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प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की बीसवीं कड़ी

प्रगति गुप्ता के उपन्यास 'पूर्णविराम से पहले' की बीसवीं कड़ी

जीवन की दौड़ में साथ चलते लोग, विश्राम घाट पर पहुँचते ही स्मृतियों में बदलने लगते हैं।


समीर की सभी टेस्ट रिपोर्ट्स आने पर डॉक्टर सुबोध ने प्रखर और शिखा को अपने चैम्बर में बुलाया, और उन्हें बताया कि उसका ई.सी.जी. काफ़ी असामान्य आया है। हार्ट की पंपिंग भी बहुत अनियमित है। एंजिओग्राफी करके जल्द ही हमको किसी निर्णय पर पहुँचना होगा, जिसके लिए आप सहमति दें। प्रखर के साथ सलाह करके शिखा ने डॉक्टर्स को अपना काम करने के लिए सहमति दे दी।

पिछले दो सालों से समीर रोज़ प्रखर के साथ सैर को जाता ही था। उसका खान-पान भी बहुत संतुलित था। अन्य कोई दूसरे शौक भी नहीं थे, जिनकी वजह से दिक्कत खड़ी हो। पर शरीर का क्या है, कभी भी किसी अनहोनी या अप्रत्याशित बात की चेतावनी दे सकता है।
उम्र के साथ शरीर में काफ़ी परिवर्तन आ जाते हैं। इस बार होने वाला चेस्ट पैन शायद उसी का अंजाम था। समीर भर्ती होने के बाद मुश्किल से तीन दिन ही अस्पताल में रहा। जब वह थोड़ा-सा ठीक हुआ प्रखर और शिखा को समीर से मिलने की अनुमति डॉक्टर ने दे दी थी। लगभग छः-सात घंटे तीनों ने एक-दूसरे के साथ अच्छा समय गुज़ारा। समीर जैसे ही होश में आया, उसने सबसे पहले शिखा से पूछा था- "सार्थक का फोन आया था?"
शिखा के सहमति में सिर हिलाने पर समीर आगे कुछ भी नहीं बोला, बस आँखे बंद करके लेट गया। शायद समीर के मन में कहीं शिखा के भविष्य को लेकर चिंता थी। सार्थक के फोन तो आए, मगर गुज़रे हुए तीन दिनों में उसने अपने आने की टिकट का कोई जिक्र नहीं किया।

प्रखर शिखा और समीर की सभी बातचीत का साक्षी था। वह हर संभव कोशिश कर उसके तनाव को कम कर रहा था। उसने समीर से कहा-
"समीर तुम्हारी इच्छाशक्ति बहुत मज़बूत है। इसे हमेशा सकारात्मक ही रखना। तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे। हम दोनों तुम्हें जल्द ही घर लेकर जाएँगे। डॉक्टर कुछ और टेस्ट करने का बोल रहे हैं। तुम्हें किसी भी बात की चिंता हो या कुछ भी पूछना हो तो मैं यहाँ के काउन्स्लर को बुलाया देता हूँ। अपने दिमाग़ में कोई तनाव मत रखना। सब अच्छा होगा।"

आज न जाने क्यों समीर से बात करते-करते प्रखर की भी आवाज़ टूटने लगी थी। ऊपर से प्रखर बहुत मज़बूत दिख रहा था, पर कहीं वह भी समीर के लिए बहुत चिंतित था। प्रखर के चुप होते ही समीर ने पहले शिखा की ओर देखा फिर प्रखर से कहा-
"इतने कम समय में कितने क़रीब आ गये हो प्रखर तुम! पिछले दो साल से तुम्हारे बग़ैर मेरी कोई शाम गुज़री हो, याद नहीं आता। शिखा को हमेशा ही मुझसे शिकायत रहती थी कि अपने मन की बातों को मैं बोलता नहीं हूँ। तुमने तो मुझे बोलना सिखा दिया यार! अब जब शिखा की शिकायत दूर की है तो लगता है, न जाने कितनी साँसें बची हैं। बढ़ती उम्र की वज़ह से शायद बहुत भावुक होता जा रहा हूँ। हर बात की वैल्यू पता चलने लगी है। न जाने कितने और दिन.."
बोलते-बोलते जब समीर सिसकने लगा तो शिखा समीर के पास आकर बैठ गयी, और उसने समीर के सीने पर सिर रखकर रोना शुरू कर दिया। प्रखर से दोनों की ही स्थिति देखी नहीं जा रही थी। थोड़ी देर बाद वह चुपचाप आकर दोनों के बीच खड़ा हो गया, और बोला-
"समीर! शिखा मेरी बहुत प्यारी दोस्त रही है, पर मुझे उम्र के इस मोड़ पर शिखा के साथ तुम जैसा दोस्त मिलेगा, कभी नहीं सोचा था। तुम दोनों मेरे लिए बेशकीमती हो। प्लीज़! हिम्मत रखो! तुम ठीक हो जाओगे।"

प्रखर दोनों को परेशान देखकर जैसे ही दोनों के बीच आकर खड़ा हुआ, समीर ने एक हाथ से उसका और दूसरे से शिखा का हाथ थाम लिया और उसने डूबती हुई आवाज़ में शिखा और प्रखर को अपने और पास बुलाकर कहा-
"प्रखर, शिखा का ख़याल रखना। पता नहीं कितनी साँसें शेष हैं, पर अभी अपने मन की बात बोल पा रहा हूँ, यही बहुत है।" बोलते-बोलते अचानक ही समीर की आवाज़ जैसे ही खोने लगी। प्रखर ने दौड़कर डॉक्टर को बुलाया लाया। डॉक्टर्स ने समीर को हर तरह का इमरजेन्सी उपचार दिया। अचानक दिल का दौरा पड़ने से डॉक्टर्स समीर को नहीं बचा पाए, शायद ईश्वर को यही मंजूर था।

जैसे ही डॉक्टर्स ने उसे मृत घोषित किया, शिखा समीर के सीने पर सिर रखकर ख़ूब रोई। उसे सँभालते हुए प्रखर भी टूट रहा था, पर अस्पताल की सारी औपचारिकताएँ भी उसी को पूरी करवानी थीं। अस्पताल के स्टाफ़ को पेशेंट को डिस्चार्ज करने से पहले पैक करना था। प्रखर ने जब शिखा को समीर के पास से हटाया तो शिखा ख़ुद पर अपना संतुलन नहीं रख पाई, और प्रखर के गले लगकर फूट-फूट कर रोई।

प्रखर ने उसे अपने कंधे से बिल्कुल नहीं हटाया। प्रखर भी शिखा के साथ-साथ ख़ूब रोया। समीर का अचानक ही चले जाना, उसे भी तोड़ गया था। शिखा का हर दर्द प्रखर का अपना ही दर्द था। प्रखर ने कभी भी शिखा को स्वयं से अलग कहाँ समझा था! सच तो यही है, उम्र के इस पड़ाव में मित्रों का खोना बहुत आहत करता है।

अस्पताल की सभी औपचारिकताएँ प्रखर ने पूरी कीं। दोनों समीर को तेज़ दर्द में घर से अस्पताल, बोलता हुआ लेकर गये थे। आज जब उसे घर लेकर लौटे, कितना शांत था समीर! समीर की मृत देह को जब काका की मदद से प्रखर ने ज़मीन पर लिटाया। प्रखर के साथ-साथ काका भी ख़ूब रोये। उनका भी समीर के परिवार से बहुत लगाव हो गया था।

जिसे ही प्रखर अपने घर जाने के लिए उठा, शिखा ने कसकर उसका हाथ पकड़ लिया, और रोते हुए बोली-
"मत जाओ प्रखर! मैं समीर के बग़ैर कैसे रहूँगी।"
"मैं वापस आता हूँ शिखा! ख़ुद को सँभालो। अभी बहुत कुछ सँभालना है तुमको। प्रीति के जाने के बाद मैं इस दर्द से गुज़र चुका हूँ। तुम्हारा गुज़रना बाक़ी है। मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ और रहूँगा। अब तुम अकेली नहीं हो। इस बार तुम्हें गुम हो जाने के लिए नहीं छोड़ूँगा। अपनी नज़रों के सामने से कभी ओझल नहीं होने दूँगा।" अपनी बात बोलकर प्रखर आस-पड़ोस से आए लोगों को अटेन्ड करने लगा।

समीर का व्यवहार इतना सरल और सहज था कि आसपास के लोग भी उसे बेहद प्यार करते थे। कहीं पर भी कोई ज़रूरत होती, सभी पड़ोसियों ने खुलकर सहयोग किया। एक बार किसी ने उन तीनों के मेल-मिलाप को देखकर पूछा भी था- "क्या आप तीनों पहले से ही एक-दूसरे को जानते थे।"
तब प्रखर ने सहमति से सिर हिलाकर सारे ही प्रश्नों पर रोक लगा दी थी।

समीर ने जिस दिन विदा ली, उसी दिन सार्थक की आगरा पहुँचने की टिकट थी। समीर की मृत्यु दोपहर बारह बजे हुई। सार्थक को शाम सात बजे पहुँचना था। सार्थक को घर आते-आते लगभग आठ बज गए थे। सार्थक ने सबसे पहले घर आते ही पापा की मृत देह के पैर छुए। उसके बाद सीधे अपनी माँ शिखा के पास गया। शिखा ने उसको देखते हैं अपने गले से लगाया और रोने लगी। अपनी माँ के आँसू पोंछकर उसने कहा-
"अपने आप को सँभालिए माँ! पापा ने मुझे माफ़ी माँगने का भी समय नहीं दिया। हर बार फोन पर उनसे माफ़ी माँगनी चाही पर, नहीं कर पाया। मेरे भीतर की आत्मग्लानि ने रोक लिया मुझे। मुझे नहीं पता था पापा इतनी जल्दी चले जाएँगे।"
सार्थक की बात इस वक़्त शिखा को बिल्कुल समझ नहीं आई। सार्थक का बदला हुआ रूप अभी उसकी समझ से बाहर था।
"पापा के देह को अंतिम संस्कार के लिए कब लेकर जाएँगे?" सार्थक ने अपनी माँ से पूछा।
सब इंतज़ाम प्रखर अंकल ने किए हैं। उन्होंने ही पंडित को भी बुलाया है। पंडितजी जैसा भी करने को कहेंगे, हम सब उन्हीं के निर्देशों की पालना करेंगे। शिखा ने उसे बताया। सार्थक ने अपनी माँ की बातों को ध्यान से सुनते हुए अपना सिर हिलाकर स्वीकृति दी।

थोड़ी देर बाद प्रखर पंडितजी को लेकर आ गये, और उन्होंने आकर शरीर को ले जाने का समय सवेरे नौ बजे तय कर दिया। पंडितजी ने दाह-संस्कार के लिए जो भी सामान चाहिए, उसकी एक लिस्ट बनाकर सार्थक को दे दी। फिर वह सार्थक और प्रखर से सवेरे साढ़े आठ बजे तक आने का बोलकर चले गये। गुज़रे हुए दो सालों में प्रखर सार्थक से कभी भी नहीं मिला था। सार्थक विवाह के बाद मात्र दो दिन के लिए आया था। शिखा ने उसे बताया था, पर मिलना नहीं हुआ था। प्रखर ने जैसे ही सार्थक को अपने सामने देखा, उसने अपना परिचय करवाया। सार्थक ने प्रखर के पैर छुए और कहा-
"अंकल मैं आपको जानता हूँ। एक बार पापा-मम्मा ने बातों में आपका ज़िक्र किया था। मैं आपके बहुत थैंकफुल हूँ कि आपने माँ की बहुत मदद की।"
बोलकर सार्थक भी चुप हो गया।

प्रखर में आशीर्वाद देने के लिए उसके सिर पर हाथ रखा। थोड़ी देर दोनों के बीच खामोशी छाई रही। फिर प्रखर ने ख़ुद ही अपने बारे में बताया-
"बेटा! मैं तुम्हारे पास वाले ही घर में रहता हूँ। जब तक तुम यहाँ हो, तुम्हें या तुम्हारी माँ को किसी भी वक़्त कोई ज़रूरत हो तो मुझे बुला लेना। मेरे घर में सालो-साल पुराने सेवक काका हैं। आप दोनों की किसी भी ज़रूरत को ख़ुशी-ख़ुशी पूरा करेंगे। सार्थक ने सिर हिलाकर 'जी अंकल’ कहा।

सार्थक ने घर आने के बाद सभी ज़िम्मेदारियाँ सँभालने की पूरी कोशिश की। जो भी सामान दाह-संस्कार के लिए चाहिए था, वह सब लाकर रख दिया। जब भी समय मिलता, वह अपनी माँ के पास आकर बैठ जाता। उन्हें ढांढस देने की कोशिश करता।

समीर के दोनों भाई प्रवीण और प्रशांत के भी पहुँचने की सूचना आ गई थी। वो भी सवेरे सात बजे तक अपने परिवार के साथ वहाँ पहुँच रहे थे। शिखा ने प्रखर को उनके ठहरने का इंतज़ाम करने के लिए बोल दिया था।

प्रखर ने काका से कहकर कुछ लोगों के ठहरने का इंतज़ाम समीर के घर पर ही करवा दिया था, और बाक़ी लोगों को अपने घर में ही रुकवा दिया था, ताकि किसी को भी कोई दिक्कत न हो। सभी के खाने-पीने की भी संपूर्ण व्यवस्था उसने कर दी थी।

प्रशांत व प्रवीण के आ जाने से शिखा को बहुत सांत्वना मिली, क्योंकि तीनों भाइयों का आपस में असीम प्रेम में था। समीर के निर्जीव देह पर उसके दोनों भाई भी फूट-फूट कर रोए, पर होनी हो कौन टाल पाया है!

अगले दिन नौ बजे जब समीर को विश्राम घाट ले जाने का समय आया, शिखा ख़ुद को बहुत टूटा हुआ और कमज़ोर महसूस कर रही थी। समीर ने विवाह होने के बाद शिखा को इतना कुछ दिया था, जिसे शिखा कभी भी भूल नहीं सकती थी। आज समीर की अंतिम विदाई उसे कहीं गहरे तक तोड़ रही थी।

शिखा का रह-रह कर रोना प्रखर को बहुत आहत कर रहा था। उसका बस चलता तो शिखा को अपने गले से लगा लेता, और किसी भी कीमत पर उसके आँसुओं को धूल में मिलने नहीं देता। अपनी लाचारी को महसूस करके प्रखर भीतर ही भीतर चोटिल हो रहा था। सामाजिक मर्यादाएँ उसके हाथ-पाँव में बेड़ियाँ जकड़ रही थीं।

हालाँकि सभी सोचते थे कि वे तीनों स्कूल टाइम के मित्र हैं, पर प्रखर ने शिखा के साथ फिलहाल एक दूरी बना ली थी। शिखा के साथ उसका क्या रिश्ता था, यह सिर्फ़ प्रखर जानता था।

अगले दिन नौ बजे तक घर के आसपास के काफ़ी लोग व रिश्तेदार इकट्ठे हो गये थे। कुछ लोग घर के अंदर शिखा के आसपास बैठ गये तो कुछ घर के बाहर बरामदे में बिछे हुए फर्श पर। सभी की बातों में समीर के उत्कृष्ट व्यक्तित्व की बातें हो रही थीं। समीर था भी बहुत सरल व सादगी भरा इंसान।

शिखा आज सवेरे से रोते-रोते बहुत थक गई थी। वह चुपचाप मौन बैठी समीर को अपने आसपास ही महसूस कर रही थी। ज्यों-ज्यों समीर को ले जाने की तैयारी से जुड़ी बातें उसके कानों में पड़ रही थीं, उसका दिमाग़ बेसुध होता जा रहा था। जैसे ही समीर को ले जाने का समय आया, शिखा का मौन टूट गया, और वह बिलख-बिलख कर रोने लगी। प्रखर का दिमाग़ सब तरफ था। जैसे ही उसने शिखा को बिलखते हुए देखा, उसके क़दम स्वतः ही शिखा की ओर बढ़ चले। पर तभी सार्थक ने कुछ पूछने के लिए ज्यों ही आवाज़ लगाई, प्रखर ने ख़ुद को रोक लिया।

क़रीब दस बजे तक विश्राम घाट में समीर के शरीर से जुड़े सभी अंत्येष्टि संस्कार कर दिए गये। समीर का दाह-संस्कार सार्थक ने किया। वहाँ से लौटते समय प्रखर लगातार सोच रहा था, जीवन का खेल कितना अजीब है! कैसे दौड़ते-भागते जीवन को विश्राम घाट पहुँचते ही, एक ऐसा पूर्ण-विराम लग जाता है कि साथ आए लोग इसके बाद उस व्यक्ति को भूलना शुरू कर देते हैं।

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रचनाकार परिचय

प्रगति गुप्ता

ईमेल : pragatigupta.raj@gmail.com

निवास : जोधपुर (राजस्थान)

जन्मतिथि- 23 सितंबर, 1966
जन्मस्थान- आगरा (उत्तरप्रदेश)
शिक्षा- एम०ए० (समाजशास्त्र, गोल्ड मैडलिस्ट)
सम्प्रति- लेखन व सोशल-मेडिकल क्षेत्र में काउंसिलिंग
प्रकाशन- तुम कहते तो, शब्दों से परे एवं सहेजे हुए अहसास (काव्य-संग्रह), मिलना मुझसे (ई-काव्य संग्रह), सुलझे..अनसुलझे!!! (प्रेरक संस्मरणात्मक लेख), माँ! तुम्हारे लिए (ई-लघु काव्य संग्रह), पूर्ण-विराम से पहले (उपन्यास), भेद (लघु उपन्यास), स्टेप्लड पर्चियाँ, कुछ यूँ हुआ उस रात (कहानी संग्रह), इन्द्रधनुष (बाल कथा संग्रह)
हंस, आजकल, वर्तमान साहित्य, भवंस नवनीत, वागर्थ, छत्तीसगढ़ मित्र, गगनांचल, मधुमती, साहित्य भारती, राजभाषा विस्तारिका, नई धारा, पाखी, अक्षरा, कथाबिम्ब, लमही, कथा-क्रम, निकट, अणुव्रत, समावर्तन, साहित्य-परिक्रमा, किस्सा, सरस्वती सुमन, राग भोपाली, हिन्दुस्तानी ज़ुबान, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, नई दुनिया, दैनिक नवज्योति, पुरवाई, अभिनव इमरोज, हिन्दी जगत, पंकज, प्रेरणा, भारत दर्शन सहित देश-विदेश की लगभग 350 से अधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन और अनुवाद।
कविता अनवरत, कविता अभिराम, शब्दों का कारवां, समकालीन सृजन, सूर्य नगरी की रश्मियाँ, स्वप्नों की सेल्फ़ी, कथा दर्पण रत्न, छाया प्रतिछाया, सतरंगी बूंदें, संधि के पटल पर आदि साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
प्रसारण-
जयपुर दूरदर्शन से चर्चा व आकाशवाणी से सृजन का नियमित प्रसारण
सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में कविता का स्थान विषय पर टी.वी. पर एकल साक्षात्कार
संपादन- अनुभूतियाँ प्रेम की (संपादित काव्य संकलन)
विशेष-
राजस्थान सिन्धी अकादमी द्वारा कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' का अनुवाद।
कहानियों और कहानी संग्रह 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' पर शोध।
प्रतिष्ठित कथा प्रधान साहित्यिक पत्रिका 'कथाबिम्ब' के संपादक मण्डल में क्षेत्रवार संपादक
कहानियों व कविताओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद
हस्ताक्षर वेब पत्रिका के लिए दो वर्ष तक नियमित 'ज़रा सोचिए' स्तंभ
सम्मान/पुरस्कार-
हिंदी लेखिका संघ, मध्यप्रदेश (भोपाल) द्वारा 'तुम कहते तो' काव्य संग्रह पर 'श्री वासुदेव प्रसाद खरे स्मृति पुरस्कार' (2018)
'अदबी उड़ान काव्य साहित्य पुरस्कार' काव्य संग्रह तुम कहते तो और शब्दों से परे पुरस्कृत व सम्मानित (2018)
साहित्य समर्था द्वारा आयोजित अखिल भारतीय 'डॉ० कुमुद टिक्कू कहानी प्रतियोगिता' श्रेष्ठ कहानी पुरस्कार (2019 और 2020)
विद्योत्तमा फाउंडेशन, नाशिक द्वारा 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' कहानी संग्रह 'विद्योत्तमा साहित्य सम्राट सम्मान' से पुरस्कृत (2021)
श्री कमल चंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता प्रथम पुरस्कार 2021
कथा समवेत पत्रिका द्वारा आयोजित 'माँ धनपति देवी स्मृति कथा साहित्य सम्मान' 2021, विशेष सम्मान व पुरस्कार
लघु उपन्यास भेद पुरस्कृत मातृभारती 2020
विश्व हिंदी साहित्य परिषद द्वारा 'साहित्य सारंग' से सम्मानित (2018)
अखिल भारतीय माथुर वैश्य महासभा के राष्ट्रीय सम्मेलन में 'समाज रत्न' से सम्मानित (2018)
डॉ० प्रतिमा अस्थाना साहित्य सम्मान, आगरा (2022)
कथा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थान द्वारा राज्य स्तरीय सम्मान 'रघुनंदन त्रिवेदी कथा सम्मान' स्टेपल्ड पर्चियांँ संग्रह को- 2023
पंडित जवाहरलाल नेहरु बाल साहित्य अकादमी, राजस्थान द्वारा 'इंद्रधनुष' बाल कथा संग्रह को 'बाल साहित्य सृजक' सम्मान 2023 
जयपुर साहित्य संगीति द्वारा 'कुछ यूँ हुआ उस रात' को विशिष्ट श्रेष्ठ कृति सम्मान 2023
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