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प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की अठारहवीं कड़ी

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की अठारहवीं कड़ी

आज न जाने क्या हुआ प्रखर का हाथ अपने कंधे से हटाते समय शिखा उसका हाथ छोड़ नहीं पाई और उसे पकड़कर सुबकने लगी। शिखा को सुबकते हुए देखकर तेज़ चेस्ट पैन में भी समीर ने कहा- "सब ठीक हो जाएगा शिखा! हौसला रखो। इतनी जल्दी मरने वाला नहीं हूँ मैं।"

गुज़रते समय के साथ समीर और प्रखर की ख़ूब जमने लगी। दोनों कभी उसके यहाँ तो कभी शिखा के यहाँ बैठकर घंटों चैस खेलते या गपियाते। शिखा भी उन दोनों के साथ बैठकर उनकी बातों का आनंद लेने लगी थी। किस्से तो प्रखर के पास बहुत होते थे। उसका महकमा भी ऐसा था कि हर तरह के इंसान के साथ वास्ता पड़ता था। अब प्रखर को भी समीर-शिखा के जीवन से जुड़ी काफ़ी बातों का अंदाज़ा हो चुका था।

काफ़ी बार ऐसा हुआ जब तीनों साथ बैठे हुए थे तभी सार्थक या प्रणय का फोन आया। दोनों ही अपने-अपने बेटों की बातों को साझा करते। दोनों के बेटों के बात करने में ज़मीन-आसमान का फ़र्क था। प्रखर के बेटे का अपने पापा के साथ बहुत दोस्ताना व्यवहार था और सार्थक का अपने माँ-पापा के साथ कोई व्यवहार ही नहीं था। बस औपचारिकताएँ थीं।

समीर और शिखा को अपने शहर में शिफ्ट हुए अब दो साल गुज़र गये थे। प्रखर पिछले पाँच साल से यहीं था। उसकी लास्ट पोस्टिंग आगरा ही थी। जिस शहर में उसका जन्म, पढ़ाई और फिर इश्क़ हुआ। वह उस शहर को छोड़ना नहीं चाहता था। सच तो यह है कि यहाँ के तो गली-गली, चप्पे-चप्पे से तीनों ही ख़ूब वाकिफ़ थे। अब तो तीनों को एक जगह पर रहते हुए भी दो साल हो चुके थे।

यह शहर तीनों के दिलो-दिमाग़ में दिन-रात चलता था। इससे जुड़े किस्से-घटनाएँ उनके क्रिया-कलापों के साथ-साथ घूमते थे। अब ईश्वर ने भी उसी जगह पर जीवन के अंतिम पड़ाव को गुज़ारने के सारे सँजोग बैठा दिए थे। इससे बड़ी ख़ुशी एक आम इंसान के लिये और क्या हो सकती थी! कुल मिलाकर सोल मेट्स का एक ही कॉलोनी में न सिर्फ़ बसना, बल्कि आस-पड़ोस में ही रहना, ईश्वर का सोच-समझ कर बनाया हुआ बहुत ख़ूबसूरत इत्तिफ़ाक़ था।

बाक़ी पड़ोसियों के साथ भी उन तीनों के काफ़ी अच्छे संबंध बन गये थे। उनकी कॉलोनी में साठ से ऊपर के कई लोग अक्सर उसके पार्क में ही बनी हुई बेंचों पर शाम को बैठ जाते और घंटों गप्पों में गुज़ार देते। उम्र के इस पड़ाव में सभी का मिलना, अपनी-अपनी बातें साझा करना, एक-दूसरे के एकाकीपन को बाँटता था। सभी को जीवन के इस संध्याकाल में हर आती संध्या का इंतज़ार रहता, ताकि सब मिल सकें, बातचीत कर सकें।

प्रखर के पास मित्रों के साथ साझा करने के लिए बहुत कुछ ऐसा था, जो समाज व देश से जुड़ा था। न जाने कितने केसेज़ की फाइल्स उसके पास पहुँची, उनमें से जो भी टॉप सीक्रेट होता वह कभी नहीं बताता। जनरल विषयों पर ही सबके सामने अपने विचार और मत रखता।

हालाँकि कुछ संशय और जिज्ञासाएँ उन सबकी बातों में भी उठती थीं पर सब प्रखर के जॉब प्रोफाइल को भी जानते थे। प्रखर के बात पलटते ही लोग समझ भी जाते कि प्रखर अपनी नौकरी से जुड़ी नीतियों और नियमों की पालना ज़रूर करेगा। लोगों को उसका स्ट्रैट और ईमानदारी वाला व्यवहार बहुत अच्छे से समझ आ गया था।

कॉलोनी के अधिकतर लोग काफ़ी पढ़े-लिखे थे। लगभग सभी कहीं न कहीं अच्छी नौकरियों में थे। सभी के पास असंख्य बातों के विषय थे। कुल मिलाकर विषयों की विविधता सभी को बहुत ताज़ा महसूस करवाती थी। सभी शाम होने का इंतज़ार करते थे। लगभग रोज़ ही बीस-पच्चीस लोग पार्क में इक्कठा हो जाते थे। कई लोगों के जीवनसाथी जा चुके थे पर सब एक-दूसरे के लिए बहुत संवेदनशील थे। तभी किसी को साथ बैठकर गपियाने में कोई संकोच नहीं होता था।एक ही उम्र के लोगों में एक-दूसरे के लिए संवेदनाएं अक्सर बहुत परिचित-सी लगती थीं।

शहर के सभ्रांत लोगों की कॉलोनियों में से यह एक अच्छी कॉलोनी थी। जिन लोगों के बच्चे साथ थे, वे भी अपने माँ-बाऊजी को हर बात के लिए उत्साहित ही करते। बच्चों की भी प्राथमिकता उनके माँ-पापा की ख़ुशियों से जुड़ी थी। माँ-बाप का सकारात्मक रहना, उन्हें भी ऊर्जा देता था।

कोई भी किसी की घरेलू बातों में ज़्यादा दख़लंदाजी नहीं करता। सामान्य विषयों पर बात होती थी। किसी को कोई सलाह या मशवरा चाहिए होता तो आपस में साझा होता, नहीं तो सभी अपनी-अपनी दुनिया में मस्त थे। यही कोई पंद्रह-बीस परिवारों में बहुत अपनापा हो गया था। यह सब प्रखर के पहल करने से हुआ।सब लोग प्रखर को ख़ूब मान देते थे, क्योंकि वह इस कॉलोनी में काफ़ी समय से रह रहा था।

एक बार साठ ऊपर वालों ने मिलकर मूवी जाने का प्रोग्राम बनाया। सभी अपने-अपने जीवनसाथी के साथ मूवी देखने गये। जिनके जीवनसाथी प्रस्थान कर चुके थे, वे अकेले ही गये। बाद में सभी ने तय किया कि खाना भी बाहर ही खा लिया जाए तो पिक्चर हॉल के पास वाले रेस्ट्रोरेंट में सबने मिलकर खाना खाया। सहर्ष समय बिताया। सबके वहाँ से लौटने पर एक ही प्रतिक्रिया थी कि 'भई इस तरह के प्रोग्राम महीने में दो-तीन तो होने ही चाहिए।'

इस तरह के नए एक्सपेरिमेंट का सुझाव भी प्रखर का ही था। सच तो यह था कि प्रखर को तो बस किसी न किसी बहाने शिखा को देखना होता था। उसकी हर प्लानिंग शिखा को कुछ समय देख लेने और उसके साथ वक़्त गुज़ारने की रहती थी। अब वह कोई भी दिन ऐसे नहीं गुज़रने देना चाहता था, जब उसे शिखा दिखाई न दे। जितने घंटे शिखा साथ होती, प्रखर अपने जीने के लिए ऊर्जा इक्कठा कर लेता। दोनों के बीच मोबाइल पर मैसेज का आदान-प्रदान पिछले दो साल से बराबर चल रहा था। प्रखर जो मेसज समीर को भेजता, वही शिखा को भी भेज देता।

जब भी प्रखर को शिखा की कमी महसूस होती, किसी न किसी बहाने मिलने के तरीके खोज लेता। कहीं पर भी किसी की गरिमा ख़राब न हो इस बात का विशेष ध्यान रखता। प्रखर की इस इच्छा को पूरा करने में समीर का भी बहुत हाथ था क्योंकि समीर के साथ उसकी दोस्ती भी बहुत प्रगाढ़ हो चुकी थी। उम्र के इस पड़ाव पर सभी को किसी न किसी मौके पर एक-दूसरे की ज़रूरत पड़ती ही रहती थी। सभी की ज़िंदगी मिल-जुल कर चल रही थी।

रात के दो बजे थे। तभी प्रखर के मोबाइल की घंटी बजी। इतनी रात गये किसने फोन किया होगा अचानक! प्रखर घबरा गया था। वैसे भी प्रखर को बारह बजे तक तो नींद आई ही नहीं थी। काफ़ी देर तक वह कुछ न कुछ पढ़ता रहा था। रात को यूँ अचानक शिखा के फोन को आता हुआ देखकर प्रखर ने शीघ्र ही फोन उठाया। उधर से शिखा की घबराई हुई आवाज़ आई-

"प्रखर! प्लीज़ जल्दी आओ, समीर की तबियत ठीक नहीं लग रही। उसे साँस लेने में तकलीफ़ हो रही है।....सीने में भी काफ़ी तेज़ दर्द है।"
"आता हूँ शिखा।” बोलकर प्रखर ने शीघ्र ही काका को अपने बेड के पास लगी घंटी बजाकर बुलाया और उन्हें ख़ुद के पड़ोस में जाने की सूचना दी। साथ ही काका को भी वहीं पहुँचने को कहा। शीघ्र ही वह अपने घर से निकलकर समीर के यहाँ पहुँच गया। घर बंद करने के लिए काकी थी ही। प्रखर ने जब घबराई हुई शिखा को देखा तो सांत्वना देते हुए कहा- "क्या हो गया अचानक समीर को! कल रात तो ठीक था। मेरे से फोन पर काफ़ी देर तक चैट हुई थी। मैं जल्दी से अपनी गाड़ी निकालता हूँ। शिखा तुम बिल्कुल परेशान मत हो। यहाँ से कार्डियक अस्पताल पन्द्रह मिनट के रास्ते पर है।"

प्रखर तेजी से वापस अपने घर के लिए लौटा और अपनी गाड़ी निकालकर समीर के घर के गेट पर पहुँच गया। अंदर पहुँचकर वह समीर के सीने पर मालिश करने लगा। तब तक शिखा ने समीर की मेडिकल फ़ाइल व दवाइयाँ निकालकर एक बैग में रखी और ख़ुद के कपड़े जल्दी से बदल कर पहुँच गई। काका के भी वहाँ पहुँच जाने से सबके सहारे से समीर को उठाया और गाड़ी की पिछली सीट पर लिटा दिया। फिर प्रखर ने काका से कहा, “काका समीर के घर का भी ध्यान रखिएगा। घर के सभी तालों को अच्छे से लगाकर ही घर जाएँ।”
शिखा ने काका को ताला-चाबियाँ जहाँ पर रखी हैं, वो जगह बताई। तब काका ने सिर हिलाकर घर को सँभालने की सहमति दी।

प्रखर ने शिखा से कहा, "तुम आगे की सीट पर आकर बैठो। आगे बैठकर समीर का पीछे ख़याल रखना। मैं जल्द से जल्द अस्पताल पहुँचने की कोशिश करता हूँ।" जल्दी अस्पताल पहुँचने की कोशिश में जैसे ही प्रखर ने गाड़ी तेज़ चलाने की कोशिश की, समीर ने लड़खड़ाती आवाज़ में प्रखर को कहा- "इतनी जल्दी नहीं मरूँगा प्रखर! आराम से गाड़ी चला लो। कहीं एक्सीडेंट न हो जाए।"
"सारी सड़कें लगभग ख़ाली पड़ी हैं। समीर तुम परेशान न हो। मुझे गाड़ी चलाने का अभ्यास छूटा नहीं है। पिछले पैंतीस साल से गाड़ी चला रहा हूँ।"
समीर समझ गया था, प्रखर की यह बात सच नहीं है। उसे हमेशा सरकारी गाड़ी और ड्राइवर मिले थे। प्रखर उसका मन बदली करने को बोल रहा था। शिखा बिल्कुल शांत मगर तनाव में दिख रही थी। उसे शांत करने के हिसाब से प्रखर ने समीर के सामने पहली बार उससे कंधे पर हाथ रखकर कहा- "सब ठीक हो जाएगा शिखा! समीर को कुछ नहीं होगा। तुम निश्चिंत रहो। तुमने समय पर मुझे फोन कर दिया है। हम बस अब पहुँचने ही वाले है। पिछली बार मैं ही समीर के साथ अस्पताल गया था। डॉक्टर्स समीर की दिनचर्या से काफ़ी ख़ुश थे। इतने सालों से उसे चलने-फिरने में कोई दिक्कत कभी नहीं हुई है तो आगे भी सब ठीक रहेगा। ईश्वर पर विश्वास रखो।"

आज न जाने क्या हुआ प्रखर का हाथ अपने कंधे से हटाते समय शिखा उसका हाथ छोड़ नहीं पाई और उसे पकड़कर सुबकने लगी। शिखा को सुबकते हुए देखकर तेज़ चेस्ट पैन में भी समीर ने कहा- "सब ठीक हो जाएगा शिखा! हौसला रखो। इतनी जल्दी मरने वाला नहीं हूँ मैं।" समीर की बातें सुनकर शिखा की रुलाई ज़ोर से फूट पड़ी और अपने आँसू पोंछकर वह समीर से बोली- "मेडिसिन लिए हुए भी आधा घंटा हो चुका है आपको। कितना दर्द महसूस कर रहे हो आप! दर्द कम हुआ नहीं है, कैसे चिंता न करूँ।"
"दर्द कम नहीं हुआ है शिखा। पर तुम दोनों के बहुत घबराने से मेरे दर्द में आराम नहीं आएगा। सब ठीक हो जाएगा।"

समीर की सहनशक्ति देखकर प्रखर को बहुत आश्चर्य हुआ। समीर के चेहरे पर छाई पीड़ा ख़ुद बोल रही थी पर वह दोनों को शांत करने के हिसाब से ख़ुद का बिल्कुल सामान्य होना दिखा रहा था। अब अस्पताल भी आ गया था। शिखा और प्रखर ने मिलकर समीर को सहारा देकर कार से बाहर निकाला और रिसेप्शन के पास रखे हुए सोफ़े पर बैठा दिया। प्रखर ने शिखा को बोला- "मैं रिसेप्शन पर जाकर बात करता हूँ। तुम समीर के पास बैठो।"

प्रखर वहाँ से रिसेप्शनिस्ट के पास चला गया। उसने समीर की तबीयत के बारे में बताया और उससे पूछा- "अभी आपके अस्पताल की इमरजेंसी में कौनसे डॉक्टर है? डॉ० सुबोध पिछले एक साल से मरीज़ के डॉक्टर हैं। कुछ देर पहले सीवियर चेस्ट पैन होने से उनकी तबीयत काफ़ी ख़राब हो गई है।”
"अभी तो डॉक्टर अंकित इमरजेंसी ड्यूटी पर हैं। सबसे पहले वही देखेंगे। चेक-अप के बाद जैसा वह निर्णय लेंगे, सब हो जाएगा। आप सब निश्चिंत रहें।"
प्रखर से बात कर रिसेप्शनिस्ट ने डॉक्टर को फोन किया। साथ ही उसने नर्सिंग स्टाफ़ को इंस्ट्रक्शन दिए ताकि वह जल्द स्ट्रेचर लेकर आ जाए।

प्रखर ने कुछ रुपया अपने पास से ही रिसेप्शन पर जमा करवाकर रसीद ली। वो तो अच्छा हुआ उसने घर से निकलते समय अपनी गाड़ी की चाबी उठाते समय वॉलेट भी रख लिया था। वह जैसे ही समीर और शिखा के पास वापस लौटने के लिए मुड़ा, उसने देखा समीर का दर्द वापस काफ़ी बढ़ गया है। उससे बैठा भी नहीं जा रहा और शिखा उसके लेटने का इंतजाम कर रही थी।

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रचनाकार परिचय

प्रगति गुप्ता

ईमेल : pragatigupta.raj@gmail.com

निवास : जोधपुर (राजस्थान)

जन्मतिथि- 23 सितंबर, 1966
जन्मस्थान- आगरा (उत्तरप्रदेश)
शिक्षा- एम०ए० (समाजशास्त्र, गोल्ड मैडलिस्ट)
सम्प्रति- लेखन व सोशल-मेडिकल क्षेत्र में काउंसिलिंग
प्रकाशन- तुम कहते तो, शब्दों से परे एवं सहेजे हुए अहसास (काव्य-संग्रह), मिलना मुझसे (ई-काव्य संग्रह), सुलझे..अनसुलझे!!! (प्रेरक संस्मरणात्मक लेख), माँ! तुम्हारे लिए (ई-लघु काव्य संग्रह), पूर्ण-विराम से पहले (उपन्यास), भेद (लघु उपन्यास), स्टेप्लड पर्चियाँ, कुछ यूँ हुआ उस रात (कहानी संग्रह), इन्द्रधनुष (बाल कथा संग्रह)
हंस, आजकल, वर्तमान साहित्य, भवंस नवनीत, वागर्थ, छत्तीसगढ़ मित्र, गगनांचल, मधुमती, साहित्य भारती, राजभाषा विस्तारिका, नई धारा, पाखी, अक्षरा, कथाबिम्ब, लमही, कथा-क्रम, निकट, अणुव्रत, समावर्तन, साहित्य-परिक्रमा, किस्सा, सरस्वती सुमन, राग भोपाली, हिन्दुस्तानी ज़ुबान, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, नई दुनिया, दैनिक नवज्योति, पुरवाई, अभिनव इमरोज, हिन्दी जगत, पंकज, प्रेरणा, भारत दर्शन सहित देश-विदेश की लगभग 350 से अधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन और अनुवाद।
कविता अनवरत, कविता अभिराम, शब्दों का कारवां, समकालीन सृजन, सूर्य नगरी की रश्मियाँ, स्वप्नों की सेल्फ़ी, कथा दर्पण रत्न, छाया प्रतिछाया, सतरंगी बूंदें, संधि के पटल पर आदि साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
प्रसारण-
जयपुर दूरदर्शन से चर्चा व आकाशवाणी से सृजन का नियमित प्रसारण
सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में कविता का स्थान विषय पर टी.वी. पर एकल साक्षात्कार
संपादन- अनुभूतियाँ प्रेम की (संपादित काव्य संकलन)
विशेष-
राजस्थान सिन्धी अकादमी द्वारा कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' का अनुवाद।
कहानियों और कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' पर शोध।
प्रतिष्ठित कथा प्रधान साहित्यिक पत्रिका 'कथाबिम्ब' के संपादक मण्डल में क्षेत्रवार संपादक
कहानियों व कविताओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद
हस्ताक्षर वेब पत्रिका के लिए दो वर्ष तक नियमित 'ज़रा सोचिए' स्तंभ
सम्मान/पुरस्कार-
हिंदी लेखिका संघ, मध्यप्रदेश (भोपाल) द्वारा 'तुम कहते तो' काव्य संग्रह पर 'श्री वासुदेव प्रसाद खरे स्मृति पुरस्कार' (2018)
'अदबी उड़ान काव्य साहित्य पुरस्कार' काव्य संग्रह तुम कहते तो और शब्दों से परे पुरस्कृत व सम्मानित (2018)
साहित्य समर्था द्वारा आयोजित अखिल भारतीय 'डॉ० कुमुद टिक्कू कहानी प्रतियोगिता' श्रेष्ठ कहानी पुरस्कार (2019 और 2020)
विद्योत्तमा फाउंडेशन, नाशिक द्वारा 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' कहानी संग्रह 'विद्योत्तमा साहित्य सम्राट सम्मान' से पुरस्कृत (2021)
श्री कमल चंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता प्रथम पुरस्कार 2021
कथा समवेत पत्रिका द्वारा आयोजित 'माँ धनपति देवी स्मृति कथा साहित्य सम्मान' 2021, विशेष सम्मान व पुरस्कार
लघु उपन्यास भेद पुरस्कृत मातृभारती 2020
विश्व हिंदी साहित्य परिषद द्वारा 'साहित्य सारंग' से सम्मानित (2018)
अखिल भारतीय माथुर वैश्य महासभा के राष्ट्रीय सम्मेलन में 'समाज रत्न' से सम्मानित (2018)
डॉ० प्रतिमा अस्थाना साहित्य सम्मान, आगरा (2022)
कथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान द्वारा राज्य स्तरीय सम्मान 'रघुनंदन त्रिवेदी कथा सम्मान' स्टेपल्ड पर्चियांँ संग्रह को- 2023
पंडित जवाहरलाल नेहरु बाल साहित्य अकादमी, राजस्थान द्वारा 'इंद्रधनुष' बाल कथा संग्रह को 'बाल साहित्य सृजक' सम्मान 2023 
जयपुर साहित्य संगीति द्वारा 'कुछ यूँ हुआ उस रात' को विशिष्ट श्रेष्ठ कृति सम्मान 2023
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