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मौसम ट्रंपियाना- फारूक आफरीदी

मौसम ट्रंपियाना- फारूक आफरीदी

मीडियापर्सन की हालत उस विद्यार्थी जैसी, जिसे हर उत्तर के बाद यही सुनने को मिले- 'रोंग, नेक्स्ट!' फिर आया 'दीवार दर्शन'- एक ऐसी दीवार, जो सिर्फ़ ईंट-पत्थर की नहीं, बल्कि विचारों, भय और पहचान की। यह दीवार जितनी ज़मीन पर खड़ी होती, उससे कहीं ज़्यादा लोगों के मन में खड़ी हो जाती। बादल भी सोचते- 'किधर से बरसें कि वीज़ा न माँग लिया जाए!' विदेश नीति तो मानो शतरंज की बिसात, जहाँ चालें नियमों से कम और मूड से ज़्यादा तय होती रहती।

कभी आपने ऐसा मौसम देखा है, जो बादलों से कम और बयानों से ज़्यादा बनता हो? जहाँ आसमान में बादल नहीं, बल्कि विचारों के गुब्बारे तैरते हों और हर गुब्बारा अपने रंग को ही 'सत्य' घोषित करता हो। तो आपका स्वागत है- 'ट्रंपियाना मौसम' में!
इस मौसम के शहंशाह हैं- दादा ट्रम्प प्रसाद, जिन्होंने मौसम को विज्ञान से निकालकर सीधे राजनीति के मंच पर ला खड़ा किया। अब मौसम विभाग की भविष्यवाणी से पहले यह देखा जाता है कि आख़िरी बयान क्या आया था। तापमान अब थर्मामीटर से नहीं, बल्कि ट्रेंडिंग हैशटैग से मापा जाता है। सुबह अगर सूरज कुछ संकोची लगे, तो समझिए रात को कोई तीखा ट्वीट हुआ है। अगर धूप ज़्यादा तेज़ हो, तो मान लीजिए कि प्रशंसा की लहर चल रही है। अगर अचानक बादल घिर आएँ, तो तय मानिए- कहीं न कहीं आलोचना का तूफ़ान उठ चुका है। मौसम विभाग के वैज्ञानिक अब दोहरी ड्यूटी कर रहे हैं- एक तरफ़ वे वायुदाब नापते हैं, दूसरी तरफ़ 'वक्तव्य-दाब'।

"आज 70 फीसदी वर्षा की संभावना है।"- वे कहते हैं। तभी ट्रंपियाना आकाश से आवाज़ आती है- "यह बिल्कुल ग़लत है, यह साज़िश है!" यह सुन बेचारे बादल आधे बरसकर लौट जाते हैं, जैसे उन्हें भी डर हो कि कहीं उनकी नौकरी न चली जाए। इस मौसम में हवाओं का भी लोकतंत्र बड़ा विचित्र है। वे दिशा बदलने से पहले सर्वे कराती हैं- "किधर बहें कि तालियाँ ज़्यादा मिलें?" प्रशंसा यदि पूर्व से आ रही है, तो हवा पूर्वमुखी हो जाती है। यदि पश्चिम से विरोध उठे, तो हवा तुरंत करवट बदल लेती है- मानो उसे भी करियर की चिंता हो। और हाँ, इस मौसम का सबसे अनोखा आविष्कार है- 'दीवार प्रभाव।' जहाँ दीवार खड़ी हो जाए, वहाँ बादल भी पासपोर्ट लेकर आते हैं। बारिश की हर बूँद पूछती है- "क्या मेरे पास वैध अनुमति है?" अगर नहीं, तो उसे सीमा पर ही रोक लिया जाता है और फिर वह बूँद अंतरराष्ट्रीय विवाद बन जाती है। इस मौसम में तापमान का गणित भी बड़ा निराला है- प्रशंसा हो तो पारा चढ़ता है- गौरव से। आलोचना हो तो पारा और चढ़ता है- क्रोध से और अगर कोई सवाल पूछ ले, तो पारा उबलने लगता है- राष्ट्रहित में! अर्थात यहाँ ठंडक नाम की कोई चीज़ नहीं। संतुलन तो जैसे किसी संग्रहालय में रखी पुरानी वस्तु हो, जिसे लोग सिर्फ़ देखने जाते हैं, अपनाने नहीं।

एक दिन मैं छाता लेकर निकला। पड़ोसी ने पूछा- मौसम साफ़ है, फिर छाता क्यों? मैंने कहा- "भाई, यहाँ बादल नहीं, बयान बरसते हैं और इनकी बौछार से बचने के लिए छाता नहीं, विवेक चाहिए! ट्रंपियाना मौसम का प्रभाव अब सीमाओं में कैद नहीं रहा। यह एक वैश्विक ट्रेंड बन चुका है। छोटे-बड़े सभी देश अब अपने-अपने ‘मौसम निर्माता’ तैयार कर रहे हैं। कहीं भाषण से बर्फ गिर रही है तो कहीं बम गिर रहे हैं। कहीं ट्वीट से लू चल रही है और कहीं प्रेस कॉन्फ़्रेंस से चक्रवात उठ रहे हैं। मौसम विज्ञान अब पुराना हो चला है। नई डिग्री का प्रस्ताव है- 'राजनीतिक मौसम विज्ञान।' इसमें पढ़ाया जाएगा- कैसे एक बयान से मानसून प्रभावित होता है। कैसे एक ट्वीट से सूखा पड़ सकता है। और कैसे सच्चाई का तापमान हमेशा सुविधानुसार बदलता है।

उच्च स्तर की बैठकों में अब यह चर्चा होती है कि 'मौसम को कैसे नियंत्रित करें?' एक अधिकारी सुझाव देता है- "सर, बादलों को भी मीडिया ब्रीफिंग दे दीजिए।” दूसरा कहता है- "और जो बादल असहमत हों, उन्हें राष्ट्रविरोधी घोषित कर दीजिए!" इस बीच धरती पर खड़ा आम आदमी आसमान देखता है और इस उलझन में पड़ जाता है कि 'ये बादल हैं या बयान? ये बारिश है या प्रतिक्रिया?' वह छत पर खड़ा सोचता है- "हे प्रकृति! तुम तो निष्पक्ष थीं, तुम भी अब प्रवक्ता बन गई?" सच पूछिए तो ट्रंपियाना मौसम किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक प्रवृत्ति हो गया है। यह वह दौर है, जहाँ सत्य मौसम की तरह बदलता है और मौसम सत्य की तरह इस्तेमाल होता है। जब सत्ता का तापमान बहुत बढ़ जाता है, तो मौसम भी तटस्थ नहीं रह पाता। वह भी पक्ष लेने लगता है- कभी धूप बनकर, कभी आँधी बनकर, और कभी सिर्फ़ शब्दों के बादल बनकर। अब बादल नहीं गरजते, बयान गरजते हैं, अब बारिश नहीं होती, प्रतिक्रियाएँ बरसती हैं, और हम, छाते लेकर खड़े रहते हैं, यह समझने की कोशिश में कि आख़िर यह मौसम है, या सत्ता का मूड? दूसरी तरफ आजकल लोकतंत्र गुनगुनाता है, 'रहें ना रहें हम' तराने रहें हमारे। दुनिया एक ऐसा दौर देखने को अभिशप्त है, जिसकी राजनीति ने न सिर्फ़ इतिहास लिखा, बल्कि मौसम, मीडिया, बाज़ार और शब्दकोश- सबको अपने रंग में रंगने की ठान ली।

इस रंगमंच के सबसे चर्चित नायक रहे ट्रम्प चाचा। इसने सत्ता को रियलिटी शो बना दिया और रियलिटी को 'स्क्रिप्टेड' बता दिया। ट्रंप चाचा का कार्यकाल किसी सरकारी फाइल की तरह सीधा-सपाट नहीं बल्कि एक धारावाहिक बन गया, जिसमें हर दिन नया एपिसोड, हर बयान एक क्लिफहैंगर और हर ट्वीट एक ब्रेकिंग न्यूज़ हो गई। फर्क बस इतना कि यहाँ दर्शक रिमोट नहीं बदल सकता, क्योंकि चैनल पूरी दुनिया पर एक साथ प्रसारित होता है। सबसे पहले बात करते हैं 'ट्वीट तंत्र' की, जहाँ दूसरे नेता भाषणों से काम चलाते हैं, वहाँ ट्रंप चाचा ने 280 अक्षरों में विश्व राजनीति की धुरी घुमा दी। सुबह का ट्वीट शेयर बाज़ार को ऊपर ले जाता तो शाम का नीचे पटक देता- जैसे अर्थव्यवस्था नहीं, कोई लिफ्ट हो, जिसे उँगलियों से चलाया जा रहा हो। मीडिया से उनका रिश्ता एकदम अनोखा- मीडिया बोले तो 'फेक', प्रशंसा मिले तो 'ग्रेट' और अगर सवाल पूछ लिया तो- 'डिस्ग्रेस!'

मीडियापर्सन की हालत उस विद्यार्थी जैसी, जिसे हर उत्तर के बाद यही सुनने को मिले- 'रोंग, नेक्स्ट!' फिर आया 'दीवार दर्शन'- एक ऐसी दीवार, जो सिर्फ़ ईंट-पत्थर की नहीं, बल्कि विचारों, भय और पहचान की। यह दीवार जितनी ज़मीन पर खड़ी होती, उससे कहीं ज़्यादा लोगों के मन में खड़ी हो जाती। बादल भी सोचते- 'किधर से बरसें कि वीज़ा न माँग लिया जाए!' विदेश नीति तो मानो शतरंज की बिसात, जहाँ चालें नियमों से कम और मूड से ज़्यादा तय होती रहती। कभी दोस्त को झटका, कभी दुश्मन से गलबहियाँ, कभी दोनों को एक साथ उलझा देना- यह कला हर किसी के बस की नहीं। जलवायु परिवर्तन पर उनका दृष्टिकोण भी कम रोचक नहीं। जब पूरी दुनिया तापमान घटाने की सोचती, तब ट्रंपियाना सोच कहती कि 'ठंड बढ़ रही है, ग्लोबल वॉर्मिंग कहाँ है?' प्रकृति भी शायद मुस्कुराकर सोचने लगती- 'इंसान मुझे समझने चला है और ख़ुद को ही नहीं समझ पा रहा!' एक बार तो ऐसा लगा कि सत्य और असत्य के बीच की रेखा छुट्टी पर चली गई है। जो कहा गया, वही सत्य; जो नहीं कहा गया, वह ‘फेक’। तथ्य प्रमाण से नहीं, घोषणा से तय होने लगे। सबसे अद्भुत- 'आत्मविश्वास का स्तर' इतना ऊँचा कि हिमालय भी सोच में पड़ जाए- 'भाई, मेरी ऊँचाई तो भौगोलिक है, ये तो मनोवैज्ञानिक है!'

ट्रंप साहब ने सिद्ध कर दिया कि राजनीति अब विचारधारा का नहीं, व्यक्तित्व का खेल है। यहाँ नीति कम, नाटकीयता ज़्यादा बिकती है; तर्क कम, तड़क-भड़क ज़्यादा चलती है। इस पूरे दौर में आम आदमी की स्थिति बड़ी दिलचस्प रही। वह हर सुबह अख़बार खोलकर सोचता- "आज क्या नया हुआ?" हर शाम टीवी
देखकर कहता- "अरे! यह तो कल से भी नया है!" दुनिया हँसती और चकित होती। कभी लगता- यह सब मज़ाक है और कभी लगता- यह मज़ाक ही सच है। धीरे-धीरे यह एहसास गहराने लगा कि 'ट्रंप' में जहाँ शोर, शिष्टाचार पर भारी है, जहाँ बयान, विवेक को धकेल देते हैं और सत्ता, संवाद से अधिक प्रदर्शन है।
व्यक्ति आते हैं, जाते हैं; पर उनके बनाए अंदाज़, उनके छोड़े हुए सवाल और उनके बोए हुए विचार- लंबे समय तक इतिहास के पन्नों पर फड़फड़ाते रहेंगे। ये गीत 'रहें ना रहें हम' गुनगुनाते रहेंगे। इतिहास शायद यही लिखेगा- 'एक समय था, जब लोकतंत्र में संवाद होता था फिर एक समय आया, जब संवाद 'डिस्काउंट' पर चला गया और घोषणा ‘प्राइम टाइम’ बन गई।'

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रचनाकार परिचय

फारूक आफरीदी

ईमेल : faindia2015@gmail.com

निवास : जयपुर (राजस्थान)

जन्मतिथि- 24 दिसम्बर, 1952
जन्मस्थान- जोधपुर (राजस्थान)
शिक्षा- एम० ए० (हिंदी साहित्य) जोधपुर विश्वविद्यालय (वर्तमान में जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय), स्नातकोत्तर डिप्लोमा (पत्रकारिता) राजस्थान विश्वविद्यालय
सम्प्रति- सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, राजस्थान में संयुक्त निदेशक पद से सेवानिवृत। विभागीय पत्रिका 'राजस्थान सुजस' के संस्थापक संपादक रहे। 8 वर्षों तक दैनिक 'राष्ट्रदूत' में निरन्तर अतिथि संपादक के रूप में सम्पादकीय लेखन। राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष। अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था 'काव्या' फाउण्डेशन, राजस्थान चेप्टर के महासचिव।
प्रकाशन- ’मीनमेख’ एवं ‘धन्य है आम आदमी‘ (व्यंग्य संग्रह), 'फारूक आफरीदी की चयनित व्यंग्य रचनाएँ', ‘गाँधीजी और आधी दुनिया‘, ‘हम सब एक हैं‘ (कहानी), ‘शब्द कभी बाँझ नहीं होते’ (कविता संग्रह) और 'सूचना का अधिकार' पुस्तक प्रकाशित। देश-प्रदेश की पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य सहित विविध विषयों पर 1000 से अधिक आलेख प्रकाशित। बच्चों और बड़ों के लिए कहानियाँ और कविताओं का लेखन।
सम्मान- राष्ट्रभाषा परिषद, जोधपुर द्वारा ‘राजभाषा गौरव सम्मान’, सबरंग संस्था, जयपुर द्वारा श्री गोपाल पुरोहित साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान, शबनम साहित्य परिषद, सोजत सिटी द्वारा ‘साहित्य सिद्धहस्त सम्मान’, ‘ढूँढाड री ललकार‘ समाचार पत्र द्वारा ‘ढूँढाड गौरव सम्मान’, जयपुर पीस फाउन्डेशन, जयपुर द्वारा व्यंग्य के लिए ‘सारस्वत सम्मान’, ‘काव्या’ फाउन्डेशन, यूएसए/नईदिल्ली द्वारा ‘काव्या सम्मान’, इन्द्रावती रणसिंह श्योराण फाउण्डेशन, भादरा द्वारा राष्ट्रीय साहित्य सम्मान, ’साहित्य समर्था’ पत्रिका द्वारा ‘शब्द कभी बांझ नहीं होते‘ कविता संग्रह के लिए शिक्षाविद् डॉ० पृथ्वीनाथ भान श्रेष्ठ कविता संग्रह सम्मान, पीआरएसआई, जयपुर चैप्टर द्वारा 'जनसम्पर्क गौरव अलंकरण’ एवं बैंक नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति, जयपुर द्वारा ’चन्द्र बरदाई भाषा सम्मान’, राष्ट्रीय अणुव्रत लेखक सम्मान- 2020 और साहित्यांचल रत्नाकर पाण्डेय साहित्य सम्मान- 2021
संपर्क- फारूक आफरीदी, बी-70, राज विला, प्रथम फ्लोर, प्रगतिपथ, बजाजनगर, जयपुर (राजस्थान)- 302015
मोबाइल- 94143 35772