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डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की सातवीं कड़ी

डॉ० उपमा शर्मा के उपन्यास 'अनहद' की सातवीं कड़ी

सच वो देव के बिना कहाँ रह पाती थी? पर कैसे समझाये इन सबको कि देव गये कहाँ हैं? यहीं हैं पल-पल उसी के साथ। न जाने कब वापस आ जाएँ। वो नहीं मिली घर में तो कहाँ तलाशेंगे? वापस चले गये फिर से तो। उसे देव का इंतज़ार करना ही होगा। फिर कैसे जा सकती है वो इस घर से, जो उसके और देव के प्यार का मन्दिर है।

आसमान की नीली चादर पर सितारों के सफेद फूल टँके थे। चाँद अपनी शुभ्र ज्योत्सना बिखेर रहा था। रात की नीरवता को झींगुरों की आवाज़ रह-रहकर तोड़ दे रही थी। पेड़ों से छनकर आती धीमी-धीमी रोशनी ज़मीन पर फैल रही थी। कहीं-कहीं से कभी बादलों के टुकड़े आ; चाँद को घेर लेते। कुछ देर चाँद बादलों में छुप जाता फिर बादलों को पीछे कर मुस्कुराता हुआ आसमान में पूरी शिद्दत से आ चमकने लगता। देवयानी चाँद और बादलों की आँख-मिचौली एकटक देख रही थी। उसकी अपनी ज़िंदगी पर भी समय के बादलों ने अपना कब्जा जमा लिया था। वो कब इस चाँद के जैसे दु:खों के घेरे से बाहर आ पाएगी। देव कब वापस आएँगे? वापस आ भी गये तो क्या सबकुछ पहले जैसा हो पाएगा? क्या देव की ग़लती इतनी बड़ी है? तो क्या उसने उदासी का अतिरेक ओढ़ लिया था? देव के जाने की ज़िम्मेदार वो ख़ुद है? उस दिन के बाद देवयांक ने कुछ नहीं पूछा था लेकिन देवयांक और अनन्ता की आँखों में तिरते प्रश्न से वो अनजान नहीं थी। अपराध तो उसने भी किया है? देव को बच्चों से अलग करने का अपराध! वो भी रेशम-कीट की तरह सवालों के कुकून में फँसी थी। कहीं कोई छोर नहीं मिल रहा था। तो क्या वो भी इस कुकून में फँसी एक दिन दुनिया से चली जाएगी तब यह छोर खुलेगा!

मन की रस्सी पर दुविधा के साँप फन फैलाये दौड़ रहे थे। वो देव को रोक सकती थी। हाँ, वो देव को रोक लेती तो आज वो और देव चैन से होते लेकिन शर्मिष्ठा! वो कहाँ जाती? उसका सुख-चैन मिल जाता लेकिन देव की छोटी ही सही लेकिन वो ग़लती शर्मिष्ठा को ख़त्म कर देती। उसे देव की यह ग़लती सुधारनी ही थी।
रात की चादर धीरे-धीरे सरक रही थी। चाँद अब मंद पड़ता जा रहा था। समय कब किसी के रोके रुका है! वो सदैव अपनी गति से बहता जाता है। अब भी बह रहा है, देव के बिना। उसके देव के बिना। जिस देव के बिना एक-एक पल मुश्किल लगता था, आज पाँच दिन बीत गये। देवयांक और अनन्ता कितनी ज़िद कर रहे थे साथ चलने की। वो माँ को अकेले कैसे छोडे़ इस इतने बड़े घर में? चिया बार-बार आ उससे लिपट जाती है।

"दादी माँ! आपके बिना मन नहीं लगता। तब आप दादू के बगैर आना नहीं चाहती थी़ं और दादू को ये शहर न जाने इतना प्यारा क्यों था?"
"बेटा, दादू का बचपन बीता है इस शहर में। सारे दोस्त यहीं थे। दादू के मम्मी-पापा की यादें यहाँ थीं। इसलिए दादू का मन यहाँ लगता था। जैसे आपका आपके शहर में लगता है।" देवयानी ने प्यार से थपथपा कर चिया को समझाया।
"तो अब चलिए न दादी। दादू के बिना आप एकदम अकेली हो गई हैं। आप साथ होंगी, कितना अच्छा होगा!"
"चलूँगी बेटा। बस थोड़े दिन बाद। तुम्हारे दादू भी आ जाएँगे। फिर हम दोनों चिया के साथ ख़ूब चैश खेलेंगे।"
"सच दादी! कब होगा यह दादी? बताइए? कब आएँगे दादू! फिर तो बहुत मज़ा आएगा दादी। मैं दादू और आपके साथ ख़ूब धमा-चौकड़ी भी करूँगी।"
"बहुत ज़ल्द मेरी बच्ची।" कहकर उसने चिया को तो बहला दिया। साथ ही ख़ुद को भी।

सच वो देव के बिना कहाँ रह पाती थी? पर कैसे समझाये इन सबको कि देव गये कहाँ हैं? यहीं हैं पल-पल उसी के साथ। न जाने कब वापस आ जाएँ। वो नहीं मिली घर में तो कहाँ तलाशेंगे? वापस चले गये फिर से तो। उसे देव का इंतज़ार करना ही होगा। फिर कैसे जा सकती है वो इस घर से, जो उसके और देव के प्यार का मन्दिर है। गुलाबी रंग उसे बहुत पसंद था और सफेद देव को। उनका पूरा घर गुलाबी-सफेद रंग से रँगा हुआ था। उसे सफेद रंग प्यारा लगने लगा था और देव को गुलाबी। देव हँसते लोग हमें पागल कहते होंगे। कितना कलरफुल घर है हमारा! कोई एक रंग से ही सजा लेती घर को। वो मुस्कुरा भर देती। पागल ही तो थी वो देव के लिए। वो देव के रंगों में रँग रही थी और देव उसके। फूल-पत्तियों की सदा से दीवानी थी वो। जहाँ भी जाती, वहाँ की ख़ुशबू साथ ले आती। पूरा घर उसने पौधों से सजा लिया था। और कितना ही समय उन्हीं में लगा देती। हर पौधा जैसे उसके स्पर्श से उसे पहचान जाता। देर तक उन्हें निहारती रहती। तब देव गुस्सा हो जाते कि उसे देव से ज़्यादा उसे ये पौधे प्यारे हैं। कितना डर गई थी वो उस दिन देव की नाराज़गी से। फिर उसने एक भी पौधे पर ध्यान देना बंद कर दिया। कितनी चाह थी लाल गुलमोहर उसके दरवाज़े पर खड़ा हो पूरी आन-बान से। पर डर से वो चाह भी दबा ली। तब उसके शौक़ को देख बाहर अहाते में लाल गुलमोहर कितने प्यार से लगाये थे देव ने। उन्हें देख जब वो खिलखिलायी थी, देव ने कहा था ऐसे ही इन गुलमोहर जैसे हँसती रहना। तुम्हारी उदास आँखें मेरा करार ले जाती हैं। अब इन्हें कभी अपने से दूर न करना। इनसे दूर हुई तो मुझसे हो जाओगी। कैसे इनसे दूर हो पाएगी वो?

देव की यादें कोने-कोने में रची बसी हैं। और बसा है देव का इंतजार। उसकी एक-एक साँस में रचा बसा है देव। इसी घर में देव के साथ शादी होकर आई थी। कहने को देव का कोई नहीं था लेकिन देव दूर के रिश्तों को भी इतना मान देते थे कि पूरा परिवार ही अपना लगता था। लाल जोड़े में सजी देवयानी के साथ देव की सुंदर जोड़ी देख किसने नहीं सराहा था। कँगना खिलाई में खेल खत्म ही नहीं हो रहा था। वो अँगूठी देव के हाथ में दे देती और देव उसके हाथ में। भाभियाँ और ताई-चाची देव का ख़ूब मज़ाक बना रहे थे और वो शरम से लाल हुई जा रही थी। रिश्ते की बड़ी भाभी ने हँसकर अँगूठी अपने हाथ में ले ली और बोली- "ये दोनों तो साँझ ढले तक ऐसे ही हाथ में हाथ लिए बैठे रहेंगे और यहीं रात हो जाएगी। लो बहुरिया अँगूठी तुम थामो और कस कर रखना हमारे देवर जी को। ऐसे तुम्हारे दीवाने हैं। बड़े जतन और चाह से तुम्हें ब्याह कर लाये हैं। लेकिन किसी की परेशानी से बड़ी जल्दी परेशान हो, भावनाओं में भी बह जाते हैं। देखना कहीं कोई परेशानियों का हवाला दे तुमसे खींच न ले बन्नो।"
"भाभी, कितनी ही शिकायतें कर लीजिए। मेरी बहुरिया को भरमा नहीं पायेंगी।"

देव ने मुस्कुराती नज़र उसकी ओर डाली और उसने अपनी नज़रें ज़मीन पर। प्रेम के कितने ही रंगों से देव ने मेरी दुनिया भर दी। देव की दीवानगी से वो डर- डर जाती। देव ने दिया भी भरपूर प्यार उसे। कहीं एक मिनट भी आँखों से ओझल हो जाती तो देव शोर मचा देते। उसे याद आया पहली करवाचौथ थी और वो भूख से बेदम बैठी थी। कभी भूखे रहने की आदत नहीं थी। भूख से जान निकल रही थी और देव अपनी चुहलबाजी से बाज़ नहीं आ रहे थे। उसके सामने उसकी पसंद की चीज़ें दिखा-दिखा कर चिढ़ा रहे थे। गुस्से से वहाँ से उठ गई। फिर चाँद निकलने पर भी देव के आसपास नहीं आई।

"बहुत तंग कर रहे थे न अब समझ आएगा। अब खाना ही नहीं मुझे कुछ। आप तो जनाब खाकर बैठे होंगे। मैं दिन भर की भूखी फिर भी तंग करना। अब जब नहीं दिखूँगी तब पता चलेगा।" गुस्से में कह अंदर बैठ गई।
"कहाँ हो भाभी? चाँद निकल आया कब का!" छोटी ननद के पुकारने पर बाहर निकली। चाँद की पूजा कर निरुठी-सी बिना कुछ खाये कमरे में चल दी।
"भाभी! कहाँ जा रही, खाना नहीं खाना क्या?"
"देवयानी ने कमरे में दिन भर समोसे-कचौड़ी उड़ाई हैं छुटकी।" सामने देव मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। गुस्से से पैर पटकती देवयानी अंदर चल दी।
"हाँ, मैंने दिन भर समोसे-कचौड़ी खाई हैं। व्रत तो इन्होने रखा है। इन्हें खिला दीजिए खाना।"
"भाभी! क्या आपको सच में नहीं पता?"
"क्या नहीं पता दीदी?"
"यही कि मैंने समोसे-कचौड़ी उड़ाई हैं।" देव अभी भी उसको तंग करने से बाज़ नहीं आ रहे थे।
"भाभी! आपको सच में नहीं पता!" ननद हैरान-परेशान बोली।
"क्या दीदी?"
"यही कि भैया ने आपके लिए व्रत रखा है। सारे दिन पानी की एक बूँद भी नहीं ली।"
"क्या कह रही हो दीदी?"
"सारा ज़माना सबकुछ जाने। जाने न जाने बस गुल ही न जाने। भाभी! आओ और दोनों खाना खाओ।" ननद मंद-मंद मुस्कुराती बोली।
देवयानी की आँखें भीग गई। "सुबह से बता नहीं सकते थे।"
"क्या बताता? तुम रखने देती फिर। और फिर तुम्हारी आँखों में यह ख़ुशी कैसे दिखती, जो अब छलके जा रही है।"
"क्यों करते हो इतना प्यार?"
"पागल हूँ न!"
"सच में हो।"

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रचनाकार परिचय

उपमा शर्मा

ईमेल : dr.upma0509@gmail.com

निवास : दिल्ली

जन्मतिथि- 5 सितंबर, 1979
जन्मस्थान- रामपुर(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा- बी० डी० एस०
संप्रति- दंत चिकित्सक
प्रकाशन- लघुकथा संग्रह 'कैक्टस' (प्रभात प्रकाशन, 2023) एवं उपन्यास 'अनहद' (शुभदा प्रकाशन, 2023)
हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कथाक्रम, कथाबिम्ब, कथादेश, साहित्य अमृत, हरिगंधा, साक्षात्कार, पुरवाई, कथा समवेत, प्रेरणा अंशु, अविलोम, लोकमत, अमर उजाला, प्रभात ख़बर, हरीगंधा, साक्षात्कार जैसी पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर रचनाओं का प्रकाशन
प्रसारण- आकाशवाणी दिल्ली से समय-समय पर कविताएँ प्रसारित
सम्मान- 'सत्य की मशाल' द्वारा 'साहित्य शिरोमणि सम्मान', प्रेरणा अंशु अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा लेखन सम्मान, हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच, गुरुग्राम लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा मणि सम्मान, कुसुमाकर दुबे लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, श्री कमलचंद्र वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता में लघुकथा सम्मान, लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल के दिल्ली अधिवेशन में 'लघुकथा श्री सम्मान' एवं प्रतिलिपि सम्मान, पुस्तक 'कैक्टस' को श्री पारस दासोत स्मृति सम्मान
निवास- बी- 1/248, यमुना विहार, दिल्ली- 110053
मोबाईल- 8826270597