Ira Web Patrika
फरवरी 2026 अंक पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है। यह अंक श्रद्धेय गोविन्द गुलशन की स्मृतिओं को समर्पित है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
बिछड़े सभी बारी-बारी- अनिता रश्मि

पतले-दुबले, लंबे, धीर-गंभीर, गौरवर्णी भारत भाई ने उसी समय अपना नाम यायावर रख छोड़ा था। जिंस के ऊपर लंबा कुर्ता और कांँधे पर कपड़े का बड़ा-सा थैला। थैले में अनगिन साहित्यिक किताबें, साहित्यिक सामग्री कोर्स की पुस्तकों के अलावा अर्थात उन दिनों के कवियों, साहित्यकारों, यायावरों की मुकम्मल तस्वीर। मोटे चश्मे के भीतर से झाँकतीं दो बुद्धिदीप्त आँखें! अत्यधिक विनम्र, निश्छल भी।

एग्ज़ाम का रिज़ल्ट और एक क़िस्सा- सीमा मधुरिमा

मेरा हाई स्कूल का रिज़ल्ट आया था। हम लोग हर बार की तरह इस बार भी गर्मी की छुट्टियों में मामा के घर छुट्टियाँ बिताने गये हुए थे। उसी बीच रिज़ल्ट आया। उस समय रिज़ल्ट पेपर में छपा करता था। मेरे बड़े भैया को रोल नंबर देकर गये थे कि जब रिज़ल्ट आएगा देख लीजिएगा। रिज़ल्ट के बाद ही बड़े भैया हमें मामा के यहाँ लेने आ गये और उन्होंने दुख भरी ख़बर सुनाई की सीमा फेल हो गयी है।

डॉ० संध्या तिवारी का संस्मरण 'अप्रिया नीलकंठी'

जेठ की तपती धूप-सा पापा का गुस्सा माँ अपने मन के हरे-भरे गुलमोहर पर दहकते फूलों-सा सजा लेती। उस वृक्ष के नीचे पूरा परिवार और हम बच्चे छाया का भले ही अनुभव करते रहे हों लेकिन दंदक तो छू ही जाती थी, तो फिर माँ कैसे सहती होगी उस प्रचंड क्रोधाग्नि को?