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स्मृतियों में बसी एक कला वीथिका- अशोक भौमिक

स्मृतियों में बसी एक कला वीथिका- अशोक भौमिक

मुम्बई के सबसे लोकप्रिय डेस्टिनेशन्स में से एक है– जहाँगीर आर्ट गैलरी। सात-आठ सालों के लंबे इंतज़ार के बाद चित्रकारों को यहाँ एग्जिबिशन के मौक़े मिलते हैं। अशोक भौमिक के इस नायाब संस्मरण की पृष्ठभूमि में यही कला-गैलरी है। गहरी मानवीय संवेदना से संपृक्त इस स्मृति आख्यान में हमारी दुनिया के छल और विश्वासघात की ऐसी तस्वीरें हैं, जो पाठक को स्तब्ध कर जाती हैं।

- गंगाशरण सिंह

सन 1977!
मुझे आज़मगढ़ में रहते तब दो-तीन साल बीत चुके थे। मुंबई तब न तो मुंबई बना था और न मद्रास चेन्नई! पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक बहुत बड़ी आबादी काम-काज के सिलसिले में मुंबई में बस चुकी थी। मुंबई में काली-पीली टैक्सी चलाने वालों से लेकर मिलों में काम करने वाले मज़दूरों तक और साथ ही न जाने कितने छोटे-बड़े कामों में आज़मगढ़, जौनपुर, प्रतापगढ़, फ़ैज़ाबाद आदि ज़िलों के लोग लगे थे।

उन दिनों दिल्ली और बम्बई की कला गतिविधियों के बारे में अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से जानकारियाँ मिलती रहती थीं। लखनऊ, कानपुर में रहते हुए भी मैं न केवल मक़बूल फ़िदा हुसैन और उनके घोड़ों से परिचित था बल्कि ‘धर्मयुग’ और ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ के ज़रिये नए-पुराने चित्रकारों के काम के बारे में भी जानकारियाँ मिलती रहती थीं। इन्हीं सूचनाओं के साथ जहाँगीर आर्ट गैलरी का ज़िक्र भी अक्सर होता था। मेरे जैसे चित्रकारों की हसरत में यह गैलरी किसी तीर्थ से कम नहीं थी। 1977 में मुझे जब बम्बई जाने का मौक़ा मिला तो जहाँगीर आर्ट गैलरी का आकर्षण मेरे लिए सबसे बड़ा था।
इस गैलरी के इतिहास के बारे में मुझे ज़्यादा जानकारी नहीं थी। गैलरी की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए किसी बोर्ड पर लिखे विवरण से बस इतना ही जानता था कि सर कवासजी जहाँगीर ने 1952 में इस गैलरी की स्थापना की थी।

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शायद जून का महीना था। कई दिनों तक लगातार बारिश के बाद खुलकर धूप निकली थी! मुंबई के आम लोग, बारिश के बाद निकलने वाली इस धूप के लिए न तो छाता तानते हैं और न ही काला चश्मा चढ़ाते हैं, वे बस चलना जानते हैं। उनकी नज़र केवल मंज़िल पर होती है; सफ़र और उसमें आने वाली दिक़्क़तें उन्हें ज़्यादा परेशान नहीं करतीं। लेकिन, मेरे जैसे पुरबिया भैया के लिए यह थोड़ा अजीब-सा अनुभव ज़रूर था, जिसने इसके पहले न कभी ऐसी चौंधियाती धूप की तपन महसूस की थी और न ही उसे बसों और लोकल ट्रेनों में सवार भीड़ में पसीजने का मौक़ा मिला था।

मुझे याद है, हड़बड़ाहट में उस दिन मैं फ़्लोरा फाउंटेन पर ही बस से उतर गया था। फ्लोरा फाउंटेन से पैदल चलते हुए जहाँगीर आर्ट गैलरी पहुँचा तो पसीने से तरबतर था। उन दिनों फ़्लोरा फाउंटेन से काला घोड़ा के बीच के फुटपाथों पर विदेशी सामान बेचने वालों की अस्थायी दुकानों की कतारें होती थीं, जिसके चलते राहगीरों के लिए बहुत कम जगह बच पाती थी। इन्हीं के बीच धक्के खाते हुए मैं अंततः जहाँगीर गैलरी पहुँचा था।

जहाँगीर आर्ट गैलरी के अंदर की ठंडी छाँव ने पल भर में बाहर की धूप, गर्मी, भीड़, पसीने और शोर सब कुछ भुला दिया था। गैलरी के चौकीदार ने दरवाज़ा खोलकर झाड़ू-पोछा अभी-अभी ख़त्म किया ही था। हवाओं में फिनाइल की महक धीरे-धीरे कम हो रही थी। गैलरी के अंदर दाख़िल होते ही पता चला कि ऑडिटोरियम हॉल में एक युवा फ़ोटोग्राफ़र की प्रदर्शनी चल रही है। दीवार पर बहुत ही क़रीने से एक कतार में फ़ोटोग्राफ़्स प्रदर्शित थे। इसके पहले मैंने कभी किसी गैलरी में इतने सुन्दर ढंग से फ़ोटोग्राफ़्स को प्रदर्शित होते नहीं देखा था। बड़े आकार के ये सारे फ़ोटोग्राफ़्स केवल काले-सफ़ेद रंगों में थे। एक चित्र में कोहरे में डूबी एक ईसाई क़ब्रगाह दिख रही थी, जहाँ क़ब्रों की कतारें, प्रार्थना में खड़े स्कूली बच्चों की कतार जैसी लग रही थी। इसी के पास एक अद्भुत चित्र था– एक क़ब्र से सटी छोटी-छोटी कोमल घास फूलों पर मंडराती एक तितली ने अभी-अभी मानो इस चित्र की ख़ामोशी तोड़ी हो। एक और चित्र में एक क़ब्र के सिरहाने लगे सलीब की परछाई उसके पास की क़ब्र पर पड़ रही थी। एक क़ब्र के सफ़ेद पत्थर पर, पड़ोसी क़ब्र की सलीब की घनी काली परछाई मानो दबी आवाज़ में उन दोनों क़ब्रों के रिश्तों को बयान कर रही थी। ऐसे ही न जाने कितने फ़ोटोग्राफ़्स थे, जिन्हें देखते हुए आप अपने आसपास का सब-कुछ भूल ही नहीं जाते थे बल्कि धीरे-धीरे ख़ुद को एक नई ख़ामोश दुनिया में दाख़िल होते पाते थे।

मैं, पत्र-पत्रिकाओं में छपे फोटोग्राफ़्स देखते हुए बड़ा हुआ था। कानपुर में, घर के क़रीब एक लाइब्रेरी में 'लाइफ' पत्रिका मिली थी, जिसमें विएतनाम युद्ध और बर्लिन की दीवार के अनेक मर्मस्पर्शी काले-सफ़ेद फ़ोटोफ़ीचर्स देखे थे। हालाँकि जहाँगीर आर्ट गैलरी के ऑडिटोरियम हॉल के एकांत में इन फ़ोटोग्राफ़्स को देखना मेरे लिए एक बिलकुल नया अनुभव था। एक चित्र को देखते हुए मुझे लगा कि मैं किस सुदूर इलाके में आ खड़ा हुआ हूँ, जहाँ मेरे आसपास कहीं कुछ भी नहीं है- शायद मैं भी नहीं हूँ वहाँ!

एक छोटी-सी क़ब्र पर एक लड़की का नाम लिखा है– 'आवर स्वीट स्वीट- स्वीटी !' हमारी प्यारी-प्यारी स्वीटी! इस नाम के नीचे लिखे ‘1962-1969’ से पता चलता है कि वह बस सात साल ही इस दुनिया में रही थी। कोई इस क़ब्र के ऊपर, क़ब्र के सिरहाने के पत्थर से टिकाकर छोटी-सी गुड़िया रख गया है। फ़ोटोग्राफ़ हालाँकि काले-सफ़ेद रंगों में था लेकिन मुझे उस गुड़िया के फ़्रॉक का बेबी पिंक रंग दिख रहा था। मैं प्लास्टिक से बने उसके गुलाबी नरम शरीर के भीतर उसके नन्हे-से दिल की धड़कनें सुन पा रहा था। मुझे लगा कि यह गुड़िया ही स्वीटी थी, जो एकांत में बैठी वर्षों से एक फ़ोटोग्राफ़र का इंतज़ार कर रही थी। मुझे लगा कि उसकी आँखें खुली ज़रूर थीं, लेकिन वे मुझे या अन्य कुछ भी देख नहीं रही थीं। मैं बहुत देर तक इस फ़ोटोग्राफ़ को देखता रहा था और रह-रहकर उस अपरिचित फ़ोटोग्राफ़र की संवेदनशीलता और उसके कलात्मक नज़रिये की मन ही मन तारीफ़ करता रहा था। आज, इतने वर्षों बाद भी मुझे यह चित्र याद है, आज भी वह फ़ोटोग्राफ़र याद है। मेरी उपस्थिति की पूरी तरह से उपेक्षा करती गुड़िया की दोनों आँखें भी मुझे याद रहती हैं।

जहाँगीर आर्ट गैलरी से मेरी पहली मुलाक़ात यूँ ही ख़त्म नहीं होनी थी। प्रदर्शनी के चित्रों को देखता हुआ न जाने कब मैं प्रदर्शनी के अंतिम चित्र तक पहुँच गया था। गालों पर बेतरतीब हल्की दाढ़ी और होठों पर मुस्कान लिए बीस-इक्कीस साल के एक नौजवान की एक जोड़ी चमकती आँखें मेरी ओर देख रही थीं। यह फ़ोटोग्राफ़, प्रदर्शनी के अन्य फ़ोटोग्राफ़्स की ही तरह फ्रेम में जड़ा था। उसका आकार भी ठीक अन्य फ़ोटोग्राफ़्स जैसा ही था, लिहाज़ा मुझे लगा कि यह इस प्रदर्शनी का ही हिस्सा था लेकिन, इस फ़ोटोग्राफ़ से सटे एक सफ़ेद बोर्ड पर लिखे इन शब्दों ने मेरा भ्रम दूर किया– "नहीं, ये फ़ोटोग्राफ़ मेरा खींचा नहीं है। इसे मेरी सबसे प्यारी दोस्त सुनयना ने उस दिन खींचा था जिस दिन मैंने उन्नीस की दहलीज़ पार की थी। कैसी लगी आपको मेरी प्रदर्शनी? यह सच है कि मैं अब आपका उत्तर सुनने के लिए आपके क़रीब नहीं हूँ, लेकिन अगर सुनयना मिले तो उसे अपनी राय ज़रूर बताइएगा। उसे अच्छा लगेगा!"

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मेरी एक ही ख़्वाहिश थी कि अपने फ़ोटोग्राफ़्स की एक प्रदर्शनी करूँ। फ़ोटोग्राफ़ी के मेरे गुरु और मार्गदर्शक, टॉमस सर ने मुझे हतोत्साहित करते हुए समझाया था– "अभी तो तुम्हें बहुत कुछ सीखना है, भला इस उम्र में कैसे कोई एकल प्रदर्शनी लगाने की हिम्मत कर सकता है? वक़्त आएगा तो मैं ख़ुद जहाँगीर में तुम्हारी प्रदर्शनी लगाऊँगा।"
"लेकिन सर, मेरे पास वक़्त कहाँ था!"

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सुनयना ने दिल से चाहा था कि मैं अपनी पहली प्रदर्शनी देखकर ही जाऊँ और उसने कोशिश भी ख़ूब की थी, डॉक्टरों को भी बहुत परेशान किया था, लेकिन जब मुझे लगा कि सब कुछ रहेगा यहाँ, बस मैं ही नहीं होऊँगा तो मैंने अपने-आप से कहा : तुमने तो देख ही ली अपनी प्रदर्शनी। अब और लोग भी देखें!

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मैंने आपके लिए ही इन पंक्तियों को लिखा है।
अगर आपको इस प्रदर्शनी में कोई कमी नज़र आये तो उसकी ज़िम्मेदारी मेरी है।
लेकिन, अगर आपको प्रदर्शनी अच्छी लगे तो उसका पूरा श्रेय सुनयना को जाता है।

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शुक्रिया सुनयना, तुम ख़ुश रहना!

तुम्हारा,
नवाज़िश मिस्त्री

1977 को गुज़रे अब लगभग आधी सदी बीत चुकी है। नवाज़िश मिस्त्री की फ़ोटोग्राफ़ी के साथ ही उसकी अंग्रेज़ी भी बहुत अच्छी थी। उसने सुनयना से प्रेम किया था, इसलिए अनुमान लगा सकता हूँ कि वह कविता भी लिखता रहा होगा। इतने दिनों बाद जाहिर है कि मुझे दिल को छलनी कर जाने वाले उसके वाक्य हू-ब-हू तो याद नहीं हैं लेकिन उनका मर्म ज़रूर याद है। नवाज़िश ने अपने फ़ोटोग्राफ़्स के माध्यम से जो कहना चाहा था, अपने दिल से निकले जिन शब्दों को अपने पीछे हमारे लिए छोड़ गया था, उसे भूल पाना कभी संभव नहीं!

इसके बहुत दिनों बाद, 'मोनालिसा हँस रही थी' लिखने नग्गर गया हुआ था। उपन्यास में एक जगह जहाँगीर आर्ट गैलरी की एक फ़ोटोग्राफ़ी प्रदर्शनी का ज़िक्र है। उस दिन पहाड़ों के बीच बने नग्गर के फॉरेस्ट रेस्ट हाउस में बैठकर नवाज़िश की बहुत याद आई थी। उपन्यास में तो ज़्यादा कुछ लिख नहीं सका लेकिन आज उसके बारे में जितना जानता था, वो सब लिखकर थोड़ा हल्का महसूस कर रहा हूँ।

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मुंबई में मेरे चित्रों की पहली एकल प्रदर्शनी 1991 में लगी थी। मुंबई में अक्टूबर का महीना बहुत ख़ुशनुमा होता है। यह बारिशों के बाद का समय होता है और मौसम की गर्मी भी तब तक उतर चुकी होती है। हालाँकि ये मेरी पहली प्रदर्शनी नहीं थी लेकिन पहली बार एक ऐसे महानगर के लोगों ने इसे सराहा था, जिनसे मैं अपरिचित था। 1974 में मेरी पहली प्रदर्शनी कानपुर में लगी थी। आज़मगढ़, कलकत्ता, इलाहाबाद की प्रदर्शनियों के सत्रह वर्ष बाद जहाँगीर आर्ट गैलरी में 1991 की प्रदर्शनी में पहली बार मेरी पेंटिंगें बिकीं। अपनी इस प्रदर्शनी के लिए बस इतना ही कह सकता हूँ कि इसने मेरी ज़िंदगी ही बदल दी थी और मैं चमचमाते सुन्दर दाँतों वाले कला बाज़ार का, छोटा ही सही; एक निवाला बन गया था।

मुझे कलकत्ते से आये युवा चित्रकार विमल कर्मकार के लिए अपनी 1991 वाली प्रदर्शनी कभी नहीं भूलेगी। जहाँगीर आर्ट गैलरी के गैलरी तीन में विमल की प्रदर्शनी के ख़त्म होने के अगले दिन से मेरी प्रदर्शनी शुरू होनी थी। उसकी प्रदर्शनी ख़त्म होने से दो-तीन दिन पहले ही उससे मेरी पहली मुलाक़ात हुई थी। वह मुझे बहुत कम बोलने वाला, भीरु किस्म का लेकिन ईमानदार और साफ़ दिल इंसान लगा। दो कलाकार जब किसी गैलरी में मिलते हैं, तो बिक्री-धंधे के अलावा अन्य किसी विषय पर बातें कम ही होती हैं। मैं कला बाज़ार से बिलकुल अनभिज्ञ था, चित्र क्यों और कैसे बिकते हैं, इसके बारे में मेरी धारणा अस्पष्ट थी, इसलिए मेरी उससे इस विषय पर ज़्यादा बात नहीं हो सकी। मैं बस उसके जीवन संघर्षों के बारे में सुनता रहा था। मुंबई में दस दिनों के लिए, फोर्ट इलाके में ही किसी पुराने मकान की सीढ़ियों के नीचे उसे थोड़ी-सी जगह मिल गयी थी, जहाँ उस मकान का वाचमैन अपनी चारपाई और उसके नीचे एक लोहे के ट्रंक में अपनी गृहस्थी समेटकर रह रहा था। यहाँ नहाने धोने के लिए प्राइवेट इंतज़ाम था। ऐसी जगह में दस दिन रहने के लिए उसे पूरे सौ रुपये देने पड़े थे। बस एक ही पाबंदी थी कि सुबह दस से शाम के पाँच बजे तक यहाँ प्रवेश निषेध था।

विमल कलकत्ते के सरकारी कला और शिल्प विद्यालय का स्नातक था। उसका काम बहुत सुन्दर था और उसके चित्रों पर उसके किसी गुरु, वरिष्ठ या किसी समकालीन चित्रकार का असर नहीं था। विमल ने बताया था कि वह अपने मोहल्ले के छोटे-छोटे बच्चों को पेंटिंग सिखाता है और यही उसकी कमाई का एकमात्र ज़रिया था। वह बहुत उम्मीदों के साथ अपने चित्रों को लेकर मुंबई आया था। प्रदर्शनी के चौथे दिन उसकी प्रदर्शनी में नीतू मैम आई थीं। नीतू मैम के पति एक बड़े उद्योगपति थे और वे लोग जहाँगीर आर्ट गैलरी के क़रीब ही कोलाबा में रहते थे। नीतू मैम की अपनी गैलरी शायद नहीं थी लेकिन वह अपने घर से ही चित्रों को बेचने का काम करती थीं। विमल के साथ उन्होंने एक मौखिक क़रार किया कि वह सभी चित्रों को अपने पास रख लेंगी और जैसे-जैसे चित्र बिकेंगे, उसकी क़ीमत से अपना कमीशन काटकर विमल को भेजती रहेंगी। चूँकि विमल की कोई भी पेंटिंग नहीं बिकी थी और उसे पैसों की बहुत ज़रूरत थी, लिहाज़ा वह विमल को एकमुश्त तीस हज़ार रुपये भी देने को तैयार थीं।

विमल ने जब मुझे नीतू मैम के प्रस्ताव के बारे में बताया तो मुझे लगा कि यह सौदा बुरा नहीं था। अपनी प्रदर्शनी के सात दिन बीत जाने के बाद विमल जब अपनी पेंटिंगें उतार रहा था, तब मैं अपनी पेंटिंगों को साथ लेकर गैलरी पहुँचा ही था। विमल मुझे बेहद ख़ुश नज़र आया। उसी दिन अपनी सभी पेंटिंगें वह नीतू मैम के बँगले में उतारकर लौटा तो मुझसे मिलने गैलरी चला आया था। जहाँगीर के कुछ कर्मचारी दीवारों पर मेरी पेंटिंग टाँग रहे थे। विमल ने कहा कि कल सुबह ही उसका कलकत्ते लौटने का टिकट है। नीतू मैडम आज किसी कारणवश बैंक से पैसे निकाल नहीं सकी थीं, इसलिए कल बारह बजे वो उसे पैसे दे देंगी। उसका टिकट अब कैंसिल भी नहीं हो सकता था। उसने बताया कि अब वह कल रात की गाड़ी से जाने की सोच रहा था।

प्रदर्शनी का अपना तनाव होता है। मैं सुबह से ही चित्रों को टाँगने और उद्घाटन की तैयारी में लगा था और इन तमाम व्यस्तताओं में मैं विमल को भूल ही गया था। मेरी प्रदर्शनी का उद्घाटन शाम छः बजे था और सात बजे गैलरी के बंद होने का समय था। उद्घाटन के बाद और गैलरी से बाहर आने के पहले का एक घंटा मानो कुछ ही पलों में बीत गया था। गैलरी के कर्मचारियों ने ठीक सात बजते ही गैलरी की लाइटें बुझानी शुरू कर दीं। मैं जब बाहर निकलकर जहाँगीर आर्ट गैलरी की सीढ़ियों तक पहुँचा, तब तक बाहर की बत्तियाँ भी बुझ चुकी थीं, बस सड़क किनारे लगे लैंप पोस्टों की रोशनी से गैलरी का आहाता चमक रहा था। तभी मेरी नज़र विमल पर पड़ी। गैलरी की सीढ़ियों पर एक किनारे वह गुमसुम बैठा था। पूछने पर उसने बताया कि वह सुबह ही नीतू मैम के बँगले पर पहुँच गया था। थोड़ी देर बाद मैम कहीं बाहर जाने के लिए निकलीं तो गाड़ी की खिड़की का काँच उतारकर बस उन्होंने हेलो कहा और फिर कहीं चली गईं। पूरे दिन उसने एक गिलास पानी तक नहीं पिया था। छः बजे तक उसने मैम के लौटने का इंतज़ार किया, फिर सीधे मुझसे मिलने गैलरी चला आया। जहाँगीर के सामने की सड़क पार करके मैं उसे एक रेस्ट्रॉन्ट में ले गया। रेस्ट्रॉन्ट बंद होने ही वाला था, फिर भी बंद मक्खन और चाय हमें मिल गई थी। खाते हुए विमल कुछ बोलना चाह रहा था लेकिन मैंने इशारे से उसे रोक दिया। खाने के बाद चाय पीते हुए कुछ देर तक हम दोनों ख़ामोश बैठे रहे। आज की सुबह का गीतांजलि एक्सप्रेस का टिकट बेकार हो चुका था और अब कुछ ही देर में वी.टी. से छूटने वाली बॉम्बे हावड़ा मेल का टिकट भी बर्बाद होने वाला था। हमने क्या-क्या बातें की थीं, आज वह सब तो याद नहीं, बस इतना याद है कि उसके पास एक समूचा रुपया भी अब नहीं बचा था। नीतू मैम को भला-बुरा कहने से विमल की समस्या का समाधान नहीं होने वाला था। इस अनजाने शहर में ऐसा कोई भी नहीं था, जो विमल की मदद कर सकता।

फुटपाथ पर खड़े-खड़े हमने आने वाले कल की योजना बनाई। कल सुबह सबसे पहले वीटी जाकर विमल कल रात की गाड़ी का टिकट लेगा। फिर सुबह से शाम तक नीतू मैम से मिलने की कोशिश करेगा। विमल को पूरा यकीन था कि माथेरान से पार्टी करने के बाद देर रात मैम आ ही जाएँगी और सुबह उसका काम हो जाएगा। मेरी जेब में जितने पैसे थे, मैंने उसे दे दिए। हालाँकि मेरे पास भी ज़्यादा पैसे थे नहीं, इसलिए विमल को देने के बाद मेरी अपनी जेब ख़ाली हो चुकी थी। मुझे याद है, फोर्ट से टैक्सी में पवई जाते हुए मैं रास्ते भर बस यही मनाता रहा था कि कहीं मुझे टैक्सी बदलने की नौबत न आ जाए। मैं घर पहुँचकर ही टैक्सी वाले के पैसे चुका पाया था।

दूसरा दिन भी देखते-देखते दूसरे दिनों जैसा ही बीता। फिर शाम हुई और फिर पत्थर दिल चौकीदार ने ठीक सात बजे गैलरी की बत्तियाँ बुझाकर हमें बाहर खदेड़ दिया। गैलरी की सीढ़ियों पर बैठे मैं विमल का इंतज़ार करने लगा। थोड़ी देर बाद वह लायन गेट की ओर से अपना छोटा सूटकेस थामे हल्के, थके क़दमों से आता दिखा। मुझे समझने में दिक्कत नहीं हुई कि नीतू मैम आज भी नहीं मिली थीं और अब उसके पास न उसकी पेंटिंगें थीं और न ही पैसा! उसे ख़ाली हाथ मुंबई से वापस कलकत्ते जाना था। उस रात, वी. टी. स्टेशन के बाहर उसे उतारकर मैं पवई की ओर निकल गया था।

फिर कभी मुझे न तो विमल मिला, न उसके बारे में कोई ख़बर मिली और न ही उसके चित्र कभी किसी प्रदर्शनी में दिखे।
1991 की प्रदर्शनी के बाद बहुत लम्बा वक़्त गुज़र चुका है और कला की हमारी दुनिया बहुत कुछ बदल गई है लेकिन, आज भी न तो विमल जैसे अभागे कलाकारों की तादाद कम हुई है और न ही नीतू मैम जैसों की संख्या में कोई कमी आई है।

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मैं अपने क़रीबी दोस्तों को बार-बार कहता हूँ कि चित्रकला की दुनिया को बहुत क़रीब से जानने की कोशिश क़तई न करें। दूर से ही इसे देखें। ज़्यादा क़रीब से देखने पर हो सकता है कि, चित्र आपको कमोडिटी या पण्य जैसे लगने लगें और चित्रकार एक सट्टेबाज! कहने का आशय यह भी कि संभवतः चित्रकला आपको कला ही न लगे। यहाँ, कब किसकी क़िस्मत के दरवाज़े बिना किसी 'खुल जा सिम-सिम' की पुकार के खुल जाएँ और कब कोई कलाकार ख्याति की ऊँची छत से लुढ़ककर माटी में लोटने लगे, यह किसी को पता नहीं होता। कानपुर में हमारे मुहल्ले के नेपाली चौकीदार की दो लाख की पंजाब स्टेट की लॉटरी निकली थी। मेरे परिचितों में वह चौकीदार ही पहला और अब तक का अंतिम आदमी है, जिसकी कभी कोई लॉटरी लगी हो। लेकिन हमारे कला जगत में मुझे उस नेपाली चौकीदार जैसी क़िस्मत वाले बहुतेरे दिखे।

गोपाल कृष्णन की बम्पर लॉटरी मेरे सामने ही निकली थी! मैं छुट्टियों में मुम्बई गया हुआ था। दो दिन बाद सीधे जहाँगीर आर्ट गैलरी आ पहुँचा। तीन नंबर गैलरी में गोपालकृष्णन की प्रदर्शनी चल रही थी। गोपाल कृष्णन ख़ूब घोड़े बनाता था। गोपाल की प्रदर्शनी मैंने एक प्राइवेट गैलरी में पहले भी देखी थी और उससे दो-तीन बार मिला भी था। कुछ लोग होते हैं, जिनसे मिलकर आपको लगता है कि ऐसे लोगों से हम बार-बार क्यों नहीं मिल पाते, गोपाल कृष्णन ऐसा ही था। बहुत मिलनसार और सीधी बात करने वाला गोपालकृष्णन एक औसत दर्जे का कलाकार था और उसे अपने चित्रकार होने की क्षमताओं के बारे में कोई ग़लतफ़हमी नहीं थी।
"सीधे चीन से अपनी क़िस्मत इम्पोर्ट की है मैंने!" गोपालकृष्णन कहा करता था।
"इसका मतलब?"
"मतलब ये कि पैसे वालों के पास जितने ज़्यादा पैसे आएँगे, पैसे गँवाने का डर उन्हें उतना ही ज़्यादा सताएगा। वह तंत्र-मंत्र, पूजा-पाठ की ओर भागेगा, और भागते-भागते अगर वह कहीं चीनी 'फेंगशुई' के जाल में फँसा तो उसे लाफिंग बुद्धा और फ्लाइंग हॉर्स में ही अपना भला दिखने लगेगा। अब आप लोगों की 'आर्टी स्टफ' से ज़्यादा भरोसेमंद मेरा घोड़ा है। महालक्ष्मी रेस कोर्स के बाहर सबसे तेज़ दौड़ने वाला! अब मेरे बारे में कोई आर्ट क्रिटिक लिखे या न लिखे, मैं भूखा तो मरने से रहा।"

पर मुझे लगता था कि गोपाल कृष्णन की क़िस्मत का घोड़ा उतनी तेज़ी से नहीं दौड़ रहा था, जितना वह कहा करता था। जहाँगीर आर्ट गैलरी की उस प्रदर्शनी में उसने ख़ूब नए-नए चटख रंगों का प्रयोग किया था। प्रदर्शनी के पहले दिन की सुबह थी वह। हम दोनों गैलरी में बैठे गलचौर कर रहे थे कि तभी फ़िरोज़ ख़ान को अपने दो साथियों के साथ गैलरी की ओर बढ़ते देखा। फ़िरोज़ ख़ान उस समय के प्रसिद्ध फ़िल्मी सितारों में से एक थे और उन्हें घोड़ों का शौक़ था। उन्होंने दो मिनट से भी कम समय में तीन घोड़े अपने लिए चुन लिए। उनके साथ के आदमी ने तुरंत बैग से पैसे निकालकर गोपाल को थमा दिए। यह पूरा कार्य व्यापार कुल पाँच मिनटों के भीतर ही संपन्न हो गया था। गैलरी से निकलते हुए फ़िरोज़ ख़ान बोले– "प्रदर्शनी के बाद मेरे घर में इन्हें भिजवा दीजिएगा।" फ़िरोज़ ख़ान के साथ एक और व्यक्ति भी था, जो उनके साथ न जाकर गैलरी में रुक गया। बातचीत से पता चला कि वह कोई बहुत बड़े बिल्डर ही नहीं बल्कि फिल्म फाइनेंसर भी हैं। उनका मुंबई में कई हाउसिंग प्रोजेक्टों पर काम चल रहा था और अभी-अभी उनके दिमाग़ में एक आईडिया कौंधा है और ये आईडिया बिना बादलों वाली दोपहर की कड़कती धूप में, बिजली की तरह कड़का था। वो चाहते थे कि उनके हाउसिंग स्कीम में जो भी कोई मकान खरीदे, उसे बिल्डर की ओर से एक फ़्लाइंग हॉर्स की पेंटिंग शुभ चिह्न के रूप में भेंट की जाए। बिल्डर साहब के तीन सौ फ्लैट तो आने वाले एक साल में ही पूरे होने थे। थोड़ी देर के बाद बिल्डर बाबू गोपाल से कल सुबह दस बजे नरीमन पॉइंट के उनके दफ्तर में मिलने की बात कहकर निकल गए थे।

हालाँकि मैं गोपाल को बहुत क़रीब से नहीं जानता था, उससे महज़ दो-तीन बार की ही मुलाक़ात थी। आज बिल्डर बाबू से मिलने के बाद वह मुझे बिलकुल ही अपरिचित लगने लगा था। वह टेबल पर रखे काग़ज़ पर अपनी क़लम से गणित के दुरूह सवालों को हल करने में जुट गया। होना तो यह था कि हम दो-चार दोस्त गैलरी के 'सामोवार' में जाकर बियर के साथ सेलिब्रेट करते लेकिन गोपाल ने कोई आग्रह नहीं दिखाया। इसके बाद लम्बे समय तक मेरी मुलाक़ात उससे नहीं हुई।
कलकत्ते से मुंबई वाली रात की फ़्लाइट में एक दिन अचानक उससे मुलाक़ात हो गयी। गोपाल का चेहरा-मोहरा काफ़ी कुछ बदल गया था लेकिन, उसे पहचानने में मुझे कोई दिक़्क़त नहीं हुई। वो अभी-अभी सिंगापुर से एक प्रोजेक्ट साइन करके लौट रहा था और लौटते हुए कलकत्ते रुककर एक दूसरा प्रोजेक्ट फाइनलाइज़ कर अब वापस बम्बई लौट रहा था। एक चित्रकार से कितनी देर तक 'प्रोजेक्ट' की बातें की जाय! थोड़ी देर तक उसके तेज़ दौड़ते क़िस्मत के घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनते-सुनते मुझे नींद आने लगी थी, लेकिन उसने अपनी विजय-यात्रा के नए-नए पड़ावों की चर्चा बदस्तूर जारी रखी थी। मुंबई एयरपोर्ट के बाहर उसकी लम्बी गाड़ी लिए ड्राइवर इंतज़ार कर रहा था। बहुत मना करने पर भी वह नहीं माना और मुझे पवई तक छोड़कर ही अपने घर गया। कई दिनों तक उसका दिया हुआ विजिटिंग कार्ड मेरी जेब में पड़ा रहा, फिर न जाने कब और कैसे किसी दिन वह मुझसे खो गया।
सफ़र में कितने ही लोग आपके सहयात्री बनते हैं, फिर कहीं खो जाते हैं। अब एक विजिटिंग कार्ड कहीं खो गया तो इसका क्या किया जाए!

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इलाहाबाद छोड़कर 1991 में ही कलकत्ते आया था। जहाँगीर में हो रही प्रदर्शनी में शामिल सभी चित्र मैंने इलाहाबाद में बनाये थे, वरना अपनी नौकरी के नए दायित्त्व के दबावों में चित्र बनाना संभव नहीं था। प्रदर्शनी के बाद जब कलकत्ते लौटा और कमरे के एक कोने में अपना स्टूडियो बनाया तो लगा कि हाँ, अब कलकत्ते में जमने लगा हूँ। इसके बाद कुछ दिन लग गये मुझे कलकत्ते को समझने में। कलकत्ते को भी मुझे समझने में कुछ महीने लगे और मेरे तथा इस महानगर के बीच के रिश्ते को समझने में पूरे दस साल बीत गये। एक दिन मुझे लगा कि इस शहर से मेरी नहीं पटने वाली और मैं दिल्ली की तरफ़ निकल पड़ा।
वह साल 2002 का था!

पिछले पचास सालों के दरमियान अनेक प्रदर्शनियाँ कीं लेकिन जहाँगीर आर्ट गैलरी में मेरी हर प्रदर्शनी ने मुझे अलग-अलग अनुभव दिए। प्रदर्शनी के लिए इस गैलरी जैसी आदर्श गैलरी मुझे कोई और नहीं लगी। यह बात महज़ गैलरी के भवन के बारे में नहीं है, बल्कि मेरे इस मोह के पीछे वहाँ आने वाले दर्शक, वहाँ का माहौल, वहाँ के फुटपाथ पर अपने चित्रों को प्रदर्शित करते चित्रकार, चाय वाले और सड़क किनारे के पान वाले भी शामिल हैं। मुझे लगता है कि केवल मुंबई में ही जहाँगीर आर्ट गैलरी हो सकती थी। मैं दुनिया के किसी अन्य शहर में इसके होने की कल्पना भी नहीं कर सकता।
मैं जानता हूँ कि कइयों को यह थोड़ा भावुकता से भरा बयान लग सकता है पर इसका क्या किया जाए?

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जहाँगीर आर्ट गैलरी में मेरी एक प्रदर्शनी का शीर्षक था– 'अनडुलेशंस' यानी लहरें।
ट्रेन से मुंबई जाते हुए कल्याण के पहले इगतपुरी स्टेशन आता था। इगतपुरी और कल्याण के बीच का सफ़र मेरे लिए सबसे आकर्षक हुआ करता था। चारों तरफ़ कत्थई रंग के पत्थरों वाले पहाड़ों के बीच से ट्रेन की सर्पिल पटरियाँ गुज़रती थीं। इन पहाड़ों को मैंने, कभी सुबह कोहरे की चादर में अपना मुँह छिपाये देखा तो कभी साँझ की डूबती रोशनी में आसमान की पृष्ठभूमि पर उनकी स्थिर छाया आकृतियों को…। कभी बारिश में नहाए पहाड़ों के जंगलों के बीच कहीं नन्हा झरना फूटते देखा, तो कभी गर्मी में इन पहाड़ों को असहाय झुलसते भी देखा। मुझे वे पहाड़, ज़मीन पर ठहरी हुई लहरों जैसे लगते। मैं कई बार उनके स्केचेज़ बनाता तो कई बार स्केच बुक बंद करके बस उनके बारे में सोचता रहता। ऐसे ही कुछ कच्चे-पक्के अनुभवों से गुज़रते हुए मैंने एक समूची शृंखला बनानी शुरू की। 1994 के पहले मैंने कभी अपने किसी चित्र में पहाड़ का चित्रण नहीं किया था, इसलिए भी इस शृंखला का मेरे लिए अलग आकर्षण था। इस शृंखला के इक्कीस चित्रों को मैंने 1994 में प्रदर्शित किया था। सात दिनों की प्रदर्शनी के दौरान दर्शकों के साथ ही कई बड़े कला समीक्षकों ने इसे देखा और इसके बारे में पत्र-पत्रिकाओं में लिखा। यह निस्संदेह मेरी एक यादगार प्रदर्शनी थी।
लेकिन, मुझे यह प्रदर्शनी एक और वजह से कभी नहीं भूलेगी!

प्रदर्शनी का शायद वह तीसरा दिन था। दोपहर के वक़्त मैं अपने हॉल में अकेला ही बैठा था। थोड़े-से दर्शक भी उस समय वहाँ मौजूद थे। उसी समय मैंने श्रीधर पालीवाल को आते देखा। श्रीधर पालीवाल एक बड़ी इलेक्ट्रॉनिक कंपनी के मालिक थे, जो उन दिनों टेलीविजन के एक बेहद लोकप्रिय ब्रांड के निर्माता के रूप में मशहूर थे। श्रीधर पालीवाल ने काफी ध्यान से मेरी प्रदर्शनी के एक-एक चित्र को देखा, फिर मेरे नज़दीक आकर अपना परिचय देते हुए पास की कुर्सी पर बैठ गये और बोले- “मैं काले-सफ़ेद चित्रों का कायल हूँ लेकिन, ऐसे काले-सफेद चित्र मैंने पहले कभी नहीं देखे। मुझे ये, ये, ये और ये चित्र चाहिए।” ऐसा कहते हुए उन्होंने मुझे दीवार पर टँगे छः सात चित्रों को दिखाया। फिर उन्होंने मुझसे प्राइस लिस्ट माँगकर उन चित्रों की कुल राशि जोड़कर मुझे बताया। “मेरे साथ मेरी पत्नी भी आयी हुई हैं। दरअसल, उसे बचपन से ही चित्रों से बहुत प्रेम है। उसे भी एक बार दिखा लेते हैं, शायद उसे कुछ और पसंद आ जाए।”

थोड़ी देर बाद प्रदर्शनी हाल में श्रीमती पालीवाल का प्रवेश हुआ। हॉल में दाख़िल होते ही श्रीधर पालीवाल ने उनसे मेरा परिचय कराया। दो-एक मिनट मुझसे कुछ बात करने के बाद उस महिला ने हॉल के बीच एक जगह पर खड़े होकर प्रदर्शनी की सभी पेंटिंगों पर नज़र दौड़ाई और इसके बाद जो कुछ हुआ, वह किसी हादसे से कम न था। श्रीमती पालीवाल कुछ पलों तक हॉल के बीचों-बीच अपनी जगह मूर्तिवत खड़ी रहीं, फिर अपनी दोनों हथेलियों से अपनी आँखों को ढँककर, “ओह माई गॉड, सो मच ऑफ़ ब्लैक ऑल अराउंड? आई जस्ट कांट स्टैंड देम! आल ब्लैक???” यह कहते हुए वह तेज़ क़दमों से, लगभग भागते हुए हॉल के बाहर चली गईं।

श्रीधर पालीवाल इसके लिए बिलकुल प्रस्तुत नहीं थे। वे मुझसे माफ़ी माँगते हुए जहाँगीर आर्ट गैलरी के उस दरवाज़े से बाहर निकल गये, जहाँ से होते हुए उनकी पत्नी अभी-अभी इस गैलरी से बाहर गई थीं।

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मेरे दोनों भाई मुंबई में रहते थे। मेरे माता-पिता भी उन्हीं के साथ थे। परिवार में मैं ही अकेला था, जो परिवार से दूर था। फिर भी साल में एक-आध बार बम्बई जाना होता ही था। समय के साथ-साथ मेरा जहाँगीर आर्ट गैलरी के लिए आकर्षण बढ़ता चला गया। गैलरी के कर्मचारी, चपरासी और चौकीदारों से लेकर ऑफिस के बाबुओं से भी मेरी निकटता हो गई थी। 2009 में मेरी एक बड़ी प्रदर्शनी जहाँगीर से सटी म्यूजियम आर्ट गैलरी में हो रही थी। अपनी पुरानी आदत के चलते मैं दोपहर को जहाँगीर आर्ट गैलरी की ओर निकल गया। गेट पर ही मुझे रहमान मिल गया। मैं रहमान को 1991 के दिनों से ही जानता था। रहमान को इस गैलरी में काम करते हुए बहुत समय बीत चुका था। उस दिन गैलरी के फाटक पर बैठा वह गेट सँभाल रहा था। मुझे देखकर उसने सलाम किया और मेरे बेटे तथा पत्नी का हालचाल पूछा। उसने अपनी कुर्सी को मेरी तरफ़ मुझे बैठने के लिए बढ़ा दी और चाय लेने चला गया। थोड़े देर बाद जब वह वापस आया तो उसके हाथ में चाय के दो गिलास थे और अपनी बग़ल में उसने एक बड़ा-सा स्केच बुक दबा रखा था। उसने कहा, “सर, बस कुछ और साल नौकरी के बचे हैं। हमारी नौकरी में पेंशन वगैरह तो है नहीं, इसलिए आप जैसे जान-पहचान के चित्रकारों से इस स्केच बुक पर कुछ बनवाकर रख लेता हूँ, वही मेरी कमाई है।” इतना कहकर उसने स्केच बुक मेरी ओर बढ़ा दी। उस मोटी-सी स्केच बुक के अब कुछ ही पन्ने बचे थे। उसके पन्ने पलटते हुए मैं चकित रह गया। हुसैन, अंजलि इला मेनन, सबावाला, बी. प्रभा से लेकर न जाने कितने ही चित्रकारों के स्केच उन पन्नों पर मौजूद थे। देर तक मैं उन स्केचों को निहारता रहा, फिर मैंने उस स्केच बुक के एक पन्ने पर स्केच बनाकर रहमान की ओर बढ़ा दिया था।

रहमान से विदा लेकर जब मैं वापस म्यूजियम आर्ट गैलरी लौट रहा था तो मुझे अपनी एक पुरानी ज़िद याद आ गई। बहुत सालों पहले मैंने दो क़समें खाई थीं। पहली, कि मैं कभी किसी चित्रकला प्रतियोगिता में भाग नहीं लूँगा और दूसरी कि कभी कोई पुरस्कार या सम्मान नहीं लूँगा। आज मेरी दूसरी क़सम टूट गई थी। रहमान के स्केच बुक में स्केच बनाना मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार था। मेरा एक स्केच रहमान के रिटायरमेंट के बाद के दिनों को थोड़ा बेहतर बनाएगा, यह अहसास ही मेरे लिए बहुत कुछ पा लेने जैसा था।

क्या इससे बड़ा कुछ और पाने के लिए मैं इतने दिनों से पेंटिंग बनाता रहा हूँ?

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रचनाकार परिचय

अशोक भौमिक

ईमेल : bhowmick.ashok@googlemail.com

निवास : नागपुर (महाराष्ट्र)

जन्मतिथि- 31 जुलाई, 1953
जन्मस्थान- नागपुर (महाराष्ट्र)
सम्प्रति- प्रतिष्ठित चित्रकार, कथाकार और कला आलोचक
प्रकाशन- 'मोनालिसा हँस रही थी' तथा 'शिप्रा एक नदी का नाम है' (उपन्यास), 'कुछ कहानियाँ मेरी भी' तथा 'आइस-पाइस' (कहानी संग्रह), 'जीवनपुरहाट जंक्शन' तथा 'खोए हुए लोगों का शहर' (स्मृति आख्यान), ‘समकालीन भारतीय कला : हुसैन के बहाने’, ‘बादल सरकार : व्यक्ति और रंगमंच’, ‘अकाल की कला और जैनुल आबेदिन’, ‘चित्तप्रसाद और उनकी चित्रकला’, ‘चित्रों की दुनिया’, ‘महामारी और चित्रकला’, ‘भारतीय चित्रकला का सच’ तथा ‘चित्रकला, चित्र और चित्रकार’ (कला आलोचना केंद्रित पुस्तकें), ‘ज़ीरो लाइन पर गुलज़ार’ (गुलज़ार साहब के लेखन पर केंद्रित पुस्तक) प्रकाशित हैं।
इसके अलावा उन्होंने रबीन्द्रनाथ ठाकुर के लगभग अस्सी अप्रकाशित चित्रों की विशिष्ट कॉफ़ी टेबल बुक संपादित की, जिसका नाम है- ‘रबीन्द्रनाथ ठाकुर के चित्र’। बच्चों की पत्रिका 'साइकिल' और 'प्लूटो' में कला पर नियमित लेखन के साथ-साथ वह प्रभात ख़बर अख़बार के लिए भी चित्रकला पर साप्ताहिक कॉलम लिखते रहे हैं।