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबे बच्चों को घर से बाहर नई-नई जगहों पर घुमाने की सलाह दी गई है, जिससे कि उनको पढ़ाई के तनाव से राहत मिल सके। 'राजू-रिमझिम' कविता में दो बच्चे राजू और रिमझिम हरी सब्जियाँ नहीं खाते, अतः हरी सब्जियाँ भी उनसे चिढ़ती हैं। कवि ने इस कविता में बच्चों के मन को समझने की बात कही है। 'बारिश बहुत लुभाती है' कविता में बरसात की ऋतु में बच्चों की मौज-मस्ती का सजीव चित्रण किया गया है। 'जी ललचाते हो' कविता में वर्षा ऋतु में बरसते और तरह-तरह की आकृतियाँ बनाते बादलों के प्रति बच्चों का प्रेम दर्शाया गया है। 'सबके बाल सँवारे' कविता में कंघों के बाल सँवारने के काम का उल्लेख किया गया है। कविता बच्चों को बिना हिम्मत हारे निरन्तर अपने काम में लगे रहने की सीख देती है। 'बैठा हूँ मैं टाॅयलेट में' कविता में बच्चों के पेट-दर्द का बहाना बनाकर स्कूल जाने से बचने का उल्लेख है। बाल मनोविज्ञान पर आधारित यह कविता हमारा ध्यान शिक्षा की बोझिलता की ओर आकर्षित करती है। 'आँसू आज बहाया' कविता, अधिक लाड़-प्यार पाकर मनमानी करने वाले बच्चे के बारे में बताती है, जो परीक्षा में कम अंक आने पर भी चिंता नहीं करता। 'चिड़िया आई रहने' कविता, बच्चों के मनभावन विषय चिड़िया से सम्बन्धित है। घर में चिड़िया के घोंसले हों तो सूनापन नहीं रहता। कविता पक्षियों और विशेष रूप से गौरैया को बचाने का आह्वान करती है।

'नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा' बाल कविता संग्रह अपने शीर्षक के अनुरूप ही नयापन और ताजगी लिए हुए है। सभी कविताओं के साथ दिए गए चित्र भी मौलिकता लिए हुए हैं। पुस्तक में एक अभिनव प्रयोग यह भी है कि बाएँ पृष्ठ पर कविता है और दाएँ पृष्ठ पर कुछ रेखाचित्र हैं, जिन पर बच्चों के लिए 'रंग भरो' भी लिखा हुआ है। ऐसा करके बच्चों की चित्रकला की रुचि को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया है। मुद्रण स्पष्ट और स्वच्छ है। आवरण शीर्षक के अनुरूप और आकर्षक है। इस संग्रह के प्रारम्भ में कोई भूमिका और आमुख नहीं है। सम्भवतः लेखक का अभिप्राय यह रहा हो कि पाठक पर अपनी ओर से कोई विचार नहीं थोपा जाए। वस्तुतः किसी भी कृति के सबसे अच्छे समीक्षक पाठक ही होते हैं। आधुनिक भावबोध की ये रचनाएँ पूरी तरह सुगठित और छंद की दृष्टि से परिशुद्ध हैं, जिनमें लय और तुकांत का समुचित निर्वाहन किया गया है। संगीतात्मकता इनका विशेष गुण है। बाल-मन में नई स्फूर्ति भरने वाले 'बाल कविता संग्रह 'नींद हुआ मैं तुमसे गुस्सा' के सृजन के लिए कविवर श्री योगेन्द्र प्रताप मौर्य जी को हार्दिक बधाई।

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रचनाकार परिचय

सुरेश चन्द्र 'सर्वहारा'

ईमेल : scsarwahara@gmail.com

निवास : कोटा (राजस्थान)

पता- म. नं.- 445, सेक्टर- 7, व्यायामशाला मार्ग, केशवपुरा ज़िला- कोटा (राज.)- 324009
मोबाइल- 9928539446