Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
उर्मिला शुक्ला की कहानी- बँसवा फुलाइल मोरे अँगना

अब तक तो बस एक ही बार वह मिसेज मल्होत्रा के करीब जा पाया था। वह भी बस कुछ घंटों के लिए। दीपा उसकी दोस्त थी, पत्नी नहीं। उसकी भी अपनी कुछ सीमायें थीं, सो सब कुछ आधा-अधूरा ही रह गया था। वह दृश्य उसकी आँखों में बार-बार उभरता रहा; मगर अब ? अब तो सारा का सारा समय उसका अपना होगा। कोई रोक टोक, कोई प्रतिबन्ध नहीं। अब वह क्लब का स्थायी मेम्बर होगा। सोचकर ही उसे रोमांच हो आया और उसकी आँखों की वह, चमक...!

इला प्रसाद की कहानी- दहशत

केमिकल फ़ैक्ट्रियों की गोद में बसा था यह हाई स्कूल। निवेदिता को अगर कुछ परेशान करता था तो वह उन फ़ैक्ट्रियों से उठने वाला रंगीन धुँआ था या फ़िर वह दुर्गंध जो किन्हीं खास दिनों में बादलों भरे आसमान से न निकल पाने की विवशता में उसके स्कूल तक तैर आती थी। सुबह-सुबह जब वह पार्किंग एरिया में कार पार्क करके बाहर आती तो लगभग दौड़ती हुई सड़क पार करती, सीढ़ियाँ चढ़, शीशे के बड़े दरवाजे को धकेलती, स्कूल में दाखिल हो जाती, साँस रोकती हुई।

डॉ० आरती लोकेश गोयल की कहानी- प्रत्यावर्तन

दुनिया भर में लोग नौकरियों से निकाले जा रहे थे। हवाईजहाज़ हवाई अड्डों पर खाली खड़े थे जैसे बूढ़ी गाय बस खूँटा गाढ़कर घर में बँधी रहती है। वह किसी के काम की नहीं रहती और कोई उसका ध्यान नहीं रखता। यात्राएँ ही नहीं तो बुकिंग क्लर्क की ही जॉब कहाँ बची थीं। ट्रैवल एजेंसी भी एक ही कर्मचारी से सारा काम चला रही थी। अंग्रेज़ी बोलने वाला उस समय मौजूद नहीं था। कॉल सेंटर पर केवल पाकिस्तानी अटैन्डेंट था जो सूज़ी आंटी की अर्मेनियन अंग्रेज़ी को समझ नहीं पा रहा था।

अनिल प्रभा कुमार की कहानी- बरसों बाद

मेरे पति शरारत से मुस्कुराए। अनुवाद कि दोनों झूठ बोल रही हो। वह उसका सामान लेकर ऊपर के कमरे में रखने के लिए चले गए। मेरा हाथ अभी भी उसने पकड़ा हुआ था। वैसे ही आकर ड्रॉइंग-रूम में एक ही सोफ़े पर आकर बैठ गईं। दोनों एक-दूसरे को देख रही थीं, तोल नहीं। दोनों की आँखों पर चश्मे, बालों में घनेपन की जगह छीजन और भर आए बदन।