Ira Web Patrika
अप्रैल-जून 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
डॉ० आरती लोकेश गोयल की कहानी- प्रत्यावर्तन

दुनिया भर में लोग नौकरियों से निकाले जा रहे थे। हवाईजहाज़ हवाई अड्डों पर खाली खड़े थे जैसे बूढ़ी गाय बस खूँटा गाढ़कर घर में बँधी रहती है। वह किसी के काम की नहीं रहती और कोई उसका ध्यान नहीं रखता। यात्राएँ ही नहीं तो बुकिंग क्लर्क की ही जॉब कहाँ बची थीं। ट्रैवल एजेंसी भी एक ही कर्मचारी से सारा काम चला रही थी। अंग्रेज़ी बोलने वाला उस समय मौजूद नहीं था। कॉल सेंटर पर केवल पाकिस्तानी अटैन्डेंट था जो सूज़ी आंटी की अर्मेनियन अंग्रेज़ी को समझ नहीं पा रहा था।

अनिल प्रभा कुमार की कहानी- बरसों बाद

मेरे पति शरारत से मुस्कुराए। अनुवाद कि दोनों झूठ बोल रही हो। वह उसका सामान लेकर ऊपर के कमरे में रखने के लिए चले गए। मेरा हाथ अभी भी उसने पकड़ा हुआ था। वैसे ही आकर ड्रॉइंग-रूम में एक ही सोफ़े पर आकर बैठ गईं। दोनों एक-दूसरे को देख रही थीं, तोल नहीं। दोनों की आँखों पर चश्मे, बालों में घनेपन की जगह छीजन और भर आए बदन।

डॉ० अमिता दुबे की कहानी- छल

सौमित्र के आने के बाद हमारी दिनचर्या रसमय हो गयी थी। अब अपेक्षाकृत अनिंद्य और अरुशी हमें कम याद आते थे। सौमित्र ने वह स्थान ले लिया जो मेरे बच्चों के बाहर जाने से रिक्त हुआ था। मेरी ममता फल-फूल रही थी। अभिजीत ने भी कभी मुझे कुछ नहीं कहा। एक प्रकार से उसके प्रति मेरी बढ़ती ममता को उनकी भी स्वीकृति प्राप्त थी।

रंजना जायसवाल की कहानी 'लड़के की माँ'

कुछ दिनों पहले ही नाडी ने पड़ोसी के मुख्य द्वार पर बनी सूखी नाली में बच्चे दिए थे शायद नाडी अपने बच्चों को छोड़कर खाने-पीने की तलाश में निकली थी। उसके बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे और माँ की तलाश करते-करते सड़कों पर निकल आए थे। वह कुटकुट के शरीर के पास ऐसे बिखरे हुए थे, जैसे किसी बच्चे की गुल्लक अचानक से टूट गई हो और सिक्के सड़क पर बिखर गए हों। कुटकुट के लिए वह गुल्लक के सिक्के ही तो थे, जो उसे ख़ुशी दे गए थे। कुटकुट मुझे जिस तरह से देख रही थी कि मेरा मन भर आया।