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डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की छठवीं कड़ी

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की छठवीं कड़ी

योग का मतलब ही है, मन की शांति और योग से क्या होता है? स्वयं की जागृति। संगीत भी साधना है। योग भी साधना है। और यही नाद योग की उपलब्धि है देव।

"अनहदनाद महसूस करने के बाद वह अग्नि की मदद से आहद बन जाता है।"
"गुरुजी, तो क्या शून्य और अनहदनाद एक ही स्थिति पर नहीं हैं?"
"हाँ देव! तुम सही हो। अनहद शून्य के बाद भी आता है और शून्य के पहले भी। कुछ अनुभव करने से पहले भी एक अवस्था होती है, और वो अवस्था कुछ और नहीं शून्य की अवस्था है। मानस जिसे तुम माइन्स या दिमाग़ कहते हो, की सबसे भोली अवस्था है शून्य! अनहद शून्य से आता है और उसी वक़्त साथ में आता है आहद। अब तुम कहोगे आहद क्या है? और यह अनहद से कैसे अलग है? आहद एक सोची गयी बात है। एक ऐसी स्थिति, जिसे आप अनहद से आहद का रूप देते हैं। इसी इच्छाशक्ति से बनते हैं यम , आयाम , नियम , धारणा, सिद्धि, समाधि और प्राणायाम इत्यादि। ये सब सीढ़ी की एक-एक पग माने जाते हैं। इंसान के शरीर में आवाज़ के पाँच खंड कहे गये हैं। पहला नाभि, फिर हृदय, फिर वक्ष, कंठ और उसके बाद मूर्द्धा। कहा जाता है कि रियाज के वक़्त हृदय, वक्ष और मूर्द्धा सबसे ज़्यादा काम करते हैं। नाद सभी खंडों से एक ही वक़्त में गूँजता है। होता यह है कि जीवात्मा इन पाँच खंडों में से किसी एक घड़ी किसी एक खंड में रहती है। हालाँकि आवाज़ नाद साधना के दौरान बाक़ी के खंडों में भी महसूस की जाती है।"
"इसका जीवात्मा से क्या सम्बंध है गुरुजी?"
"जीवात्मा से सीधा संबंध है पुत्र! जीवात्मा वहीं है, जहाँ नाद का ध्यान बना हुआ है गाते समय। जानते हो लगातार नाद साधना का क्या असर होता है?"
"नहीं गुरुजी। लेकिन बस यह जानता हूँ कि जब इस साधना में रम जाता हूँ। कुछ समय के लिए मैं सब भूल जाता हूँ। और देवयानी के और क़रीब आ जाता हूँ।"
मुस्कुरा दिए गुरुजी।
"तुम्हारे लिए योग, संगीत साधना सब देवयानी से शुरू हो, देवयानी पर ही ख़त्म हो जाती है।"
"उसके इतर कुछ सोच ही नहीं पाता मैं गुरुजी।"
"देव! योग की भाषा में इस साधना का ही असर है आनंद या परम आनंद की खोज। कोई भी चीज़ तुम गाना चाहो , वो नाद साधना है। जैसे तुम राग गाना चाहो, तो वही नाद साधना, राग साधना है। नाद साधना के बारे में सबसे पहली बात जो कही जाती है, वो यह कि 'एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाए।' तुम एक चीज़ पर ध्यान दोगे तो तुम उसी में लीन हो जाते हो। योग भी यही बात कहता है और साधना भी।"
"जी गुरुजी। आपके कहने का अर्थ ध्यान सबसे आवश्यक है!"
"हाँ देव, सही समझे। ध्यान दस चीज़ों में हो तो तुम्हारी एनर्जी या मानसिक शक्ति कई जगह बँट जाएगी या सही शब्द कहो तो बिखर जाएगी। योग में जो कुछ सीढ़ियाँ कही गयी हैं, वो हैं- यम, आयाम, नियम, धारणा, प्रत्याहार इत्यादि। यह सब स्थान हैं, सिर्फ सोपान नहीं। जानते हो देव, हमारे जो ऋषि-मुनि थे, वो ये श्रेणियाँ बहुत पसंद करते थे, कोई भी विषय हो।"
"गुरुजी! क्या और कहाँ हैं ये आठ स्थान?"
"ये और कुछ नहीं है देव! एक ही बात के अलग-अलग नज़रिए हैं। इसमें तुम कभी भी एक स्थान से दूसरे स्थान में फ़र्क नहीं बता सकते। हो सकता है तुम एक ही स्थान में काम करते वक़्त चार-पाँच स्थान पर हो।"
"ऐसा भी होता है गुरुजी? फिर यह धारणा क्या होती है गुरुजी?"
"धारणा को तुम ऐसे समझो। मानो तुम किसी चीज़ के बारे में कोई संकल्प कर लो। यह क्या है? यही तो धारणा है। अब इस संकल्प के लिए तैयार होने के लिए तुम कुछ नियमों का पालन करोगे ही करोगे। यह यम है। तो अपना ही इम्तिहान लेने का तरीक़ा यही है कि कितनी सहजता से संगीत आपके अंदर से बह रहा है। तुम अपने संगीत के साथ कितने शांत हो और अपना ही संगीत सुनकर तुम्हें कितना संतोष है। देव! योग का मतलब क्या है? योग का मतलब ही है, मन की शांति और योग से क्या होता है? स्वयं की जागृति। संगीत भी साधना है। योग भी साधना है। और यही नाद योग की उपलब्धि है देव। नाद योग का ताल्लुक किसी गायकी से नहीं है देव, यह है संगीत की शिखर-उपलब्धि।"

गुरुजी की कर्णप्रिय आवाज़ में एक जादू था। देव मंत्रमुग्ध उनके ज्ञान को आत्मसात कर रहा था। लेकिन भटकन फिर भी देव का पीछा नहीं छोड़ रही थी। देवयानी की यादें पर्वतों की बयार-सी उड़कर चली आयीं। गुरुजी ने देव का ध्यान भटकते देखा।
"विचलित मत हो देव, जो ज़िम्मेदारी तुम देवयानी को दे आये हो, उसे उसकी ज़िम्मेदारी निभाने दो।"
"लेकिन गुरुजी! मेरी ग़लती की सज़ा मेरी देवू भुगत रही है।"
"नियति देव! लेकिन एक बात तो सच है।"
"क्या गुरुजी?"
"देवयानी ने तुम्हें बहुत प्यार किया है।"
"लेकिन मैंने क्या दिया उसे गुरुजी?"
"कमी तुमने भी नहीं की लेकिन मैंने कहा न नियति! तुम्हारे मन का कौनसा कोना ख़ाली रह गया देव, जिसे देवयानी नहीं भर पायी?"
"देवयानी भी यही कहती थी गुरुजी! लेकिन मुझे नहीं याद देवू की तरफ से कहीं भी कोई कमी थी। न जाने शर्मिष्ठा कैसे जीवन में आ गयी और कैसे मैं और देवू बिखर गये। यही मेरी ग़लती मुझे चैन नहीं लेने देती गुरुजी।"
"मानव-मन हमेशा अप्राप्य की ओर आकर्षित होता है। कुछ पा लेने के बाद कुछ नया पाने की ख़्वाहिश सभी में होती है। कुछ संतुष्टि का भाव पा जाते हैं। कुछ एक मृगतृष्णा में भटकते रहते हैं। बस ऐसी ही मृगतृष्णा में तुम क्षणिक भटक गये पुत्र! भटकन होती सबको है, बस कोई मन पर बाँध बांध लेता है और किसी को यह मरीचिका तेज़ी से अपनी तरफ़ खींच लेती है।"
"अब वो क्षणिक मोह के धागे टूट चुके हैं।"
"जीव हमेशा जड़ों की ओर लौटता है। इतने विचलित हो तो वापस चले जाओ देव।"
"कभी-कभी सोचता तो हूँ गुरुजी! लेकिन जो सज़ा मैंने अपने लिए चुनी, वो तो सही है। मैं उसका हक़दार हूँ। मैं देवयानी की उन नज़रों का सामना नहीं कर सकता। लेकिन मेरी देवयानी ऐसी सज़ा भुगत रही है, जिसकी सारी ग़लती उसके पति की है।
"देव! वो कोई सज़ा नहीं भुगत रही। अपनी मर्ज़ी से तुम्हारी अधूरी ज़िम्मेदारी निभा रही है।"
"फिर वापस चला जाऊँ गुरुजी! देवयानी के बिना कुछ भी नहीं मैं। और देवयानी! वो भी कब सुकून से होगी?"
"बेशक चले जाओ देव! लेकिन ज़रा सोचो, क्या शर्मिष्ठा के लिए यह सही होगा?"
"गुरुजी! मैं किसी के भी साथ न्याय न कर सका। न देवयानी, न शर्मिष्ठा और न अपने बेटे के साथ। मेरी ग़लती की सज़ा मेरा पूरा परिवार ही सह रहा है। कभी जो जाने का सोचूँ, फिर लगता है देवू का सामना कैसे करूँ? जिन आँखों में आँसू न आने देने का वायदा किया था, उन्हीं आँसुओं का आज सबसे बड़ा कारण मैं हूँ। और शर्मी! देवू उसे छाँव न देती तो वो कहाँ जाती? उसे भी आस दे, मैं यहाँ भाग आया।"
"शांत हो जाओ देव! देवयानी तुमसे अलग नहीं है। महसूस करो अपने आस-पास ही पाओगे। रात हो चली है। शांत होकर थोड़ा अभ्यास करना।" कहकर गुरुजी बाहर निकल गये।

देव सोचने लगा 'सच ही है, मातृत्व का जो भाव ईश्वर ने स्त्री को दिया है उस कारण ही उसे सृष्टि कहा जाता है। पुरुष अपनी पितृसत्तात्मक सत्ता के लिए कितना भी दंभ में रहे पर सच तो यही है, वो स्त्री की कभी बराबरी नहीं कर सकता।"

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रचनाकार परिचय

उपमा शर्मा

ईमेल : dr.upma0509@gmail.com

निवास : दिल्ली

जन्मतिथि- 5 सितंबर, 1979
जन्मस्थान- रामपुर(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- बी० डी० एस०
संप्रति- दंत चिकित्सक
प्रकाशन- लघुकथा संग्रह 'कैक्टस' (प्रभात प्रकाशन, 2023) एवं उपन्यास 'अनहद' (शुभदा प्रकाशन, 2023)
हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कथाक्रम, कथाबिम्ब, कथादेश, साहित्य अमृत, हरिगंधा, साक्षात्कार, पुरवाई, कथा समवेत, प्रेरणा अंशु, अविलोम, लोकमत, अमर उजाला, प्रभात ख़बर, हरीगंधा, साक्षात्कार जैसी पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर रचनाओं का प्रकाशन
प्रसारण- आकाशवाणी दिल्ली से समय-समय पर कविताएँ प्रसारित
सम्मान- 'सत्य की मशाल' द्वारा 'साहित्य शिरोमणि सम्मान', प्रेरणा अंशु अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा लेखन सम्मान, हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच, गुरुग्राम लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा मणि सम्मान, कुसुमाकर दुबे लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, श्री कमलचंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल के दिल्ली अधिवेशन में 'लघुकथा श्री सम्मान' एवं प्रतिलिपि सम्मान, पुस्तक 'कैक्टस' को श्री पारस दासोत स्मृति सम्मान
निवास- बी- 1/248, यमुना विहार, दिल्ली- 110053
मोबाईल- 8826270597