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नीरजा हेमेन्द्र की कहानी 'टूटती, सँवरतीं औरतें'

नीरजा हेमेन्द्र की कहानी 'टूटती, सँवरतीं औरतें'

घर सँवारने- बनाने वाली महिला, अपने लिए कब जी पाती है! ख़ुद को कब सँवार पाती है! नीरजा हेमेन्द्र की यह कहानी इस प्रश्न को समझने की एक जुगत है। लड़की, विवाहिता गृहिणी तथा वृद्धा के सभी पड़ावों पर केवल और केवल घर तथा परिवारजन की ज़रूरतों को अंजाम देते हुए वह अपने आप को किस प्रकार लगभग बिसरा ही देती है, इसका अहसास ख़ुद उसे ही नहीं होता। स्त्री जाति के ऐसे त्याग हम अपने आसपास बराबर देखते हैं, पर ध्यान कहाँ जाता है उन तक! यह कहानी ध्यान ले जाती है उनकी तरफ।

"मम्मी, मैं काॅलेज जा रही हूँ।" प्रतिदिन की भाँति ख़ुशी से चहकती मेरी बेटी मीरा बाहर निकली, गैरेज से अपनी स्कूटी निकाली और फुर्र करती हुई बाहर निकल गयी। उसे जाते देख मैं मुस्करा पड़ी।

मेरे दो बच्चे हैं। एक बेटा और एक बेटी। बेटा बड़ा है, बेटी छोटी। बेटे की शिक्षा अब पूरी होने वाली है। वह नौकरी के फॉर्म भी भरने लगा है। वह चाहता है कि उसकी शिक्षा पूरी होने के साथ उसकी नौकरी भी लग जाए। इसके लिए वह प्रयास भी कर रहा है। मेरी बेटी मीरा भी इण्टरमीडिएट में थी। वो साइंस विषय के साथ पढ़ाई कर रही थी। मीरा डाॅक्टर बनना चाहती थी। उसने नीट की परीक्षा के लिए कोचिंग भी जॉइन कर लिया था। वह काॅलेज से छूटने के पश्चात सीधे कोचिंग चली जाती।

शाम को घर आकर थोड़ी देर आराम करती। पुनः पढ़ाई में लग जाती। मैं काम वाली के साथ शाम को रसोई में भोजन बना रही होती तो वह रसोई में आती और कुछ काम पूछती।
"अभी कोई काम नहीं है बेटा।" मैं कह देती।
कभी-कभी मीरा को कोई काम भी बता देती। जैसे कि पापा के लिए चार फुल्के बनाकर रख दो या कभी चाय बनाने के लिए कह देती। मैं चाहती कि मीरा थोड़े घर-गृहस्थी के भी काम सीखे। मीरा ख़ुशी-ख़ुशी मेरे बताए काम कर देती।
भोजन करने के उपरान्त दो घण्टे पढ़ने के बाद ही सोने जाती। मीरा की यही दिनचर्या थी। इतने परिश्रम का रंग तो आना ही था। मीरा इण्टरमीडिएट में उत्तीर्ण हुई। नीट की परीक्षा भी वो दे चुकी थी, जिसका परिणाम आना था। समय पर परिणाम आया। मीरा अच्छे अंको से उत्तीर्ण हुई। उसकी रैंकिंग अच्छी होने के कारण उसे पढ़ने के लिए अपने शहर का मेडिकल काॅलेज मिल गया।
मीरा बहुत ख़ुश थी। हम सब भी बहुत ख़ुश थे। मीरा अपने नये मेडिकल काॅलेज में मन लगाकर पढ़ने लगी। वह चाहती थी कि अच्छे अंको से उत्तीर्ण होकर वह प्रसूता स्त्रियों की विशेषज्ञ बने।

"मम्मी, मैं गायक्नोलाॅजी में विशेषज्ञता प्राप्त करके गाँवों में उन स्त्रियों की सेवा करना चाहती हूँ, जिन्हें प्रेगनेन्सी से लेकर बच्चे पैदा होने तक किसी प्रकार की चिकित्सीय सुविधा नहीं मिलती है या पर्याप्त नहीं मिलती है।" मीरा की बातें सुनकर मैं आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता से भर जाती।
आजकल के समय की अधिकांश युवा पीढ़ी सपने देखती है, परिश्रम करती है, सपनों को पूरा करती है, किन्तु सुविधाएँ अपने परिवार के लिए एकत्र करती है। बहुत कम बच्चे मीरा की भाँति संवेदनशील होकर ज़रूरतमंद लोगों की सेवा के बारे में सोचते हैं।
मैं ऊपर वाले से यही प्रार्थना करती कि हे! ईश्वर, मीरा को इतनी शक्ति देना कि वो अपने सपनों को पूरा कर सके। मीरा मन लगाकर परिश्रम के साथ अपनी चिकित्सा की पढ़ाई कर रही थी।

बेटा बी०टेक० करने के पश्चात नौकरी के लिए प्रयास कर रहा था किन्तु उसे अभी सफलता नहीं मिल पायी थी। नौकरी की तलाश करते-करते बेटा परेशान रहने लगा था। अब तो हाल ये हो गया था कि जब भी कोई प्रतियोगी परीक्षा देने जाता तो हमें बताता नहीं।

वो कब फार्म भरता, कब परीक्षा की तिथि होती, हमें कुछ नहीं ज्ञात होता। जिस दिन बेटा थोड़ा सुस्त-सा चेहरा लेकर घर से निकलता, उस दिन मैं जान जाती कि वो कोई परीक्षा देने जा रहा है। मैं उससे कुछ नहीं पूछती। पूछने पर वो कुछ बताता भी तो नहीं।

आज मेरा बेटा पुनः पाॅकेट में पेन और एडमिट कार्ड लेकर जाने की तैयारी कर रहा था।
"मम्मी, कुछ खाने के लिए तैयार हो तो थोड़ा-सा दे दीजिए। हो सकता है आने में समय लग जाए। न तैयार हो तो कोई बात नहीं बाहर कुछ खा लूँगा।" बेटा तैयार होने के पश्चात रसोई में मेरे पास आया और बोला।
"नहीं बेटा, नाश्ता तैयार है।" बेटे अभिनव का नाश्ता मेज पर रखते हुए मैंने कहा।
अभिनव नाश्ता करने लगा। मैं उसके पास गयी।
"बेटा किसी भी असफलता से घबराना नहीं, मैं और तुम्हारे पापा जानते है कि तुम पूरी मेहनत कर रहे हो, साथ ही यह भी कि आज के समय में नौकरी मिलना आसान नहीं है। तनाव रहित होकर नौकरी की तलाश करो। हम सब हैं तुम्हारे साथ। तुम परेशान बिलकुल न होना। कोई भी नौकरी छोटी या बड़ी नहीं होती है।" मैंने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

मेरी बात सुनकर अभिनव मुस्करा पड़ा। अभिनव परीक्षा देने चला गया। मैं जानती थी कि अभिनव की इच्छा आइ० एस० और पी० सी० एस० श्रेणी का ऑफिसर
बनने की है। वो अपनी नौकरी के फॉर्म भी वही वाले भर रहा है। मैं चाहती थी कि वो उससे कम श्रेणी की नौकरी के फार्म भी भरे और परीक्षा दे। मेरा मन कहता था कि वो अवश्य सफल होगा।

मैंने बेटे को समझाया। उसने मेरी बात समझी। कुछ अन्य नौकरियों के फार्म भरने लगा। भले ही वो नौकरियाँ उसे ख़ास पसन्द न थीं। बेटे ने थोड़ा और प्रयत्न किया। लगभग एक वर्ष के पश्चात उसे नौकरी मिली। उसकी नौकरी से मैं प्रसन्न थी। उसने हम सबकी इच्छा, अपनी आवश्यकता तथा समय की गम्भीरता, जिसमें नौकरी मिल जाना कठिन होता जा रहा था, ये सब सोचकर नौकरी जॉइन कर ली थी। यद्यपि नौकरी के लिए बेटे को बाहर जाना पड़ा किन्तु मैं संतुष्ट थी कि मेरा बेटा घर में बैठकर नौकरी तलाशता रहता था और असफल होने पर चिन्तित रहता था।

बेटा चला गया। प्रतिदिन मैं उससे फोन पर बातें कर लेती। छुट्टियों में आता तो उसे देखकर ख़ुश हो लेती। मीरा अपनी पढ़ाई में जी-जान से लगी रहती। मैं और मेरे पति दोनों बच्चों की सफलता देखकर ख़ुश थे। मैंने देखा कि मेरी बेटी मीरा बिलकुल सादगी से रहती है। उसे नये तौर-तरीके के फैशन से कुछ भी लेना-देना नहीं है।
"बेटा, दीपावली का पर्व आने वाला है। उस अवसर पर पहनने के लिए अपनी पसन्द के कुछ कपड़े और आजकल के फैशन के हिसाब से अन्य चीज़ें ले लो। पैसे घर से लेकर जाना। जो पसन्द हो, ले लेना।" दीपावली का पर्व समीप था और एक दिन मैंने मीरा से कहा।
"ले लूँगी मम्मी। अभी तो तीसरे सेमेस्टर के एक्जाम होने वाले हैं और मैं उसकी तैयारी में लगी हूँ। बहुत पढ़ना है मम्मी। फैशन-वैशन तो बाद में भी होता रहेगा।" कहकर मीरा काॅलेज के लिए निकल गयी।

दीपावली समीप आती जा रही थी। मीरा को समय नहीं मिल पा रहा था कि वो अपने लिए कपड़े आदि ले सके। मैंने ही किसी प्रकार चलते-फिरते उससे पसन्द कराकर ऑनलाइन कपड़े ऑर्डर कर दिये। एक दिन बाज़ार जाकर उसके लिए एक छोटा-सा सोने का टाॅप्स कान में पहनने के लिए लेकर आयी। मीरा कई वर्ष पुराने टाॅप्स कान में पहने थी। जो अपनी चमक खो चुके थे।
"मम्मी, इतना चमकीला-भड़कीला टाॅप्स क्यों लाईं? मैं उसे कैसे पहनूँगी?" मीरा ने टाॅप्स देखते ही कहा।
"सभी लड़कियाँ पहन रही हैं। इससे भी बड़े और डिज़ाइनर टाॅप्स और बालियाँ लड़कियाँ पहन रही हैं। तुम अब न पहनोगी तो कब पहनोगी?" मैंने मीरा को समझाते हुए कहा। बे-मन से मीरा ने वो टाॅप्स पहन लिये। मैं जानती थी कि उसने मेरी इच्छा का मान रखने के लिए ऐसा किया है।

समय किसी परिन्दे की भाँति उड़ता चला जा रहा था। बेटा महीने में एक या दो बार द्वितीय शनिवार के साथ लगे रविवार के अवकाश में घर आ पाता। वह बाहर का भोजन करता। कार्यालय से आने के पश्चात् भी उसे आराम नहीं मिल पाता था। उसकी भागदौड़ देखकर हमने उसका विवाह करने का निर्णय लिया। हमें एक रिश्ता पसन्द आया। बेटे को भी लड़की पसन्द थी। अतः छः माह के भीतर विवाह कर दिया। अभिनव का विवाह हो जाने से मैं और उसके पापा बहुत प्रसन्न थे।

बहू दो माह तक हमारे साथ रही। इन्हीं दो महीनों में वो पगफेरे के लिए एक सप्ताह तक मायके में रही। सवा महीने बाद हमारे साथ मन्दिर गयी। इन्हीं दिनों में मैंने रसोई में प्रवेश (रसोई छुआना) करा दिया। उस दिन बहू ने मेरे साथ मिलकर खीर, दाल भरी पूरियाँ, फ्राई आलू, रायता आदि बनाया। ये रस्म शीघ्र कराने का एक कारण और भी था कि बहू बेटे के साथ रहने लगे तो भोजन आदि बना सके। ये सारी रस्में बेटे की अनुपस्थिति में हुईं। क्योंकि बेटे को बार-बार अवकाश नहीं मिल रहा था कि वो यहाँ आ सके। बेटा ठीक से नौकरी कर सके, उसे समय पर घर का भोजन मिल सके, इस कारण हमने उसका विवाह किया था। अतः बहू को अपने साथ रखना उचित नहीं था।

दो माह पश्चात बेटे के साथ बहू को विदा करना पड़ा। बहू चली गयी। बहू के जाने से घर थोड़ा सूना लगने लगा। बहू मेरे साथ दिन भर रहती थी, बातें करती रहती थी। दिन कैसे व्यतीत हो जाता पता ही नहीं चलता। घर के काम भी समझ गयी थी। बहू अच्छे स्वभाव की थी। मीरा के साथ भी उसकी ख़ूब बनने लगी थी। वे दोनों ऐसी बातें करतीं, मानो बहुत पुरानी सहेलियाँ हों।

समय सचमुच जैसे पंख लगाकर किसी परिन्दे की भाँति उड़ता चला जा रहा था। लगभग एक वर्ष दो माह व्यतीत हुए थे कि बेटे को एक पुत्री का पिता बनने का सौभाग्य मिला। जो बहू प्रतिदिन फोन करती थी, उसे बच्ची की देखभाल में लगे रहने के कारण समय नहीं मिल पाता और वो कभी-कभी फोन करने लगी थी। सप्ताह में एक या दो बार। मैं उसकी विवशता समझती।
"चलिए, पोती को देखने का बहुत मन हो रहा है। किसी दिन समय निकालिए तो चलते हैं। अब तो वो पाँच माह की हो गयी है।" एक दिन मैंने अपने पति से कहा।
"अगले माह से मेरे पेपर हैं। आप लोग फिर कभी जाने का प्रोग्राम बनाइएगा।" हमारी बात सुनते ही मीरा ने कहा।
"तुम्हारे पेपर तो एक माह तक चलेंगे बेटा! मम्मी का मन पोती के पास अभी जाने का है।" मेरे पति ने मीरा को छेड़ते हुए कहा। हम सब जानते है कि मीरा पढ़ाई के साथ कभी समझौता नहीं करेगी। न हमें जाने देगी।
"तो एक माह बाद जाइएगा। मैं भी चलूँगी।" मीरा ने कहा।

एक-दो दिनों पश्चात मीरा ने हमसे कहा कि हम अभिनव के घर चले जाएँ। वो अकेली रह लेगी। किन्तु हमने मीरा के सपनों
को प्राथमिकता पर रखा और उसका पेपर ख़त्म होने की प्रतीक्षा की। मीरा को भी लेकर हम सब अभिनव के घर गये। मीरा तो छोटी बच्ची के साथ खेलने में व्यस्त हो गयी। मैं और मेरे पति अभिनव के दो कमरे के किराये के घर में घूमने लगे। घर छोटा अवश्य था किन्तु बहू ने अत्यन्त सलीके से सजा रखा था।
प्रत्येक चीज़ अपने स्थान पर व्यवस्थित थी। बहू रसोई में हम लोगों के लिए चाय आदि बनाने में लगी थी। मैं रसोई में गयी तो उसने मुझे कमरे में सबके साथ बैठने के लिए बोल दिया।
"मैं कर लूगी मम्मी जी, वहाँ तो आप लोगों की सेवा का अवसर नहीं मिला। आप दो दिनों के लिए आयी हैं तो रसोई में क्यों लगेंगी?" बहू ने प्यार से कहा।
बहू की बात सुनकर मैंने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा।
"नहीं बेटा, बैठे-बैठे मैं सब्जी काट दूँगी, भोजन लगवा दूँगी तो मुझ पर काम का बोझ थोड़े ना बढ़ जाएगा? ये भी तो घर है। घर में तो काम करना ही चाहिए।" मैंने कहा।
हम सबको चाय देने के पश्चात बहू बच्ची को दूध पिलाने लगी। इस बीच मैंने बहू को देखा, अभी तक उसने न बाल सँवारे थे, न ढंग से चेहरे पर कोई मेकअप नाम की चीज़ थी। चेहरे पर भी उसके थोड़ी थकान थी। विवाह के समय बहू कितनी आकर्षक, सुन्दर और युवा दिखती थी। दो वर्ष में ही इसे क्या हो गया? निस्तेज चेहरा और उम्र जैसे दो वर्ष के स्थान पर चार वर्ष आगे बढ़ गयी हो। बच्ची को दूध पिलाकर उसे नीचे बिछी दरी पर बैठाकर सीधे रसोई में
भागी।

बच्ची को मीरा ने गोद में उठा लिया और उसके साथ खेलने लगी। बच्ची भी मीरा से कुछ-कुछ घुलमिल गयी थी। बच्ची मीरा
की गोद में आते ही हँसने लगी। मैं रसोई में चली गयी। बहू आटा गूँथ रही थी।
"बहू, रोटियाँ मैं बना लूँगी। तुम कंघी करके तैयार हो जाओ।" बहू से मैंने कहा।
"जी मम्मी, कर लूँगी। रोटियाँ भी बना लूँगी। सुबह बच्ची सो रही थी तो नहाने वाशरूम चली गयी। स्नान करके आयी तो ये
उठ चुकी थी। उसके बाद तो इसको देखना रहता है। तबसे समय ही नहीं मिला। अभी सो जाएगी तो कर लूँगी।" बहू ने
कहा।
"नहीं, आटा गूँथने के बाद पहले तुम कंघी करके तैयार होने जाओ।" मैंने बहू से पुनः कहा।
बहू अपने कक्ष में चली गयी।

इधर मैं रोटियाँ बना ही रही थी कि बहू कंघी करके आ गयी।
"ये क्या? अपने कपड़े नहीं चेंज किये? जाओ कपड़े चेंज करो और लिपिस्टिक भी लगाकर आओ।" मैंने बहू को सिर्फ कंघी
कर रसोई में देखा तो कहा। वो रोटियाँ बनाने के लिए शीघ्र कंघी करके रसोई में आ गयी थी।
"आप रहने दीजिए माँ जी, रोटियाँ मैं सेंकती हूँ।" बहू ने कहा।
"पहले तुम जाओ कपड़े चेंज करके आओ। ये सब कपड़े काम वाली को दे दो। दिन में अच्छे कपड़े पहना करो।" मैंने बहू से
कहा।
"मैंने काम वाली तो लगाया नहीं है।.....अतः मुझे ही पहनना पड़ेगा।" कहते हुए बहू वापस अपने कक्ष में चली गयी।
बहू की बात सुनकर मैंने मीरा से बहू के नाप के चार-पाँच सेट कपड़े ऑनलाइन ऑर्डर करने के लिए कहा। मीरा के पापा
से उन कपड़ों के पैसे भी पेमेन्ट करवा दिये थे। हमारे जाने के बाद वो कपड़े बेटे के घर के पते पर आ जाएँगे।

"बेटा, मैंने बहू के लिए एक-दो कपड़े तुम्हारे पते पर ऑर्डर करवा दिये हैं। पैसे पे हो गये हैं।" मैंने बेटे को बता दिया ताकि
वो बहू से बता दे। बहू घर में रहती है तो वो बिना चकित हुए दिन में कपड़ों की डिलीवरी ले सके।
"मम्मी, उसके पास कपड़े हैं तो। बच्ची छोटी है न, इस कारण समय नहीं मिल पाता। बच्ची की देखभाल के अतिरिक्त घर के
सारे काम भी उसे ही करने रहते हैं। यहाँ काम वाली बहुत मुश्किल से मिलती है। एकाध बार लगाया किन्तु बहाना बनाकर
काम छोड़कर चली गयीं। मैं उससे कह दूँगा। कपड़े ले लेगी।" बेटे ने कहा।

दो दिन बेटे के घर रुककर हम सब घर आ गये। जीवन उसी दिनचर्या पर चल पड़ा। कभी-कभी बहू का फोन आना। मीरा का
काॅलेज जाना। शेष समय भी पढ़ाई करना। काॅलेज जाना, पढ़ना। इसके अतिरिक्त और कुछ न सोचना। तीज-त्योहार में कपड़े-गहने पहनने पर कहती कि पढ़ाई कर लूँ। फिर सब कुछ करूँगी।

इस वर्ष मीरा के मेडिकल का अन्तिम वर्ष था। उसका सपना पूरा हो जाएगा। वो चिकित्सक बनकर निर्धन स्त्रियों की सेवा का अपना लक्ष्य पूरा करेगी। मीरा अपना काम मन लगाकर कर रही थी। घूमना-फिरना, सजना-सँवरना सब कुछ वह विवाह के पश्चात् करने के लिए कहती। वह हमेशा कहती कि सजने-सँवरने के लिए सारी उम्र पड़ी है। अभी ये उम्र पढ़ने कर कुछ बन जाने की है। मैं वही करूँगी। उसकी बातें सुनकर मैं प्रसन्न हो जाती और सोचती कि मीरा उचित कह रही है। देखते-देखते पाँच वर्ष व्यतीत हो गये। आज मीरा का मेडिकल का कोर्स पूरा हो गया। इस दिन के लिए पाँच वर्षों तक मेरी बेटी ने कठिन तप किया है। आज उसे व अन्य बच्चों को डाॅक्टर बन जाने का प्रमाण पत्र मिलने वाला है।

इस अवसर के लिए उसके काॅलेज में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया है, जिसमें विशिष्ट व्यक्ति मुख्य अतिथि के रूप में बुलाये गये हैं। सभी बच्चों के माता-पिता को भी आमंत्रित किया गया है। मुख्य हाॅल, जिसमें यह कार्यक्रम होगा, उसे आकर्षक ढंग से सजाया गया है। मैंने और मीरा के पापा ने भी इस अवसर पर पहनने के लिए एक अच्छी ड्रेस निकालकर रख ली है। मीरा हमसे थोड़ा पहले चली गयी है। जाते-जाते मुझे और अपने पापा को समय से पहुँच जाने की हिदायत भी दे गयी है। मैंने और मीरा के पापा ने जाने की तैयारी कर ली। घर बंद कर हम निकलने वाले ही थे कि बेटे अभिनव का फोन आ गया। कुशल क्षेम का आदान-प्रदान होने के बाद मेरे पति ने बच्ची के बारे में पूछा। अभिनव ने बताया सब ठीक है। साथ ही यह भी कि मम्मी को दो-चार दिनों के लिए भेज दीजिए। बहू की तबीयत आजकल थोड़ी ठीक नहीं रहती है। साथ ही यह भी कि यदि मम्मी को आने में कोई समस्या है तो मैं सरोज (बहू का नाम) को बच्ची के साथ भेज दूँगा। मैं यहाँ किसी प्रकार काम चला लूँगा। कारण पूछने पर अभिनव ने बताया बहू माँ बनने वाली है। कुछ दिन हमारे साथ रह लेगी तो उसका मन चेंज हो जाएगा। वो थोड़ी घबराई हुई है कि कैसे सब कुछ होगा?

मैंने अभिनव से कह दिया कि बहू को यहाँ छोड़ जाओ। हवा-पानी, शहर बदल जाएगा तो और अच्छा रहेगा। दो-तीन दिनों में बहू को छोड़ने की बात कह कर अभिनव ने फोन रख दिया। हम भी मीरा के काॅलेज जाने के लिए निकल पड़े। भव्य समारोह में देश के भावी डाॅक्टरों को सर्टिफिकेट दिये गये। मेरी बेटी मीरा भी देश के डोक्टरों में शुमार हो गयी थी। उसकी शिक्षा पूरी हो चुकी थी। हम प्रसन्न मन से घर आये। मीरा के चेहरे पर ख़ुशी छलक रही थी।
"मम्मी, आज आप लोगों के लिए चाय मैं बनाऊँगी।" चेंज करके फ्रैश होने के पश्चात मीरा ने कहा।
"ठीक है बनाओ। चाय तो तुम बनाती ही रहती हो। ये पहली बार तो नहीं है। आज तुम भोजन बनाओ।" मीरा के पापा ने उसे छेड़ते हुए कहा।
"पापा, आज मैं थोड़ी थक गई हूँ। सुबह से काॅलेज में थी। आज मम्मी की सहायता कर दूँगी। कल सुबह पूरा नाश्ता बनाऊँगी।" मीरा ने कहा।
"नाश्ता नही लंच।" मीरा के पापा ने पुनः उसे छेड़ते हुए कहा।
"ठीक है पापा। नाश्ता और लंच दोनों बनाएगी आपकी बेटी। मेन्यू बताइए। क्या खाएँगे?" मीरा ने भी पापा को थोड़ा चिढ़ाते हुए कहा। वो जानती थी कि मेरी सहायता के बिना उसे ठीक से पूरा भोजन बनाना नहीं आता।

अगले दिन मैंने मीरा को बताया कि तेरी भाभी दो-चार दिनों के लिए आने वाली है। तुम फिर से बुआ बनने वाली हो। मेरी बात सुनकर मीरा बहुत ख़ुश थी। उसने भाई को फोन मिलाया। उसे बधाई दी तथा भाभी को शीघ्र लेकर आने के लिए कहा।
"छोटी कितनी बड़ी हो गयी होगी मम्मी?" मीरा ने पूछा।
"दो वर्ष की। उसका नाम तुम्हारे पापा ने चाँदनी रखा है।" मैंने कहा।
"पता है मम्मी, वो छोटी है न, इसलिए उसे छोटी कहने में मुझे अच्छा लगता है। मेरे लिए वो छोटी ही है।" मीरा के चेहरे पर असीम वात्सल्य छलक रहा था चाँदनी के लिए। मुझे अच्छा लगा।
भोजन करके मीरा अपने कमरे में सोने चली गयी। मैं और मेरे पति बालकनी में बैठे थे।
"मीरा की शिक्षा पूरी हो गयी है। अब वो अपनी नौकरी ढूँढ़ती रहेगी। हमें उसके विवाह के लिए अच्छे लड़के की तलाश शुरू कर देनी चाहिए।" मैंने अपने पति से कहा।
"हाँ, हमारी बेटी डाॅक्टर है। उसके लिए योग्य वर ढूँढ़ने में हमें कोई परेशानी नहीं होगी।" मेरे पति ने कहा।

मेरे पति ने उसी समय फोन उठाकर अपने कुछ मित्रों को फोन कर डाला। उन्होंने सबको बताया कि मीरा डाॅक्टर हो गयी है। अब वो उसका विवाह कर देना चाहते हैं। यह कहते हुए उनके चेहरे की ख़ुशी देखते बन रही थी। उहोंने यह भी बताया कि उसके लिए वो कोई अधिकारी या डाॅक्टर लड़का ही चाहते हैं, जो अच्छे परिवार से हो।
"चलो, ये बात तो हो गयी। मीरा के लिए कोई न कोई योग्य लड़का मिल ही जाएगा। हम अपनी तैयारी करते रहे। गहने-कपड़े आदि थोड़े-थोड़े मीरा की पसन्द से ले लिए जाएँ। एकदम से ख़रीदने में कठिनाई होगी। उस समय बहुत सारे काम रहते हैं।" मैंने अपने पति से कहा।
"हाँ.....हाँ, तुम अपना काम करो। थोड़ी-थोड़ी चीजें ख़रीदती रहो। तैयारी करती रहो। जब आवश्यकता हो पैसे ले लिया करो।" मेरे पति ने कहा।

दो दिन हमारे हँसी-खुशी से व्यतीत हो गये। तीसरे दिन हमारी ख़ुशियों को बढ़ाने के लिए बेटा-बहू और पोती आ गये। पोती मीरा के साथ ख़ूब घुलमिल कर खेलने लगी।
"मम्मी, तुम इसे थोड़ा समझा कर हिम्मत दे दो, बहुत घबरा रही है। कह रही है कि अभी चाँदनी छोटी है। अब एक और आ जाएगा। दो-दो बच्चों को कैसे सम्हालेगी?" भोजन करने के उपरान्त हम सब एक साथ ड्राइंगरूम में बैठे तो बेटे ने कहा।
"घबराने की कौनसी बात है बेटा? चाँदनी के साथ वो भी बच्चा बड़ा हो जाएगा। एक साथ दोनों पल जाएँगे। थोड़ा-सा काम बढ़ जाएगा। किन्तु सब अच्छा होगा।" मैंने बहू को समझाते हुए कहा।

मीरा का मेडिकल का कोर्स पूरा हो जाने पर सब ख़ुश थे। अभिनव तो बार-बार कह रहा था कि मीरा ने इसके लिए कठिन परिश्रम किया है। आज डाॅक्टर बन गयी है। इस बात का उसे बहुत गर्व है।
"भाभी, अब आपके घर में जच्चा-बच्चा वाली डाॅक्टर है। आपको चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है।" मीरा की बात सुनकर सब ठहाका मारकर हँस पड़े।
"भाभी, अब मैं ये बात सीरियसली बता रही हूँ कि आपको अब अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए। पौष्टिक भोजन लीजिए, जिसमें दूध दोनों समय आवश्यक है। बहुत कमज़ोर लग रही हैं। आप चेकअप करवाइए। खून की कमी न होने पाए। आयरन की अतिरिक्त दवाएँ डाॅक्टर से पूछ कर लीजिए।" मीरा ने कहा।
मीरा की बात सुनकर मैंने बहू की ओर देखा। कितना मुरझाया चेहरा था। आँखों के नीचे हल्के गड्ढे बनने लगे थे। बहू ने ये कैसी दशा बना रखी है। ससुराल आयी है फिर भी कितना सादा और थोड़ा पुराना-सा कपड़ा पहना है।

मुझे वो दिन स्मरण हो आये, जब अभिनव के विवाह के लिए हम बहू को देखने गये थे। एक अच्छे भरे-पूरे परिवार की लड़की थी। उस समय कितनी आकर्षक थी। उसके पविार में किसी प्रकार की कमी नहीं थी। बहू पढ़ी-लिखी भी है किन्तु उसने नौकरी करने के लिए कभी दबाव नहीं बनाया। वह अपना घर सम्हालने में लग गयी तो पूरी तरह आपने आपको घर गृहस्थी में ही समर्पित कर दिया। बहू थोड़ा अपने स्वास्थ्य, आराम, पहनने-ओढ़ने पर भी ध्यान दो। मेरी बात सुनकर बहू कहती है कि बच्चे बड़े हो जाएँ तब सब कुछ करूँगी। हम लोग बेटे से हमेशा पूछते रहते हैं कि उसे पैसों की कोई परेशानी तो नहीं है। हम सब उससे आर्थिक सहायता करने के लिए पूछते रहते हैं। करते भी हैं। तीज-त्योहार, बहू-बेटे के जनमदिवस, अब तो पोती के जनमदिवस पर भी हम उन्हें उपहार
स्वरूप इतने पैसे भेज देते हैं, जिससे वे जनमदिवस तो मना ही लें। पैसे बच जाएँ तो घर की कोई आवश्यकता भी पूरी कर लें।

बहू का स्वास्थ्य और रहन-सहन देखकर मुझे चिन्ता होने लगी। मुझे अपने विवाह से पूर्व से लेकर विवाह के बाद के दिन स्मरण हो आये। सब कुछ ऐसा ही तो था। विवाह से पूर्व मैं भी दुबली-पतली, स्मार्ट हुआ करती थी। उस समय के अनुसार मैंने बी० ए० उत्तीर्ण कर लिया था, जो एक साधारण नौकरी अर्थात अध्यापिका, किसी कार्यालय में क्लर्क आदि की नौकरी के लिए पर्याप्त थी।

मैं घर-गृहस्थी, बच्चों में ऐसा फँसी कि नौकरी तो छोड़ो, अपने स्वस्थ्य का भी ध्यान नहीं आया। मेरा बढ़ता वजन सबको दिखता किन्तु मेरे पति को नहीं, न मुझे। बच्चे बड़े हो गये तो एक बार मैंने अपना वजन कम करने की सोची। मैंने भोजन कम किया, सुबह उठकर टहलना प्रारम्भ किया। मेरा बढ़ता वजन ग्राम भर भी कम न हुआ। उल्टा मेरे घुटनों में दर्द रहने लगा। कुछ माह पश्चात शरीर में शुगर भी आ गयी। यह सब भोजन में पर्याप्त विटामिन आदि की कमी के कारण
हुआ।

अब पौष्टिक चीजें खाती हूँ। डाॅक्टर के बताने से कैल्शियम का टैबलेट लेती हूँ। किन्तु कहते हैं न कि एक बार दूध फट जाए तो कुछ भी कर लो, वापस दूध नहीं होता। मेरे घुटने जैसे थे, वैसे ही हैं। अधिक चलने से इनकार कर देते हैं। वजन अवश्य थोड़ा कम हुआ है किन्तु इतना नहीं कि कोई फिट कहे। यही सोचकर मैं बहू के लिए चिन्तित हूँ।

मीरा को मैंने बता दिया कि मैं और उसके पापा उसके विवाह के लिए वर देख रहे हैं। साथ ही विवाह की तैयारी कर रहे हैं।
"नहीं मम्मी, अभी नहीं। अभी मैं पी० जी० करूँगी। उसके बाद विवाह करूँगी। दो वर्ष लगेंगे मुझे पी० जी० करने में। उसके लिए मैंने फॉर्म डाल दिया है। मुझे उम्मीद है कि स्पेशलाइजेशन में मुझे अपना मनचाहा स्त्री रोग विषय मिल जाएगा।
"तो तू अभी पढ़ेगी?" मैने मीरा से पूछा।
"मम्मी, उसकी इच्छा है तो पढ़ने दीजिए। विवाह तो एक दिन हो ही जाएगा। पढ़ने की उम्र बार-बार नहीं आती।" मीरा के समर्थन में उसकी भाभी आ गयी।
"उसकी मेडिकल की शिक्षा पूरी हो जाएगी तो आप लोगों को बहुत दौड़-भाग करने की आवश्यकता नहीं होगी। लड़के वाले स्वयं आपके दरवाज़े पर आएँगे।" मीरा का भाई बोल पड़ा।
"ठीक है बेटा, जो फीस आदि की आवश्यकता होगी, वो पापा से बता देना। पढ़ो मेरी बच्ची, आगे बढ़ो।" मैंने कहा।

दोपहर का भोजन कर सब अपने-अपने कक्ष में आरम करने चले। मैं भी अपने कक्ष में जाकर लेट गयी और सोचने लगी कि इस समय मीरा अवश्य पढ़ रही होगी। उसे अब पी० जी० की तैयारी करनी है। तो मीरा का जीवन क्या मेरे और बहू के जीवन से अलग होगा? आत्मनिर्भरता आवश्यक है। उसकी सेवा भावना भी अन्य लड़कियों से उसे अलग मुकाम पर रखती है।
किन्तु पारिवारिक दायित्वों को एक स्त्री पति या किसी नौकर, नौकरानियों के भरोसे पर छोड़ सकती है? नही? तो मीरा ने शिक्षा पूरी करके विवाह के पश्चात अपनी इच्छा से जीवन जीने का निर्णय लिया है। वो इच्छा मेरी बेटी पूरी कर पाएगी या नये जीवन के नये उत्तरदायित्वों को सम्हालने में व्यस्त हो जाएगी?
मेरी ये सोच ग़लत भी हो सकती है। मीरा अपना मनचाहा काम करेगी और अपनी इच्छा से जीवन जीएगी तो अवश्य ख़ुश व संतुष्ट रहेगी। उतार-चढ़ाव सभी के जीवन में आता है। आत्मनिर्भर लड़की उन समस्याओं का डटकर सामना कर सकती है। पढ़ने का यही लाभ है। अपनी सोच से मैं संतुष्ट हो गयी।

मैं इसी सोच में यूँ ही लेटी रही। मेरी चिन्ता दूर होती जा रही थी कि रसोई से बर्तन खड़कने की आवाज़ आयी। कदाचित बहू थी। ओह! छः बज गये। मुझे एक झपकी तक नहीं आयी। यह मेरे चाय पीने का समय है। बहू को पता है इसलिए उठकर वह रसोई में चाय बनाने चली गयी है।
"माँ जी, चाय बन गयी है।" कमरे में आकर बहू ने मुस्कराते हुए कहा।
"आती हूँ बेटा।" मैंने कहा।

डायनिंग मेज की ओर जाते हुए मेरे मन में यह प्रश्न उठने लगा कि क्या स्त्रियों का जीवन ऐसा ही होता है? वो पूरी उम्र टूटती हैं, सँवरती हैं.....बस!

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रचनाकार परिचय

नीरजा हेमेन्द्र

ईमेल : neerjahemendra@gmail.com

निवास : लखनऊ (उत्तरप्रदेश)

शिक्षा- एम०ए० (हिन्दी साहित्य), बी०एड
संप्रति- अध्यापन
प्रकाशन- कहानी संग्रह- 'बियाबानों के जंगल', 'धूप भरे दिन', 'मुट्ठी भर इच्छाएँ', 'माटी में उगते शब्द (ग्रामीण परिवेश की कहानियाँ), 'जी हाँ, मैं लेखिका हूँ', 'अमलतास के फूल', 'पत्तों पर ठहरी ओस की बूँदें' (प्रेम कहानियाँ), '....और एक दिन'। आत्मकथा- 'पथरीली पगडंडियों का सफ़र'। उपन्यास- 'अपने-अपने इन्द्रधनुष ', 'उन्हीं रास्तों से गुज़रते हुए'। ललई भाई (एक राजनैतिक गाथा)। कविता संग्रह- 'मेघ, मानसून और मन', 'ढूँढ कर लाओं ज़िंदगी', 'बारिश और भूमि', 'स्वप्न'।
हिंदी की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ, बाल सुलभ रचनाएँ एवं सम सामयिक विषयों पर लेख प्रकाशित। रचनाएँ आकाशवाणी व दूरदर्शन से भी प्रसारित। हिंदी समय, विश्व गद्य कोश, विश्व कविता कोश, मातृभारती, प्रतिलिपि, हस्ताक्षर, स्त्रीकाल, पुरवाई, साहित्य कुंज, रचनाकार, हिंदी काव्य संकलन, साहित्य हंट, न्यूज बताओ डॉट कॉम, हस्तक्षेप, नूतन कहानियाँ आदि वेब साईट्स एवं वेब पत्रिकाओं में भी रचनाएँ प्रकाशित।
सम्मान- उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा प्रदत्त विजयदेव नारायण साही नामित पुरस्कार, शिंगलू स्मृति सम्मान। फणीश्वरनाथ रेणु स्मृति सम्मान। कमलेश्वर कथा सम्मान। लोकमत पुरस्कार। सेवक साहित्यश्री सम्मान। हाशिये की आवाज़ कथा सम्मान। कथा साहित्य विभूषण सम्मान। अनन्य हिंदी सहयोगी सम्मान आदि।
पता- 'नीरजालय', 510/75, न्यू हैदराबाद, लखनऊ (उत्तरप्रदेश)- 226007
मोबाइल- 9450362276